Lok Sabha Speaker election: परंपरा तोड़ स्पीकर के चुनाव के लिए क्यों अड़ी कांग्रेस, INDIA bloc को क्या मिलेगा?
Lok Sabha Speaker Election News: 18वीं लोकसभा में भारतीय संसदीय लोकतंत्र की दशकों पुरानी परंपरा टूट गई है। लोकसभा स्पीकर पद के लिए चुनाव हो रहा है। देश में पहले आम चुनाव के बाद ऐसी नौबत कभी नहीं आई थी। इस पद पर आम सहमति से ही चुनाव होता रहा है।
सत्ताधारी एनडीए के प्रत्याशी और पूर्व लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ विपक्षी इंडिया ब्लॉक ने केरल से कांग्रेस सांसद कोडिकुन्निल सुरेश को उतारा है।

लोकसभा स्पीकर के सर्वसम्मति से चुनाव की कोशिश नाकाम
लोकसभा अध्यक्ष किसी एक दल का नहीं होता, बल्कि वह पूरे सदन का अध्यक्ष होता है। इसी भावना के तहत सर्वसम्मति से इसके लिए चुनाव की परिपाटी बन गई थी। ऐसा नहीं है कि इस बार इसके लिए कोशिश नहीं हुई।
विपक्ष शर्तों पर सर्मसम्मति बनाना चाहता था- पीयूष गोयल
केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता पीयूष गोयल ने कहा, 'सुबह में राजनाथ सिंह मल्लिकार्जुन खड़गे से चर्चा करना चाहते थे। वे व्यस्त थे, इसलिए कहा कि केसी वेणुगोपाल आपसे बात करेंगे। लेकिन, टीआर बालू और केसी वेणुगोपाल के साथ बातचीत में पुरानी मानसिकता कि 'शर्तें हम तय करेंगे' फिर से दिखाई पड़ी।'
वे बोले, 'उनकी शर्त ये थी कि पहले यह तय हो कि लोकसभा का डिप्टी स्पीकर कौन होगा और तब स्पीकर को समर्थन दिया जाएगा।'
कांग्रेस ने पहले डिप्टी स्पीकर का नाम मानने की शर्त रखा- राजीव रंजन सिंह
विपक्षी इंडिया ब्लॉक की ओर से के सुरेश को प्रत्याशित घोषित करने से ठीक पहले कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल और डीएमके नेता टीआर बालू केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह से मिलने पहुंचे थे। इसके बारे में एक और केंद्रीय मंत्री और जेडीयू नेता राजीव रंजन सिंह ने कहा कि सर्वसम्मति की बात इसलिए टूट गई, क्योंकि दोनों नेताओं ने राजनाथ सिंह के सामने ओम बिरला का समर्थन करने के लिए पूर्व शर्त रख दी।
उन्होंने कहा, 'उन्होंने रक्षा मंत्री से बात की। रक्षा मंत्री ने उन्हें एनडीए की ओर से लोकसभा स्पीकर के उम्मीदवार के बारे में बताया और समर्थन मांगा। वेणुगोपाल बोले कि डिप्टी स्पीकर का नाम स्वीकार किया जाना चाहिए....रक्षा मंत्री ने कहा कि जब उसका चुनाव आएगा तो हम साथ बैठेंगे और चर्चा करेंगे....वे अपनी शर्त पर अड़े रहे....'
स्वस्थ लोकतंत्र में चुनाव होते रहना चाहिए- अखिलेश यादव
बाद में समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कांग्रेस के फैसले का बचाव करते हुए कहा कि 'यूपी में देखा है, क्या हमें उपाध्यक्ष का पद मिला? सरकारें लगातार ऐसे ही काम करती हैं....डेमोक्रेसी में...स्वस्थ लोकतंत्र में चुनाव होते रहना चाहिए.....'
इंडिया ब्लॉक में दरार की नींव?
हालांकि, जानकारी के मुताबिक तृणमूल कांग्रेस इसे कांग्रेस का एकतरफा फैसला बता रही है। तथ्य यह भी है कि के सुरेश के नामांकन के दौरान जो नेता उपस्थित थे उसमें भी इंडिया ब्लॉक के सहयोगियों की पूरी नुमाइंदगी नहीं थी। उसमें कांग्रेस, डीएमके और केरल के उसके सहयोगी दलों के नेता ही प्रमुखता से नजर आ रहे थे। सपा या टीएमसी का कोई नुमाइंदा नहीं नजर आया।

संख्या बल में भी कांग्रेस का पिछड़ना तय
अगर संख्या बल के हिसाब से भी देखें तो कांग्रेस ने अपने 8 बार के सांसद को स्पीकर के चुनाव में उतारा है तो उसे भी पता है कि ओम बिरला से उनकी हार निश्चित है। क्योंकि, बिरला को चुनाव जीतने के लिए मात्र 272 सांसदों का समर्थन चाहिए और एनडीए के पास अपने 293 सांसद हैं। जबकि, विपक्षी गठबंधन इंडिया ब्लॉक के पास कुल 234 सांसद हैं। इनके अलावा अन्य दलों के और निर्दलीय 16 सांसद भी हैं और उनमें से कई का झुकाव बिरला के पक्ष में दिखे तो हैरानी नहीं होगी।

परंपरा तोड़ने पर क्यों अड़ी कांग्रेस?
टीएमसी के अंदर से मिल रही सूचना और के सुरेश के नामांकन के दौरान की तस्वीर से साफ है कि चुनाव लड़ने के फैसले में कांग्रेस की ही चली है और उसमें तमिलनाडु और केरल के उसके सहयोगियों का उसे भरपूर समर्थन है। दरअसल, इसके माध्यम से कांग्रेस शुरू से ही सरकार को दबाव में रखना चाहती है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश में है कि तीसरे कार्यकाल में नरेंद्र मोदी की सरकार पहले दोनों कार्यकालों की तरह मजबूत नहीं है और विपक्ष उसे झुकाने की कोशिश कर सकता है।
राजीव रंजन सिंह ने भी कांग्रेस पर 'शर्तों और दबाव की राजनीति' करने का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा, 'लोकतंत्र में यह काम नहीं करता है।'
दलित कार्ड चलने की कोशिश
के सुरेश केरल से 8 बार के कांग्रेस सांसद हैं। वह दलित हैं और इस बात को कांग्रेस प्रोटेम स्पीकर के पद पर उनकी नियुक्ति नहीं होने के बाद से ही उठाने की कोशिश कर रही है। पार्टी नेता जयराम रमेश यहां तक कह चुके हैं कि उनके दलित होने की वजह से ही उन्हें प्रोटेम स्पीकर नहीं बनाया गया। जबकि, सरकार की दलील थी कि उनकी 8 बार की सदस्यता लगातार नहीं है। जबकि प्रोटेम स्पीकर भर्तृहरि महताब लगातार 7 बार के सांसद हैं और एक बार भी चुनाव नहीं हारे हैं।
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