2014 Lok Sabha Election: सोशल, इलेक्‍ट्रानिक और प्रिंट मीडिया लोक सभा चुनाव 2014 में नैतिकता से परे

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नई दिल्‍ली। अपना काम बनता, भाड़ में जाए जनता...जैसी बात को तो इस बार मीडिया ने भी सिद्ध कर दिया। लोक सभा चुनाव 2014 में सोशल मीडिया से लेकर प्रिंट व इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने अपनी नैतिकता खोकर जनता तक पहुंचने का प्रयास किया। जनता भी भेली, सब मानती चली गई जो मीडिया कहती गई। जनता ये नहीं जानती थी कि आज के समय में मीडिया का एक और पर्याय बन गया है 'टीआरपी।' जो भी कुछ हुआ इसी टीआरपी की खातिर हुआ।

लोक सभा चुनाव 2014 में मीडिया ने एक अहम भूमिका निभाई है ये बात तो सभी आम जन जानते हैं लेकिन सच्‍चाई जानने के बाद इस वाक्‍य में से अहम शब्‍द निकालना एक मजबूरी है। जो नरेंद्र मोदी वर्ष 2002 के गुजरात दंगे के बाद मीडिया के लिए सबसे बुरे आदमी बन गए थे वहीं नरेंद्र मोदी वर्ष 2014 में पीएम पद के उम्‍मीदवार बनने के बाद सबसे अच्‍छे हो गए। ज्‍यादा सोचने की जरूरत नहीं है- ये सारा खेल टीआरपी का ही है। इस बात को स्‍वयं नरेंद्र मोदी मीडिया के सामने अपने साक्षात्‍कार में ही कह चुके हैं।

बदलते मीडिया का स्‍वरूप: मीडिया बहुत तेजी से बदल रही है। कुछ चुनावी विशेषज्ञाें ने तो यहां तक कह दिया है कि यदि आज के समय में निष्‍पक्ष चुनाव कराना है तो मीडिया को नजरंदाज करना चाहिए। सोशल मीडिया ने तो चुनाव का पूरा प्रारूप ही बदलकर रख दिया। मोटे-मोटे शब्‍दों में कहा जाए तो मीडिया का काम सही और गलत में भेद कर आम जन तक सूचना पहुंचना होता है। लेकिन अब माहौल और समय दोनों बदल गया है। किसी भी घटना के पीछे कोई भी मीडिया पहले ये देखती है कि क्‍या जनता ये सब देखना चाहती है अगर हां तो कवर किया जाएगा और ना तो नहीं। एक तरह से कह दें तो जनता को क्‍या दिखाना है अब मीडिया ही तय करने लगी है।

लोक सभा चुनाव 2014 में मीडिया की गलती:
इस देश में शायद ही कोई ऐसा व्‍यक्ति हो जो मीडिया में र‍हकर मीडिया की गलतियों के बारे में बताए। लोक सभा चुनाव 2014 में मीडिया ने काफी गलतियां की हैं जिसका खामियाजा एक्जिट पोल के मुताबिक कांग्रेस समेत अन्‍य कुछ छोटी पार्टियों को ही भुगतना पड़ रहा है। जब मीडिया ही करने लग गई मोदी का प्रचार:

1. आम चुनाव के दौरान एक समय आया जब सिर्फ रैलियों का दौर चल रहा था तो बतौरद दर्शक जनता ही ये बेहतर जान सकती है कि इलेक्‍ट्रानिक मीडिया ने सबसे ज्‍यादा एक समय पर किसको कवर किया? लोगों से जब पूछा तो उन्‍होंने बताया कि नरेंद्र मोदी की रैली को सबसे ज्‍यादा कवर किया गया क्‍योंकि सबसे ज्‍यादा भीड़ उन्‍हीं की रैली में होती थी। बात तो ठीक कही लेकिन ये मीडिया है और इसे किसी भी हालत में निष्‍पक्ष ही रहना चाहिए। मीडिया को चौथे स्‍तंभ की मान्‍यता दी गई है।

2. नरेंद्र मोदी की रैलियों को मीडिया दृ्वारा लगातार घंटो तक दिखााया जाता था लेकिन शायद कांग्रेस अध्‍यक्ष सोनिया गांधी की रैली को किसी चैनल ने लगातार 2 मिनट तक भी नहंी दिखाया होगा। एक सामान्‍य व्‍यक्ति भी मीडिया की निष्‍पक्षता पर यहां सवाल उठा सकता है।

3. जब मीडिया ने स्‍वयं ही कांग्रेस के राहुल गांधी को अकेला छोड़कर भाजपा के नरेंद्र मोदी में रुखि हो गई तो कोई भला क्‍या करे? कहा जाता है कि यदि मीडिया की कोई पसंद है तो भी उसे वह जनता के सामने जाहिर नहीं कर सकता है क्‍योंकि इससे आम जनता प्रभावित हो सकती है। हुआ भी कुछ ऐसा ही है मोदी में मीडिया ने रुचि क्‍या ली वो आम जनता के बीच में भरोसे की एक आस हो गए।

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