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जानिए, आजमगढ़ में निरहुआ के लिए उमड़ रही भीड़ के मायने क्या हैं?

नई दिल्ली- भोजपुरी एक्टर और उत्तर प्रदेश की आजमगढ़ लोकसभा सीट से बीजेपी उम्मीदवार दिनेश लाल यादव उर्फ निरहुआ अपने पहले टेस्ट में सफल हो रहे हैं। वह क्षेत्र में कैंपेन के लिए जहां भी जा रहे हैं, उनकी एक झलक पाने के लिए भारी भीड़ उमड़ रही है। यानी इसबार यहां दो यादवों के बीच लोकप्रियता का मुकाबला हो रहा है। एक ओर पूर्व मुख्यमंत्री एवं समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव हैं, तो दूसरी ओर भोजपुरी बोलने वाले समाज के हर तबके के दिलों के हीरो निरहुआ हैं। बीजेपी के नजरिए से बड़ी बात ये है कि भोजपुरी एक्टर सिर्फ आजमगढ़ ही नहीं, बल्कि आसपास के बाकी और क्षेत्रों के लोगों के लिए भी क्राउड पुलर साबित हो रहे हैं। लेकिन, बड़ा सवाल है कि निरहुआ के लिए जुटने वाली भीड़ क्या वोट में तब्दील होगी?

अखिलेश के लिए कितनी बड़ी चुनौती हैं निरहुआ?

अखिलेश के लिए कितनी बड़ी चुनौती हैं निरहुआ?

अभी अखिलेश के पिता मुलायम सिंह यादव यहां के मौजूदा सांसद हैं। वो इसबार अपनी परंपरागत सीट मैनपुरी से चुनाव लड़ रहे हैं। निरहुआ को भी पता है कि आजमगढ़ में अखिलेश को चुनौती देना उनके लिए आसान नहीं है। क्योंकि, उन्हें अबकी बार यादव और मुस्लिम मतदाताओं के अलावा जाटव (दलित) मतदाताओं का समर्थन मिलने की उम्मीद है। लेकिन, निरहुआ को उम्मीद है कि वे भी यादव हैं, इसलिए यादव हरगिज उनकी भी अनदेखी नहीं करेंगे। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक वे कहते हैं, "बीजेपी से जुड़ने का मुझे गर्व है। यादव का मतलब अखिलेश-भक्त नहीं होता। यादव हमहुं के वोट दिहन।" अब उनका यह भरोसा कितना कारगर होता है, यह अभी कहना तो संभव नहीं है।

आजमगढ़ का सियासी अंकगणित

आजमगढ़ का सियासी अंकगणित

2014 के लोकसभा चुनाव में जब पूर्वांचल में मोदी की लहर चली थी, तब भी आजमगढ़ ने बीजेपी को निराश किया था। यहां से मुलायम सिंह यादव ने 63,204 वोटों से बीजेपी के रमाकांत यादव को हराया था। जबकि, बीएसपी के गुड्डु जमाली को बीजेपी के प्रत्याशी से सिर्फ 10,574 वोट कम मिले थे। अगर उस हिसाब से इसबार एसपी और बीएसपी के वोट शेयर को जोड़ दें, तो यह 63.18% तक पहुंच जाता है। यही नहीं, 2017 के विधानसभा चुनाव में एसपी-बीएसपी ने अलग-अलग चुनाव लड़कर भी आजमगढ़ लोकसभा क्षेत्र के अंदर आने वाली सभी 5 विधानसभा सीटें जीत ली थीं। अगर आजमगढ़ की जनसंख्या को देखें तो यहां यादव, मुसलमान और दलितों की जनसंख्या 65% से ज्यादा है। ऐसे में मौजूदा राजनीतिक समीकरण के हिसाब से अखिलेश यादव, निरहुआ पर भारी भरते दिखते हैं।

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बीजेपी की रणनीति में फिट हो गए?

बीजेपी की रणनीति में फिट हो गए?

बीजेपी भी जानती है मौजूदा परिस्थितियों में आजमगढ़ में जीत उसके लिए आसान नहीं है। लेकिन, निरहुआ की सभा में जुट रही भारी भीड़ उसकी असली रणनीति में फिट बैठती दिख रही है। क्योंकि, बीजेपी को निरहुआ के स्टार पॉवर के भरोसे बीएसपी-एसपी गठबंधन के वोट बैंक में कुछ न कुछ सेंध लगने की उम्मीद है। उसे भरोसा है कि निरहुआ की लोकप्रियता अगर आजमगढ़ में जीत न भी दिला सके, लेकिन आसपास की दूसरी सीटों मसलन- घोसी, गाजीपुर, संत कबीर नगर, अंबेडकर नगर, जौनपुर और बांसगांव में अन्य पिछड़ी जातियों (OBC) और अति पिछड़े वर्ग (MBC) के लोगों को ठीक-ठाक तादात में उसके पक्ष में मोड़ सकता है। निरहुआ इन वर्गों के जितने मतदाताओं को प्रभावित कर सकेंगे, वही बीजेपी के लिए बड़ी कामयाबी साबित हो सकती है। इसलिए, भोजपुरी स्टार अखिलेश पर निशाना साधने से भी नहीं चूकते। वे जगह-जगह अपने भाषणों में कह रहे हैं, "अखिलेश यादव ई पूर्वांचल के कौन यादव के बारे में सोचे लं।" मतलब साफ है कि वो यादव वोटरों पर भी डोरे डाल रहे हैं। इसमें वो किस हद तक कामयाब होंगे यह बड़ा सवाल है, लेकिन जितनी भी सफलता मिलेगी, वही बीजेपी के लिए फायदे का सौदा साबित हो सकता है।

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