लोकसभा चुनाव और लोकतंत्र की जान...

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मुझे याद आता है सन् 1998 में संसद सत्र के दौरान अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि 'सियासतें रहे या न रहें पार्टियां बनेगी, बिगड़ेंगी और नई पार्टियां बनेंगी पर देश का रहना जरूरी है और उससे भी ज्यादा जरूरी है देश में लोकतंत्र का रहना और सांसद का दायित्व है कि इसकी गरिमा बरकरार रहे। संसद में जो हुआ उसे शब्दों में बयां नहीं कर पाऊंगा। बस इतना कहूंगा कि भारतीय लोकतंत्र शर्मिंदा होता रहा। बीते साल लोकतंत्र का चेहरा राष्ट्रीय राजधानी के सड़कों पर दिखा, जहां किसान से लेकर आम आदमी अपना दर्द लेकर एकजुट दिखा।

हर सरकार जनता को पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा और बेहतर स्वास्थ्य सेवा देने का वादा करती है, परंतु हकीकत यह है कि आज भी देश की जनता इन सब बुनियादी समस्याओं से उबर नहीं पाई है। सरकारी योजनाएं सौ फीसदी पुख्ता तौर पर जमीन पर नहीं आ पाती हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है कई स्तर पर फैला भ्रष्टाचार या सरकारी तंत्र का ढीला-ढाला रवैया। सरकारें भी इस पर अंकुश लगाने के बजाय इनसे किनारा करना ही बेहतर समझा है।

जनता की जेब ढीली कर रही है और सरकार की झोली भर रही है

जरा याद करिए ... सरकार का गठन ही होता था जनता को पानी-बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य समेत रोटी-कपड़ा और मकान उपलबध कराने के लिए। परंतु आजादी के सड़सठ साल बाद हालत यह है कि इन सब बुनियादी जरूरतें मुहैय्या कराने के लिए सरकारों ने भी निजी क्षेत्रों के तरफ हाथ फैलाया है, बिजली हो, शिक्षा, स्वास्थ्य हो या फिर सड़क। सबके लिए आम आदमी को भुगतान भुगतना पड़ रहा है। पानी में गंगा-यमुना का मैल, बिजली में मीटर का घालमेल और सड़क पर टोल का झोल-सब जनता की जेब ढीली कर रही है और सरकार की झोली भर रही है।

देश में चुनावी बयार बहने लगी है सभी राजनीतिक दलों का मिशन एक है पर रास्ते अलग-अलग। मोदी-मुलायम-राहुल-केजरीवाल सबके अपने-अपने मुद्दे हैं और अपने-अपने वोट बैंक। परंतु इस बार राजनीति की इस बिसात पर सबकी चाल एक सी नजर आ रही है। सियासत सड़क पर और जनता के बीच। मोदी भी मुलायम हो गये हैं टोपी से गुरेज था पर अब हाथ में हाथ डाले खड़े नजर आते हैं। पारंपरिक वोट खिसक रहा है, जो वोटर कांग्रेस के नेता के पास जाता था आज राहुल खुद वोटर के पास जा रहे हैं। चाय की दूकान से लेकर रेलवे प्लेटफार्म पर लगने लगी है राजनीति की क्लास। राजनीति के इस बदले माहौल का श्रेय जाता है आम आदमी को।

जिसने एक अदने से केजरीवाल की राजनीति पार्टी के नेतृत्व को स्वीकारा और अपनी बुलंद आवाज में अपनी मंशा जता दी। लोकतंत्र का मायने भुल चुके राजनीतिज्ञों को फिर से याद दिला दिया कि वो जनता के द्वारा, जनता के लिए जनसेवक हैं न कि राजतंत्र के राजा। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश का गौरव हासिल करने वाले भारत की विडंबना देखिए कि राजनीति के दांव पेंच में उलझकर यह कमाल का देश बन गया है।

जहां एक दर्जन पहचान पत्र रखने पड़ते हैं, प्रधानमंत्री कहते हैं हमने दस वर्षों में देश को इतना बदला जैसे सदियां गुजर गई हो, पी.एम. इन वेटिंग कहते हैं कि हमारे पास कई योजनाएं हैं पर आम जनता को वोटर आई कार्ड, राशन कार्ड, आधार कार्ड, पैन कार्ड, एनपीआर, स्थानीय निकाय वोटर कार्ड, स्नातक निर्वाचन वोटर कार्ड, एटीएम कार्ड समेत कई कार्ड रखने पड़ते हैं। इनको बनाना भी आसान नहीं है, लंबी कतार लगाने के साथ भरपूर समय चाहिए साथ में तनाव झेलने की हिम्मत भी। ऐसे में याद आता है 'दीपक' की ये पंक्तियां-
तंगहाल लोगों को खूबसूरत सपने दिखाकर
बरगलाना आसान
यह सिद्धांत लोकतंत्र की जान है।

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