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बिहार: राहुल गांधी ने जहां-जहां की सभा वहां हारे उम्मीदवार और जहां नहीं की वो अकेला जीता

By अशोक कुमार शर्मा
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नई दिल्ली। हिन्दीपट्टी में राहुल गांधी अब कोई फैक्टर नहीं रह गये हैं। अमेठी गंवाने के बाद उनकी हैसियत बेपर्दा हो गयी है। बिहार में कांग्रेस की सेहत तो पहले से खराब थी, अब उसने खाट पकड़ ली है। बिहार के कांग्रेस नेताओं ने राहुल गांधी पर जरूरत से अधिक भरोसा कर लिया था। पिछले साल तीन राज्यों की जीत के बाद राहुल का मैच जिताऊ कप्तान मान लिया गया था। इसलिए बिहार में अपने नौ उम्मीदवारों के लिए राहुल ने छह चुनावी सभाएं कीं। लेकिन जहां-जहां राहुल ने सभा की वहां-वहां के उम्मीदवार हार गये। बिहार में महागठबंधन की लाज बचाने वाले कांग्रेस के डॉ. जावेद किशनगंज में जीते तो जरूर लेकिन राहुल गांधी ने उनके लिए कोई प्रचार नहीं किया था। डॉ. जावेद अपने बल पर जीते।

कांग्रेस सांसद की हुई हार

कांग्रेस सांसद की हुई हार

पप्पू यादव की पत्नी रंजीत रंजन 2014 में सुपौल से कांग्रेस के टिकट पर सांसद चुनी गयी थीं। राजद के विरोध के कारण इस बार उनकी स्थिति डवांडोल थी। उनके लिए राहुल गांधी ने सुपौल में सभी की थी। लेकिन वोटरों ने सुपौल में कांग्रेस को नकार दिया। इस सीट पर जदयू के 73 साल के वयोवृद्ध नेता दिलेश्वर कामत जीते। उन्होंने रंजीत रंजन को 2 लाख 66 मतों के विशाल अंतर से हराया। पप्पू यादव के मुद्दे पर विवाद ने राजद और कांग्रेस को बहुत नुकसान पहुंचाया। राजद मधेपुरा में हारा तो कांग्रेस सुपौल में।

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शुरू में अलग-अलग रहे राहुल और तेजस्वी

शुरू में अलग-अलग रहे राहुल और तेजस्वी

राजद और कांग्रेस में शुरू से खींचतान रही। एलायंस का बड़ा पार्टनर मान कर तेजस्वी खुद को सुपीरियर समझते रहे। हालत ये थी कि चार चरण के चुनाव तक तेजस्वी ने राहुल गांधी के साथ मंच साझा नहीं किया। टिकट बंटवारे से नाराज राहुल गांधी ने भी तेजस्वी को भाव नहीं दिया। दोनों नेता अलग-अलग अपने दल के लिए चुनाव प्रचार करते रहे। इससे जनता में गलत संदेश गया। जब तक तेजस्वी को ये बात समझ में आती तब तक बहुत देर हो चुकी थी। समस्तीपुर की सभा में पहली बार राहुल और तेजस्वी एक मंच पर आये। लेकिन जनता ने दोनों के नकार दिया। समस्तीपुर में कांग्रेस के उम्मीदवार अशोक राम की करारी हार हुई। यहां लोजपा के रामचंद्र पासवान ने अशोक राम को 2 लाख 61 हजार वोटों से हराया। इससे यह भी पता चलता है कि तेजस्वी में वोट ट्रांसफर कराने की क्षमता नहीं है।

तेजस्वी के भी काम न आये राहुल

तेजस्वी के भी काम न आये राहुल

तेजस्वी ने शुरू में राहुल गांधी की उपेक्षा की। लेकिन बाद में जरूरत पड़ने पर मीसा भारती के लिए सभा करने की गुजारिश करनी पड़ी। तेजस्वी यादव को आंतरिक आकलन के बाद ये पता चल गया था कि पाटलिपुत्र सीट पर उनकी बड़ी बहन कठिन मुकाबले में फंसी हुईं हैं। आखिरी चरण में चुनाव प्रचार के लिए राहुल गांधी बिहार आये तो उन्होंने मीसा भारती के लिए विक्रम में सभा की। विक्रम सवर्ण बहुल इलाका है। तेजस्वी की मंशा थी कि राहुल गांधी की सभा से कुछ सवर्ण वोट मिल जाएंगे तो बहन की नैया पार लग जाएगी। सचमुच पाटलिपुत्र सीट पर कांटे का मुकाबला हुआ। 12वें राउंड तक मीसा भारती लीड लेती रहीं। लेकिन जैसे ही विक्रम इलाके के मतों की गिनती शुरू हुई रामकृपााल यादव आगे निकल गये। फिर फुलवारी शरीफ और दानापुर विधानसभा क्षेत्र में बढ़त ने रामकृपाल की जीत पक्की कर दी। यानी राहुल गांधी को सवर्ण वोटरों ने भी तवज्जौ नहीं दी। इसकी वजह से तेजस्वी की मुराद पूरी नहीं हुई।

राहुल का फ्लॉप शो

राहुल का फ्लॉप शो

राहुल गांधी ने इसके अलावा पूर्णिया, कटिहार, गया में भी चुनावी सभाएं की थीं। पटना में शत्रुघ्न सिन्हा के लिए रोड शो किया था। लेकिन नतीजा शिफर रहा। कटिहार में तो वे अपने मजबूत उम्मीदवार और सांसद तारिक अनवर को भी नहीं बचा सके। तारिक अनवर इससे पहले एनसीपी में थे और अपने बूते चुनाव जीतते रहे थे। लेकिन जैसे ही एक बार फिर कांग्रेस में आये दुर्दिन शुरू हो गये। तारिक अनवर को जदयू के दुलालचंद गोस्वामी ने 57 हजार से अधिक मतों से हराया। पूर्णिया में उदय सिंह भाजपा छोड़ कर कांग्रेस में आये थे। उदय सिंह पहले सांसद रहे हैं और पूर्णिया में उनका प्रभाव रहा है। लेकिन राहुल की सभा के बावजूद वे 2 लाख 63 हजार के बड़े अंतर से हारे। गया में बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी को भी राहुल गांधी से उम्मीद लगाये बैठे थे। भागदौ़ड़ कर उन्होंने अपने लिए राहुल गांधी की सभा की मंजूरी ली थी। राहुल के आने के बाद भी मांझी की नाव डूब गयी। शत्रुघ्न सिन्हा खुद के स्टारडम और राहुल गांधी के बल पर बड़ी-बड़ी बातें कर रहे थे। उनका लोकेशन बदला तो सिचुएशन भी बदल गया। राहुल के रोड शो के बाद भी शत्रुघ्न सिन्हा 2 लाख 84 हजार के विशाल अंतर से हारे।

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English summary
lok sabha election results: even rahul gandhi's campaign didn't help party candidates
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