एक सीट लाकर कमलनाथ सरकार बनी बकरे की अम्मा?

नई दिल्ली। लोकसभा चुनाव में मध्यप्रदेश की 29 सीटों में से कांग्रेस को केवल 1 सीट मिली, वह भी कमलनाथ के व्यक्तिगत प्रभाव वाली सीट छिंदवाड़ा है। कांग्रेस के सभी बड़े दिग्गज मध्यप्रदेश में हार गए। ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, अरुण यादव, विवेक तन्खा, कांतिलाल भूरिया, पंकज संघवी आदि सभी नेताओं की हार हुई है। अब कांग्रेस के पास हार के कारणों की समीक्षा के अलावा कोई काम नहीं बचा है। पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा से ज्यादा सीटें लाकर सरकार बनाने के कारण कांग्रेस का आत्मविश्वास ज्यादा था, लेकिन विधानसभा चुनाव के बाद 5 महीनों में ही भारतीय जनता पार्टी ने 17 प्रतिशत वोट ज्यादा हासिल किए, जबकि कांग्रेस को मिलने वाला मतों का प्रतिशत 6 प्रतिशत कम रहा। भाजपा को मध्यप्रदेश में 58 प्रतिशत वोट मिले हैं। जबकि कांग्रेस को 34.56 प्रतिशत वोट ही मिले।

आलाकमान को दे रहे दोष

आलाकमान को दे रहे दोष

अब कांग्रेस के नेता आलाकमान की उस रणनीति को दोषी बता रहे हैं, जिस कारण कठिन सीटों पर बड़े नेताओं को उतार दिया गया। कहा जा रहा है कि अगर ज्योतिरादित्य सिंधिया गुना की बजाय ग्वालियर से लड़ते और दिग्विजय सिंह भोपाल की जगह राजगढ़ से खड़े होते, तो शायद स्थिति अच्छी होती। विवेक तन्खा राज्यसभा के सदस्य हैं और भाजपा प्रदेशाध्यक्ष राकेश सिंह के सामने जबलपुर से उम्मीदवार थे। राज्यसभा सदस्य होने के कारण चुनाव में उनकी इच्छा ज्यादा नहीं थी। अपने-अपने चुनाव क्षेत्र में ही कांग्रेस के ये दिग्गज उलझे रहे और भाजपा ने शिवराज सिंह चौहान को प्रचार की कमान दे दी थी।

मोदी लहर दो पूरे देश में चली, लेकिन मध्यप्रदेश में स्थिति इतनी बुरी होगी, इसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी। जब तक साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी घोषित नहीं की थी, तब तक भोपाल में दिग्विजय सिंह की जीत के चर्चे थे, लेकिन साध्वी प्रज्ञा की उम्मीदवारी घोषित होते ही कांग्रेस नेताओं को मानो सांप सूंघ गया। उन्हें थोड़ी राहत मिली, जब साध्वी प्रज्ञा ने नाथूराम गोडसे और बावरी ढांचे के बारे में बयान दे दिए, लेकिन भाजपा नेताओं ने साध्वी प्रज्ञा को चेतावनी दे दी और वे चुप रही। साध्वी प्रज्ञा के भगवा वस्त्रों और मोदी लहर ने अपना काम कर दिखाया और बाजी पलट गई।

सिंधिया समेत कई की जीत मानी जा रही थी तय

सिंधिया समेत कई की जीत मानी जा रही थी तय

मध्यप्रदेश में कांग्रेस के जिन नेताओं की जीत तय मानी जा रही थी, उनमें ज्योतिरादित्य सिंधिया भी प्रमुख थे। ग्वालियर की पुरानी रियासत के सदस्य सिंधिया परिवार का प्रभाव ग्वालियर, गुना, भिंड, मुरैना, शिवपुरी और उज्जैन जिलों तक है। गुना और ग्वालियर संसदीय क्षेत्रों से सिंधिया घराने का कोई सदस्य कभी नहीं हारा। ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया तो अटल बिहारी वाजपेयी को भी यहां से चुनाव में हरा चुके थे, लेकिन इस बार ज्योतिरादित्य सिंधिया एक ऐसे ही नेता से हारे है, जो पहले कांग्रेस में था और उनका चुनाव प्रभारी रह चुका था। कहा जा रहा है कि ज्योतिरादित्य द्वारा मतदाताओं से लगातार मिलने-जुलने में कोताही के कारण मतदाता नाराज थे।

झाबुआ-रतलाम संसदीय क्षेत्र से कांतिलाल भूरिया का हारना भी कांग्रेस कार्यकर्ताओं को पच नहीं रहा। कांतिलाल भूरिया केन्द्र में मंत्री रहे है और प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष है। भाजपा के एक विधायक जी.एस. डामोर ने उन्हें 90 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया। विधानसभा चुनाव में कांतिलाल भूरिया के पुत्र विक्रांत को राजनीति में नए-नए आए जी.एस. डामोर ने हरा दिया था। कांतिलाल भूरिया की जीत के प्रति भी लोगों में आश्वस्ति थी, लेकिन मोदी लहर में वह आश्वस्ति भी कुछ काम नहीं आ सकी।

सिर्फ छिंदवाड़ा पर मिली जीत

सिर्फ छिंदवाड़ा पर मिली जीत

खरगोन अजजा आरक्षित सीट से कांग्रेस के गोविंद मुजाल्दा 2 लाख से ज्यादा वोटों से हारे। यहां इस क्षेत्र के 3 विधायक बाला बच्चन, विजय लक्ष्मी साधौ और सचिव यादव मध्यप्रदेश में मंत्री है। तीनों ही मंत्रियों ने खरगोन सीट के लिए जी जान लगा दी थी। भाजपा ने यहां नरेन्द्र मोदी की सभा करवाई और माहौल बदलता चला गया।

मुख्यमंत्री कमलनाथ के बेटे नकुलनाथ छिंदवाड़ा से अपनी विरासत किसी तरह बचा पाए। मुख्यमंत्री कमलनाथ छिंदवाड़ा विधानसभा उपचुनाव में खड़े हुए थे, वे करीब 25 हजार वोटों से ही जीत पाए, जबकि संसदीय क्षेत्र में नकुलनाथ की जीत केवल 37 हजार वोटों से हुई। मतगणना के अगले ही दिन मुख्यमंत्री कमलनाथ के एक वरिष्ठ अधिकारी के यहां दोबारा आयकर का छापा पड़ा। इसका भी राजनीतिक क्षेत्रों में अलग अर्थ निकाला जा रहा है। कहा जा रहा है कि अब कमलनाथ की सरकार मोदी सरकार के निशाने पर है। 230 सदस्यों वाली विधानसभा में कांग्रेस के 114 सदस्य है और सपा तथा बसपा और निर्दलियों के सहयोग से कमलनाथ की सरकार चल रही है। कांग्रेस को डर है कि कही उसके विधायक भाजपा से न मिल जाए। मध्यप्रदेश सरकार को लोग कह रहे है कि अब यह कुल मिलाकर बकरे की अम्मा जैसी स्थिति में है। उसका खैर मनाना कुछ समय ही रहेगा।

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