चुनावी किस्से: UPSC परीक्षा पास कर इंटरव्यू देने दिल्ली पहुंचे, किस्मत ऐसी कि इंदिरा गांधी ने दिया टिकट, फिर..
Rambhagat paswan: वो साल 1970 का था। दलित जाति से आने वाले एक प्रतिभाशाली छात्र राम भगत पासवान यूपीएससी की मुख्य परीक्षा पास कर चुके थे। वे आईएएस अफसर बनने का सपना लिए दरभंगा से दिल्ली पहुंचे। अब उनके और उनके सपने के बीच बस एक इंटरव्यू शेष था।
संयोगवश दिल्ली पहुंचने पर उनकी मुलाकात कांग्रेस के दिग्गज नेता ललित नारायण मिश्रा, विनोदानंद झा और नागेंद्र झा से हुई। ललित नारायण मिश्र और अन्य नेता राम भगत की प्रतिभा से काफी प्रभावित हुए। उन्होंने राम भगत को इंटरव्यू की तैयारी छोड़ राजनीति से जुड़ने की सलाह दी।

इतना ही नहीं, राम भगत को रोसड़ा से कांग्रेस(आई) का टिकट भी दिलवा दिया गया। कांग्रेस (आई) इंदिरा गांधी की पार्टी थी। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने एक साल पहले 1969 में अपना विरोध होता देख पार्टी तोड़ डाली थी और अपनी एक अलग कांग्रेस पार्टी खड़ी कर दी थी। कांग्रेस दो भागों में बंट चुकी थी तो जाहिर है कि कई नेता कांग्रेस (आर) में रह गए थे।
नेताओं के इस वैक्यूम का फायदा राम भगत पासवान को मिला। राम भगत फौरन पार्टी सिंबल लिए दरभंगा आ गए। लेकिन यहां समस्या ये थी कि उनके पास किसी प्रकार का राजनीतिक अनुभव नहीं था। कोई उन्हें जानता नहीं था। उनके पास सिर्फ इंदिरा गांधी का नाम था। उनके पास प्रचार के लिए एक साईकिल होती थी। उन्होंने अपनी साईकिल से अपना पूरा ईलाका छान मारा।
खुद की मेहनत और इंदिरा गांधी की लोकप्रियता का फायदा राम भगत को मिला। उन्होंने चुनाव में संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी के उम्मीदवार रामसेवक हजारी को पराजित कर दिया था। राम भगत 1971 में रोसड़ा के सांसद बन गए।
रोसड़ा लोकसभा सीट से दो बार कांग्रेस से सांसद और एक बार राज्यसभा सदस्य रहे दरभंगा के पतोर क्षेत्र के मधुबन निवासी राम भगत पासवान के परिवार में राजनीति में अब कोई सक्रिय नहीं है। पत्नी विमला देवी (85) प्रधानाध्यापक पद से सेवानिवृत्ति के बाद परिवार के साथ दरभंगा के लहेरियासराय में रहती हैं।
विमला देवी ने दैनिक जागरण से बात करते हुए बताया कि राम भगत ने चुनाव लड़ने के लिए सीएम कॉलेज स्थित डाकघर के पोस्टमास्टर की नौकरी भी छोड़ दी थी। उस वक्त उन्हें पोस्ट ऑफिस की नौकरी में 150 रुपये मिलते थे। नौकरी छोड़ने के बाद विमला देवी को मिलने वाले 75 रुपये वेतन में दोनों गुजारा करने लगे।
आपातकाल के बाद कांग्रेस की लोकप्रियता में काफी कमी आ गई थी। ऐसे में साल 1977 में राम भगत पासवान भारतीय लोकदल से लड़ रहे रामसेवक हजारी के हाथों चुनाव हार गए। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्यसभा का सदस्य बनाया। हालांकि कुछ सालों के बाद साल 1984 में हुए चुनाव में उन्होंने एक बार फिर लोकदल से प्रत्याशी रहे रामसेवक हजारी को पराजित कर दिया।
इसके बाद वर्ष 1989 और 1996 के चुनावी मैदान में उतरे, लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। 12 जुलाई, 2010 को उनका निधन हो गया। राम भगत पासवान के तीन बेटे और दो बेटियां हैं मगर सभी सभी अपने रोजी-रोजगार में लगे हैं। अब कोई भी राजनीति में नहीं है।












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