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लोकसभा चुनाव 2019: चुनाव के मौसम में फ़ेक न्यूज़ का फैलता मायाजाल

उत्तर प्रदेश के एक इलाके में वोट डालते लोग
Getty Images
उत्तर प्रदेश के एक इलाके में वोट डालते लोग

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत में इन दिनों आम चुनाव हो रहे हैं और भारतवासी इस बात का फ़ैसला कर रहे हैं कि अगले पांच साल किसकी सरकार देश को चलाएगी. चुनाव के इसी त्योहार में भ्रामक और ग़लत ख़बरों के प्रसार के मामले भी देखने को मिल रहे हैं.

जहां हर एक वोट की अपनी अहमियत होती है ऐसे में किसी ग़लत सूचना के आधार पर वोटों का भटकाव होने की गुंजाइश भी बढ़ जाती है, यही वजह है कि कई फ़ैक्ट चेक संस्थान और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर ग़लत सूचनाओं को जांचा-परखा जा रहा है.

ये तमाम बेहद शुरुआती क़दम हैं, यह साफ़ है कि झूठी सूचनाएं जितनी तेज़ी से फैलती हैं उनका कोई मुक़ाबला तक नहीं है.

चुनाव अभियान के दौरान ऐसी ही कई ग़लत और भ्रामक सूचनाओं का अंबार सा लग गया है. आइए, देखते हैं हाल में फैली ऐसी ही कुछ भ्रामक ख़बरें.


सोनिया गांधी और महारानी की संपत्ति

एक ख़बर बीते कुछ दिनों से सोशल मीडिया पर फैलाई जा रही है, जिसमें दावा किया जा रहा है कि भारत की मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी की नेता और इटली में जन्मी सोनिया गांधी ब्रिटेन की महारानी से भी अमीर हैं.

यह एक ग़लत ख़बर है, जिसका खंडन छह साल पहले हो चुका था.

भारत जैसे देश में जहां आमदनी में असमानता का होना एक बहुत बड़ा मुद्दा है, वहां किसी बड़ी हस्ती या नेता के बारे में यह बताना कि उनके पास असीम निजी धन दौलत है, उस नेता की छवि को भारी नुक़सान पहंचा सकता है.

सोनिया गांधी की संपत्ति से जुड़ी ऐसी ख़बरें साल 2012 में प्रकाशित हुई थीं.

सोनिया गांधी और ब्रिटेन की महारानी की संपत्ति से जुड़ी ख़बरें
BBC
सोनिया गांधी और ब्रिटेन की महारानी की संपत्ति से जुड़ी ख़बरें

साल 2013 में हफ़िंगटन पोस्ट ने दुनिया के सबसे अमीर लोगों की सूची प्रकाशित की थी जिसमें उन्होंने सोनिया गांधी का नाम भी शामिल किया था. हालांकि बाद में जब सोनिया गांधी ने इस सूची में अपना नाम शामिल करने पर सवाल उठाए तो उन्होंने उनका नाम हटा दिया था.

पिछले लोकसभा चुनाव यानी साल 2014 में सोनिया गांधी ने अपनी कुल संपत्ति नौ करोड़ रुपए बताई थी. जबकि ब्रिटेन की महारानी की संपत्ति इससे काफ़ी ज़्यादा है.

यह मामला भले ही पांच-छह साल पुराना हो लेकिन इस बार के लोकसभा चुनाव के दौरान इसे उठाया जा रहा है, यहां तक की सत्तारूढ़ दल बीजेपी के एक प्रवक्ता ने इस मामले को उठाया.

इतना ही नहीं, कई ख़बरों और पोस्ट में सोनिया गांधी को उनके रंग-रूप और उम्र से ज़्यादा ख़ूबसूरत दिखने पर भी सवाल किया गया. उनकी फ़र्जी तस्वीरें बनाकर उन्हें भारतीय नैतिक मूल्यों के ख़िलाफ़ बताया गया.

जबकि हक़ीक़त में वो तस्वीरें हॉलीवुड की एक मशहूर अदाकारा की थीं.

नरेंद्र मोदी अपने स्कूली दिनों में

एक और ख़बर जो बीते दिनों से सोशल मीडिया पर काफ़ी फैलाई गई वह भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की शैक्षणिक योग्यता से जुड़ी है.

गुजरात से आने वाले नरेंद्र मोदी एक चाय बेचने वाले के बेटे थे. उन्होंने अपनी चायवाले की छवि को बीते कई चुनावों में काफ़ी अच्छे से भुनाया है.

उन्होंने अपनी शैक्षणिक योग्यता में ख़ुद को पोस्ट-ग्रेजुएट बताया है.

इस बीच एक वीडियो सोशल मीडिया पर फैलाया जा रहा है जिसमें नरेंद्र मोदी को यह कहते हुए दिखाया जा रहा है कि उन्होंने हाईस्कूल (10वीं कक्षा) से आगे पढ़ाई नहीं की. इस वीडियो को कांग्रेस पार्टी के समर्थक काफ़ी शेयर कर रहे हैं.

असल में यह वीडियो काफ़ी पुराना है और शेयर किए जा रहे वीडियो में पूरे साक्षात्कार का छोटा सा अंश ही दिखाया जा रहा है. इसी वीडियो में नरेंद्र मोदी आगे बताते हैं कि उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा डिस्टेंस एजुकेशन के माध्यम से पूरी की है.

