Lok Sabha Election: बंगाल में इस बार किसे समर्थन देगा मतुआ समुदाय? CAA के बाद इस पक्ष में बन रहा समीकरण
Bengal Lok Sabha Election News: नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने के बाद बंगाल में इस बार का लोकसभा चुनाव काफी दिलचस्प हो गया है। क्योंकि, इससे राज्य में मतुआ, नमोशूद्र और राजबंशी समुदाय सीधे प्रभावित होने वाले हैं।
पश्चिम बंगाल की कुल आबादी में अकेले मतुआ समुदाय की जनसंख्या 10 से 15 फीसदी मानी जाती है। अनुसूचित जाति में शामिल यह समुदाय अकेले राज्य की 5 लोकसभा सीटों पर फैसला करने में सक्षम है।

बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से आया है मतुआ समुदाय
मतुआ समुदाय मूल रूप से बांग्लादेश (पूर्वी पाकिस्तान) से आए हुए लोग हैं। जो पहले देश की आजादी के समय और फिर बांग्लादेश मुक्ति आंदोलन के दौरान वहां से प्रताड़ित होकर सुरक्षित आसरे की उम्मीद में आए थे।
दशकों से सीएए की मांग कर रहा था मतुआ समुदाय
इनमें से बड़ी आबादी ऐसी है, जिनके पास वहां से संबंधित किसी भी तरह के दस्तावेज भी नहीं हैं। नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) लागू होने से मतुआ समुदाय की दशकों पुरानी मांग पूरी हुई है। वह इसे दूसरी आजादी के जश्न की तरह मना रहे हैं।
2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने सीएए लागू करने का वादा किया था। तब पार्टी को इनका काफी समर्थन मिला था। भाजपा को 18 सीटें मिलने में इनका अहम रोल माना जाता है।
सीएए की वजह से मोदी सरकार से खुश हैं मतुआ
लेकिन, जब सीएए लागू करने में देरी हो रही थी तो 2021 में इसने बीजेपी के प्रति बेरुखी दिखाई और टीएमसी को फायदा मिल गया। लेकिन अब सीएए लागू हो जाने की वजह से यह समुदाय मोदी सरकार के प्रति बहुत ही खुश है।
मतुआ महासंघ के प्रमुख मोदी सरकार में मंत्री हैं
मतुआ महासंघ के प्रमुख और बनगांव लोकसभा सीट के बीजेपी सांसद शांतनु ठाकुर अभी केंद्र में मंत्री हैं। उन्होंने जनवरी में ही लोकसभा चुनाव से पहले सीएए लागू होने की घोषणा कर दी थी।
सीएए लागू होने से बीजेपी को मिल सकता है मतुआ का समर्थन
मतुआ समुदाय के बारे में माना जाता है कि यह उन्हीं के पक्ष में एकजुट होकर वोट देता है, जिसके लिए इनके नेता कहते हैं। इस मामले में बीजेपी का हाथ अभी ऊपर है। एक तो केंद्र सरकार ने मतुआ समुदाय की मांग पूरी की है, दूसरे उसके मुखिया सरकार का हिस्सा भी हैं।
सीएए को जानबूझकर एनआरसी से जोड़ रही हैं ममता
टीएमसी चीफ और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी सीएए के खिलाफ जितनी आक्रामक हैं, उससे भी यही लग रहा है कि मोदी सरकार ने लोकसभा चुनाव के पहले ऐसा दांव चल दिया है, जिसका मुकाबला करना उनके लिए आसान नहीं होगा।
टीएमसी ने बीजेपी का एक मतुआ एमएलए भी तोड़ा
इसी वजह से वो सीएए को एनआरसी से जोड़ रही हैं और यह दावा कर रही हैं कि सीएए का मतलब है नागरिकता गंवा देना। मतुआ समुदाय पर बीजेपी के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ही हाल ही में इस समाज के भाजपा विधायक मुकुट मणि अधिकारी को टीएमसी ने अपने में शामिल कर लिया था।
अधिकारी नदिया जिले के राणाघाट दक्षिण से भाजपा विधायक हैं। टीएमसी ने उन्हें राणाघाट से लोकसभा का टिकट दिया है। जहां से बीजेपी ने सीटिंग सांसद जगन्नाथ सरकार पर ही भरोसा जताया है।
ममता को अपनी कल्याणकारी योजनाओं पर भी भरोसा
इसके अलावा ममता बनर्जी की पार्टी कन्याश्री, युवाश्री और रूपाश्री योजनाओं का भी खूब बखान कर रही हैं, जिसके लाभांवितों में दलित बड़ी तादाद में हैं, जिसमें मतुआ भी शामिल हैं।
2019 में बीजेपी को 5 में से 2 सीटें मिली थी
मतुआ समुदाय का जिन पांच लोकसभा सीटों पर सीधा प्रभाव है, वे सभी दक्षिण बंगाल के बांग्लादेश से लगे सीमावर्ती इलाके हैं। इनमें से 2019 में बीजेपी ने राणाघाट और बनगांव सीटें जीती थी। मतुआ समुदाय का दक्षिण बंगाल के मुर्शिदाबाद, मालदा और दक्षिण 24 परगना की कई विधानसभा सीटों पर भी काफी प्रभाव है।
राजबंशी और नोशूद्र समुदाय ने बीजेपी का खुलकर दिया था
मतुआ समुदाय की तरह ही राजबंशी और नमोशूद्र समुदाय भी बांग्लादेश से ही भारत आया है, लेकिन उनकी जनसंख्या मतुआ के मुकाबले कम बताई जाती है। लेकिन, मतुआ समुदाय की तुलना में इन दोनों ने 2019 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी का दिल खोलकर साथ दिया था।
ये समुदाय मुख्य तौर पर उत्तर बंगाल में हैं और इनकी सहायता से बीजेपी जलपाईगुड़ी, कूचबिहार और बालुरघाट लोकसभा सीटें जीत गई थी। ऐसे में इस बार इनकी मांग पूरी होने की वजह से भाजपा की उम्मीदें काफी बढ़ गई हैं।
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