मैगी पर बैन हटे या नहीं, जहर तो हम खा ही रहे हैं

[अजय मोहन] पिछले सप्ताह ही मैं मैगी जैसे पीले पैकेट में बिक रहे आटा नूडल्स खरीद कर लाया। देखने में और टेस्ट लगभग मैगी जैसा ही था। तभी पड़ोस के बच्चे खेलते-खेलते घर आ गये और बोले, "अंकल आप मैगी खा रहे हैं, ये तो जहर है! इसमें कैमिकल्स होते हैं। ये क्यों खा रहे हैं?" बच्चों को उत्तर देने के बजाये, मैं झटपट नूडल्स चट कर गया।

फिर बाजार के एक दो चक्कर लगाये, थोड़ा सा रिसर्च किया और हाल के घटनाक्रम पर गया तो पाया कि जहर मैगी में नहीं भारत सरकार और राज्य सरकारों के सिस्टम में है। ऐसे में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) की कार्य प्रणाली पर भी तमाम सवाल उठते हैं।

  • देश के हर शहर, गांवों, कस्बों में ठेलों पर नूडल्स मिलते हैं, जिसमें अजीनोमोटो (मोनोसोडियम ग्लूकोमेट) डालते वक्त बनाने वाला FSSAI के मानक नहीं पढ़ता। उन पर बैन क्यों नहीं लगता?
  • मदर डेयरी के दूध में डिटर्जेन्ट पाया जाता है। जांच लखनऊ में होती तो कुछ नहीं मिलता, मेरठ में मिल जाता फिर कोलकाता से छह महीने बाद रिपोर्ट आती कि दूध में डिटर्जेंट था। तब तक लाखों लोग डिटर्जेन्ट वाला दूध पी चुके होते हैं।
  • पिछले साल दीवाली पर लखनऊ के मिष्ठान भंडारों से मिठाई के सैम्पल लेकर लैब भेजे गये। टेस्ट की रिपोर्ट होली के करीब आयी। यानी हजारों लोग वो खराब मिठाई खा चुके थे।
  • उत्तर प्रदेश में छह लैब हैं लखनऊ, वाराणसी, आगरा, मेरठ, गोरखपुर और झांसी में। लेकिन वास्तविकता यह है कि लखनऊ के अलावा बाकी किसी भी लैब में टेस्ट‍िंग की आधुनिक सुविधाएं ही नहीं हैं। यानि टेस्ट महज खानापूर्ति के लिये किया जाता है।
  • अजीनोमोटो यानी मोनो सोडियम ग्लूकोमेट ऐसा पदार्थ है, जिसे डॉक्टर स्लो किलर का नाम दे चुके हैं। किलर होने के बावजूद बाजारों में मिलता है। इस पर बैन नहीं लगता।
  • कोई भी छोटे-मोटे वेंडर पूरी-सब्जी, अंडा बिरयानी, वेज बिरयानी, आदि पकाकर लाते हैं और आसानी से ट्रेनों में बेच कर चले जाते हैं। यानी चलती ट्रेन में यात्री स्वस्थ्य भोजन की कल्पना ही नहीं कर सकते।
  • बॉम्बे हाईकोर्ट को अगर लखनऊ, कोलकाता और मैसूर की लैबोरेटरीज़ में किये गये टेस्ट पर विश्वास नहीं, तो इन लैबोरेटरीज़ पर क्यों इतना पैसा खर्च किया जा रहा है।

यह तो महज सात उदाहरण हैं, अगर वाकई में केंद्र सरकार को लोगों के स्वास्थ्य की चिंता है, तो सख्त कानून बनाना ही होगा। मैगी को लेकर नेस्ले कंपनी पर सरकार ने करीब 640 करोड़ रुपए का जुर्माना ठोक दिया। अगर नियम वाकई में सख्त बनाने हैं तो चाउमिन वेंडरों से लेकर रेस्तराओं के मालिकों तक, जहां-जहां केमिकल्स का इस्तेमाल या मिलावट होती है, उन पर जुर्माना ठोकना ही होगा।

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यदि सरकार ऐसा नहीं कर सकती है, तो मैगी पर बैन लगा रहेया हट जाये, कोई फर्क नहीं पड़ने वाला। नूडल्स में नहीं तो फ्राइड राइस में सही, जहर तो हम खा ही रहे हैं।

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