मणिपुर के विद्रोही समूह UNLF ने छोड़ा हिंसा का रास्ता, अमित शाह ने बताया इसे मील का पत्थर
Manipur Banned Armed Group UNLF: मणिपुर हिंसा (Manipur Voilence) जिसने पूरे राज्य ही नहीं देश को हिला कर दिया था, उस पर महीनों बाद काबू पाया गया था। इस हिंसा के बाद से केंद्र सरकार लगातार राज्य में शांति कायम रखने के लिए प्रयास कर रही है। वहीं केंद्र सरकार को अब इसी प्रयास के तहत बड़ी सफलता हासिल हुई है। बुधवार को मणिपुर के विद्रोही समूह यूएनएलएफ ने हिंसा का रास्ता छोड़ने का ऐलान किया। यूएनएलएफ ने शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए। केंन्द्रीय गृह मंत्री ने इसे ऐतिहासिक मील का पत्थर बताया है।

गौरतलब है कि 3 मई को मणिपुर में जातीय हिंसा भड़की थी जिसमें कई लोग बेघर हो गए थे और कईयों की जानें चली गई थी। महीनों तक चले जातीय हिंसा के बाद यह पहली बार है जब मणिपुर में स्थित किसी प्रतिबंधित संगठन ने सरकार के साथ शांति वार्ता करने का कदम उठाया है। ये मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है।
अमित शाह ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म पर इस शांति समझौते की घोषणा की जानकारी देते हुए एक्स पर लिखा
एक ऐतिहासिक उपलब्धि हासिल हुई! पूर्वोत्तर में स्थायी शांति स्थापित करने के लिए मोदी सरकार के अथक प्रयासों में एक नया अध्याय जुड़ गया है क्योंकि यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) ने आज नई दिल्ली में एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए।
गृह मंत्री ने आगे लिखा
मणिपुर का सबसे पुराना घाटी स्थित सशस्त्र समूह यूएनएलएफ हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में शामिल होने पर सहमत हो गया है। मैं लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में उनका स्वागत करता हूं और शांति और प्रगति के पथ पर उनकी यात्रा के लिए शुभकामनाएं देता हूं।
यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट क्या है?
यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (UNLF) का दूसरा नाम यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट ऑफ मणिपुर भी है। ये अलगाववादी समूह मणिपुर में सक्रिय है। ये अलगावादी संगठन प्रतिबंधित है। इस संगठन का उद्देश्य एक संप्रभु और समाजवादी मणिपुर की स्थापना करना है।
जानें क्या था मणिपुर हिंसा का पूरा मामला
अनुसूचित जनजाति (ST) का दर्जा पाने के लिए मणिपुर के मैतेई समुदाय मांग कर रहा था, जिसके विरोध में मणिपुर के पहाड़ी जिलों में 3 मई को आयोजित 'आदिवासी एकजुटता मार्च' के बाद हिंसा भड़की थी। इस जातीय हिंसा में कुल 180 लोग मारे गए थे।
मणिपुर में मैतेई जनसंख्या लगभग 53 प्रतिशत है वो यहां के पहाड़ी इलाकों में रहते हैं और दूसरा आदिवासी (नागा और कुकी) है, वो भी पहाड़ी इलाकों में रहते हैं, इन दोनों ही गुटों के बीच हिंसा हुई थी। मई के बाद कई महीनों तक चले इस संघर्ष में दोनों समुदाय एक दूसरे के खून के प्यासे हो गए थे।












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