राहुल-प्रियंका को नहीं याद आ रहा बिहार! मात्र एक बार की सभा, क्यों कार्यकर्ता में भी नहीं दिख रहा जोश?

Lok Sabha Election: लोकसभा चुनाव अपने अंतिम पड़ाव की ओर बढ़ रहा है। सभी पार्टियों के नेता चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी और पार्टी महासचिव प्रियंका गांधी भी लगातर अलग-अलग क्षेत्रों के दौरे और रैलियां कर रहे हैं। लेकिन गांधी भाई-बहन पश्चिम बंगाल और बिहार में आने से थोड़ा परहेज कर रहे हैं। दोनों ही राज्यों में राहुल और प्रियंका के नाम मात्र के दौरे हुए हैं।

अब सवाल उठता है कि इतने जोर शोर से प्रचार में जुटे राहुल और प्रियंका बिहार और बंगाल से क्यों किनारा कर रहे हैं? दरअसल, बिहार की 40 से से 9 सीटों पर कांग्रेस चुनाव लड़ रही है लेकिन सूबे के अंदर कांग्रेस की स्थिति पूरी तरह से लालू यादव और तेजस्वी पर निर्भर है। कांग्रेस की ओर से कोई बड़ा चेहरा भी मैदान में नहीं दिख रहा है। बिहार में गठबंधन पर एक तरह से लालू परिवार का पूरा कंट्रोल है।

Rahul Gandhi Priyanka Gandhi

बिहार में लालू-तेजस्वी पर निर्भर होती कांग्रेस

कांग्रेस के कार्यकर्ता भी अब पार्टी के कार्यक्रम में अधिक रुचि लेते नजर नहीं आ रहे हैं। कांग्रेस की स्थिति यहां डमी की तरह होती जा रही है जहां पार्टी का हर फैसला लालू यादव और तेजस्वी यादव से प्रभावित होता दिख रहा है। इसके साथ ही साथ लोकसभा चुनाव शुरू होने से पहले से ही कांग्रेस के कई कार्यकर्ता पार्टी छोड़ कर दूसरे दलों का दामन थाम चुके हैं। कार्यकर्ताओं की घटती संख्या बल भी बिहार-बंगाल में राहुल और प्रियंका के दौरे को कम करने में बड़ा फैक्टर है।

बिहार में तेजस्वी का बढ़ता कद

बिहार में लगातार पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव का कद बढ़ता जा रहा है। चर्चा ये भी थी कि लालू यादव नहीं चाहते कि उनके समुदाय का कोई भी नेता बिहार में मजूत बने। सूत्रों की माने तो कुछ समय पहले ही अपनी पार्टी का कांग्रेस में विलय कर पूर्णिया से कांग्रेस की टिकट की आस लगाए बैठे पप्पू यादव को दबाने के उद्देश्य से ही गठबंधन में आरजेडी ने पूर्णिया सीट अपने पास रखी थी। जिसका असर ये हुआ कि पप्पू और कांग्रेस के रिश्ते में तो खटास आई ही साथ ही साथ पप्पू यादव ने इस सीट से निर्दलीय पर्चा भर दिया।

इंडिया ब्लाक से ममता की नाराजगी

कांग्रेस के किसी बड़े नेता का चुनावी मैदान में नहीं होना भी इन दोनों राज्यों में पार्टी की स्थिति पर गहरा प्रभाव डालती है। साथ ही बंगाल में ममता बनर्जी और कांग्रेस के बीच सीट शेयरिंग को लेकर हुई अनबन ने भी राहुल-प्रियंका को यहां से दूर किया है। हालांकि, टीएमसी सुप्रीमो ने हाल ही में इंडिया ब्लॉक को बाहर से समर्थन देने की बात कही है लेकिन बंगाल कांग्रेस से उनकी रंजिश जस की तश है।

ममता बनर्जी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के नाम को बतौर पीएम कैंडिडेट प्रस्तावित किए जाने का भी खुलकर विरोध किया था। इंडिया ब्लॉक की बैठक के दौरान संयोजक के नाम से लेकर और कई मुद्दों पर ममता बनर्जी नाराज हो गई थी और उनकी नाराजगी खुले तौर पर देखने को मिली थी। इसके ही परिणाम के तौर पर ममता ने सीट शेयरिंग के दौरान भी कांग्रेस के सीटों की मांग से इनकार कर दिया और फिर सभी सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का ऐलान किया।

नार्थ की बजाए साउथ में पार्टी का मजबूत स्थिति में होना

बंगाल के अंदर भी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं में अधिक तत्परता नजर नहीं आई। अभी भी साउथ इंडिया में कांग्रेस की स्थिति नॉर्थ इंडिया की तुलना में कहीं अधिक मजबूत है। ऐसे में राहुल गांधी ये भली-भांति जानते हैं कि यदि उनके तरफ से साउथ इंडिया में मेहनत की गई तो फिर पार्टी को वापस से मजबूत स्थिति में लाया जा सकता है। यही कारण है कि बंगाल और बिहार में कमजोर हुई पार्टी की स्थिति को लेकर कुछ बड़ा नहीं किया जा रहा है।

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