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'मुम्बई की लोकल ट्रेनों में सफर मतलब टाडा में सजा'

मुम्बई में आज जिस एल्फिंस्टन स्टेशन पर जो हादसा हुआ और जिसमें 22 से ज्यादा लोगो की मौत हो गयी, उसी एल्फिंस्टन इलाके में 29 August की बारिश में bombay hospital के डॉक्टर दीपक मेनहोल में बह गए थे। यदि कोई एल्फिंस्टन या उससे सटे परेल आए और ऊपर नजर घुमाए, तो उसे सिर्फ ऊँची- ऊंची इमारतें ही दिखेंगी। कई तो 100 मंजिला से भी ऊँची हैं। यहीं पर अमेरिकन राष्ट्रपति ट्रम्प के नाम से ट्रम्प टॉवर बन रहा है, जिसमें कहा जाता है कि उन्हीं का पैसा लगा हुआ है। यहाँ बड़े- बड़े कॉर्पोरेट हाउसेज हैं पब हैं। ऐसा कहा जाता है कि एशिया के 20 सबसे मंहगे इलाकों में से एक यह इलाका है। पर सुविधाओं के नाम पर यहाँ सिर्फ ग्लैमर है। जमीनी हकीकत क्या है, आज और 29 अगस्त के दो हादसे इसके गवाह हैं।

mumbai

चोटी संभाल के रखना

चोटी संभाल के रखना

लोकल ट्रेनों में मुम्बई में सुबह और शाम जिस तरह की भीड़ रहती है, लोग शायद मजाक समझें, पर जो लोग सुरक्षित घर या ऑफिस पहुँचते हैं, हकीकत में 26 जनवरी या 15 August को उन्हें gallantry award (वीरता पुरस्कार) मिलना चाहिए। मुझे अच्छी तरह याद है और जिसे एक बार मैंने पहले भी लिखा था, कि 24 साल पहले जब मेरी शादी हुई थी, तो मेरी माँ ने यूपी में मेरी श्रीमती जी को सलाह दी थी, कि तुम जब भी मुम्बई में लोकल ट्रेन में चढ़ना अपनी चोटी हमेशा आगे रखना, क्योंकि कई बार ट्रेन पकड़ने की मारामारी में किसी को यह होश ही नहीं रहता कि वह कोच का बीच का लम्बा हैंडल पकड़ रहा है या किसी की चोटी।

मुम्बई जैसे शहर के ट्रैफिक में यदि आप फंस गए, तो...

मुम्बई जैसे शहर के ट्रैफिक में यदि आप फंस गए, तो...

तीन साल पहले मेरी अमेरिका वाली भाभी को सुबह 11 बजे बंगलूर से मुम्बई एयरपोर्ट पहुँचना था। मैंने उनसे माफी मांग ली कि सुबह पीक hours में लोकल ट्रेन में लटक कर मैं एयरपोर्ट नहीं पहुँच सकता। पर सवाल यह है कि दूसरा विकल्प क्या है ? जो सुविधाजनक विकल्प है रेडियो टैक्सी का, मुम्बई जैसे शहर के ट्रैफिक में यदि आप फंस गए, तो दो घंटे के कब पांच घंटे लग जाएं, कहा नहीं जा सकता। लोग मेरे इस कमेंट का राजनीतिकरण न करें, पर बुलेट ट्रेन अपनी जगह है, पर हमें पहले यात्रा की बुनियादी सुविधओं को दुरुस्त करने की जरूरत नहीं है क्या?

मैं विरार के पास वसई में रहता हूँ

मैं विरार के पास वसई में रहता हूँ

27 साल हो गए मुम्बई में। विरार के पास वसई में रहता हूँ और आज भी मुम्बई में विरार ट्रेनों में घुसने का ऐसा ख़ौफ़ है, जैसे किसी को टाडा ऐक्ट में सजा सुना दी गयी हो । देश मे कुछ लोग अब मेल ट्रेनों में सफर करने में डरते हैं कि पता नहीं कब बीच मे डिरेलमेंट हो जाए । इसलिए सरकार को औऱ खासतौर पर पीयूष गोयल को वाकई रेल सुधारों को लेकर कुछ अर्जेंट करने की जरूरत है।

(यह लेख सुनील मेहरोत्रा की फेसबुक वॉल से लिया गया है)

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