इस सच्चाई के बावजूद भी नरेंद्र मोदी की शिक्षा से जुड़ा वीडियो फ़ेसबुक, ट्विटर और यू-ट्यूब पर काफ़ी तेज़ी से फैलाया जा रहा है.

वो 'सर्वे' जो कभी हुआ ही नहीं

सोशल मीडिया पर कई बार फ़र्जी सर्वे और ऐसे अवॉर्ड्स के बारे में बताया जाता है जो हक़ीक़त में कभी होते ही नहीं.

ऐसी ही एक झूठी ख़बर संयुक्त राष्ट्र के संगठन यूनेस्को के हवाले से फैलाई जा रही थी जिसमें बताया जा रहा था कि यूनेस्को ने नरेंद्र मोदी को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री घोषित किया है.

यह ख़बर पूरी तरह ग़लत है क्योंकि यूनेस्को कभी भी इस तरह के अवॉर्ड नहीं देता.

फिर भी यह ख़बर चुनावी प्रचार के दौरान काफी फैलाई जा रही है.

इसी तरह से बीबीसी के नाम पर भी कई फ़र्ज़ी सर्वे फैलाए जाते हैं जैसे बीबीसी के नाम से एक सर्वे के आधार पर यह बताया गया कि कांग्रेस पार्टी दुनिया की सबसे भ्रष्ट राजनीतिक पार्टी घोषित हुई है.

इसी तरह बीबीसी के नाम से एक और झूठी ख़बर फैलाई जा रही है जिसमें दावा किया जा रहा है कि बीबीसी ने चुनावों में बीजेपी की जीत बताई है.

वहीं बीबीसी के ही नाम से एक अन्य ख़बर में कांग्रेस के चुनाव में आगे रहने की बात भी फैलाई जा रही है.

बीबीसी ने इस तरह की ख़बरों पर साफ़ किया है कि उन्होंने भारत में चुनाव से जुड़ा ऐसा कोई सर्वे नहीं किया है.

नक़ली उंगलियां?

चुनावी अभियान के दौरान मतदान प्रक्रिया से जुड़ी कई झूठी जानकारियां भी फैलाई जा रहा हैं.

भारत में मतदान के दौरान मतदाता की उंगली पर नीले रंग की स्याही लगा दी जाती है, जिससे यह पहचान की जा सके कि उन्होंने अपना वोट डाल दिया है.

मतदाता की उंगली पर नीली स्याही लगाई जाती है.
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मतदाता की उंगली पर नीली स्याही लगाई जाती है.

चुनाव के दौरान एक झूठी ख़बर फैलाई जा रही है जिसमें दावा किया जा रहा है कि एक तरह की नकली उंगली की मदद से लोग दोबारा वोट डालने में कामयाब हो रहे हैं.

इस ख़बर में बताया जा रहा है कि पहली बार वोट डालते समह नक़ली उंगली पर नीली स्याही लगाई गई और दूसरी बार वोट डालने के लिए असली उंगली का इस्तेमाल किया गया.

फ़ेक न्यूज़ से कैसे निपटा जाए?

फ़ेक न्यूज़ से निपटने के लिए कई समाचार संस्थानों और सोशल मीडिया प्लैटफॉर्म पर अलग-अलग तरह के क़दम उठाए जा रहे हैं. फिर भी यह एक बडी चुनौती बना हुआ है.

मेलबर्न की डीकिन यूनिवर्सिटी में सोशल मीडिया और भारतीय राजनीति की पढ़ाई करने वाली प्रोफ़ेसर ऊषा रोड्रिग्ज़ कहती हैं कि किसी के निजी मैसेज बॉक्स में कौन सी सूचनाएं आ रही हैं और वह उसे आगे शेयर कर रहा है इसे नियंत्रित करना बहुत मुश्किल काम है.

वे कहती हैं, ''जो लोग किसी ख़ास विचारधारा या ख़बर के प्रभाव में आ जाते हैं, उन्हें अगर ख़बर की सच्चाई बता भी दी जाए तो वे उसे मानते नहीं हैं.''

''इसी का फ़ायदा उठाते हुए राजनीतिक दलों के आईटी सेल लगातार ग़लत सूचनाओं से भरी ख़बरें फैलाते रहते हैं.''

भारत में बीते कुछ सालों में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है.
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भारत में बीते कुछ सालों में स्मार्टफ़ोन का इस्तेमाल तेज़ी से बढ़ा है.

एक अंतरराष्ट्रीय फ़ैक्ट चैक नेटर्वक के साथ काम करने वाली कंचन कौर बताती हैं कि ग़लत जानकारियों वाले संदेश उन ग्रुप्स में फैलाए जाते हैं जहां पहले से ही उस मामले पर पूर्वाग्रह बना हुआ हो, इस तरह के संदेश उसे और मज़बूत कर देते हैं.

इंडिया कनेक्टेड नामक किताब की सह-लेखिका शालिनी नारायण के मुताबिक़ आमतौर पर फ़र्ज़ी ख़बरों से जुड़े वीडियो वायरल किए जाते हैं क्योंकि लोगों को अपनी आंखों-देखी पर जल्दी विश्वास होता है.


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