वाराणसी में जो महागठबंधन नहीं कर सका वो मोदी ने कर दिखाया
नई दिल्ली। प्रियंका गांधी ने क्यों कदम पीछे खींच लिए? कदम पीछे खींचने थे तो क्यों उम्मीद जगायी? ये दोनों कांग्रेस कार्यकर्ताओं के मन में हैं और रहेंगे। वास्तव में इन प्रश्नों का जवाब देना कांग्रेस के लिए आसान नहीं है। ऐसा नहीं है कि कांग्रेस के पास जवाब नहीं है। वास्तव में चुनाव के वक्त इन प्रश्नों का जवाब देने की हिम्मत नहीं है। वैसे भी, जब चुनाव लड़ने से ही प्रियंका पीछे हट गयीं, तो क्यों पीछे हटी उसका जवाब देना प्राथमिकता में क्यों हो।

प्रियंका की वाराणसी से लड़ना इच्छा नहीं, रणनीति थी
अगर कांग्रेस को सच्चाई बतानी होती तो क्या सच सामने आता? प्रियंका की ओर से वाराणसी में नरेंद्र मोदी के खिलाफ़ चुनाव ल़ड़ने की इच्छा महज इच्छा नहीं थी, रणनीति थी। राजनेता चुनाव के मौके पर सार्वजनिक रूप से कभी अपनी इच्छा को वरीयता नहीं देते, रणनीति ही अहम होती है। इस रणनीति को सार्वजनिक करने के पीछे भी एक मकसद था। मकसद ये था कि वाराणसी में साझा विपक्षी उम्मीदवार के लिए माहौल तैयार करना।
कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में प्रियंका को लेकर उत्साह था। यही उत्साह मोदी विरोधी विपक्ष में भी होना चाहिए था। इसी उम्मीद पर भरोसा करते हुए प्रियंका खुद को अग्निपरीक्षा में झोंकना चाहती थी। प्रियंका चाहती थीं कि भले ही महागठबंधन का हिस्सा नहीं बन सकी हो कांग्रेस, लेकिन कम से कम वाराणसी में ऐसा मुमकिन हो। इसके बगैर प्रियंका के चुनाव मैदान में उतरने का कोई मतलब ही नहीं था। महागठबंधन ने प्रियंका के लिए कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। लिहाजा प्रियंका को मन मारकर अपनी इच्छा का दमन करना पड़ा। रणनीति पर कदम बढ़ते ना दिखें तो यही सही रास्ता है।
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महागठबंधन ने ऐसा क्यों किया?
सवाल ये है कि महागठबंधन ने ऐसा क्यों किया? क्यों नहीं नरेंद्र मोदी को वाराणसी में घेरने की रणनीति पर महागठबंधन ने काम किया? इसका जवाब जानना हो, तो दो तस्वीरों को याद कीजिए। एक जब योगी आदित्यनाथ की जीत के बाद मंच सजा था और नरेंद्र मोदी से मुलायम ने अपने बेटे अखिलेश की मुलाकात करायी थी और कानों में कुछ कहा था। दूसरी तस्वीर है संसद भवन में मुलायम सिंह का आखिरी भाषण। उस भाषण में नरेंद्र मोदी के दोबारा जीतकर आने और प्रधानमंत्री बनने की बात कही गयी थी। प्रियंका गांधी को साझा उम्मीदवार स्वीकार नहीं करने के पीछे यही दोनों तस्वीरें महत्वपूर्ण कारण हैं।

राजनीति में कोई स्थायी दुश्मन और दोस्त नहीं
राजनीति में कभी कोई किसी का स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता है। इस भावना को समाजवादी और बहुजन समाजवादी भी बहुत अच्छे से समझते आए हैं। आप गौर कीजिए बीजेपी ने मुलायम सिंह या अखिलेश यादव को घेरने के लिए कोई बड़ा उम्मीदवार नहीं दिया है। यह एक तरह की आपसी समझ है जिसका विभिन्न दलों के नेता पालन करते हैं। समूचे विपक्ष की यह प्राथमिकता में है ही नहीं कि नरेंद्र मोदी को वाराणसी में घेरा जाए। जबकि, 2019 के चुनाव संग्राम की यह सबसे ज़रूरी रणनीति होनी चाहिए थी।
राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस के लिए यह बड़ी और ज़रूरी रणनीति हो सकती थी कि नरेंद्र मोदी को वाराणसी में हराया जाए या कम से कम मजबूत घेराबंदी की जाए। प्रियंका गांधी ने इसी भावना का इजहार किया। मगर, कांग्रेस की इस भावना से महागठबंधन के घटक दलों की भावना मिलती नज़र नहीं आयी। इसका राजनीतिक मतलब ये है कि प्रियंका ने वाराणसी में चुनाव लड़ने से कदम पीछे नहीं किए है, बल्कि महागठबंधन ने प्रियंका का साथ देना कबूल नहीं किया जिस कारण प्रियंका को कदम पीछे खींचने पड़े।

मोदी ने वाराणसी से दिया एनडीए की एकजुटता का संदेश
प्रियंका का वाराणसी में चुनाव लड़ना चुनाव नतीजे से अलग भी संदेश देने की कोशिश होती। मगर, संदेश एकजुटता का जाना चाहिए था। अगर यही काम अधूरा रहता, तो पूरा संदेश ही उलट जाता। हार मिलती, सो अलग और पूरे चुनाव अभियान पर इसका उल्टा असर पड़ सकता था। जो काम प्रियंका नहीं कर सकीं यानी महागठबंधन और कांग्रेस समेत पूरे विपक्ष को मोदी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतारना। वही काम बीजेपी ने कर दिखाया।
नरेंद्र मोदी ने अपने नामांकन के समय सभी सहयोगी दलों की मौजूदगी सुनिश्चित करके वास्तव में प्रियंका की असफल हुई रणनीति को अपनी मजबूती के लिए इस्तेमाल कर दिखाया। मोदी ने वाराणसी से संकेत दिया है कि पूरा एनडीए एकजुट है जबकि उनके विरोधी बिखरे हुए हैं। प्रियंका के चुनाव नहीं लड़ने की स्थिति का सबसे बुरा नतीजा यही सामने आया है। मगर, इसके लिए न प्रियंका ज़िम्मेदार है न ही कांग्रेस। ज़िम्मेदार है तो वह सोच जो उत्तर प्रदेश में महागठबंधन को कांग्रेस से दूर करती है।












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