Lok Sabha Election 2024: यूपी में आज हुए चुनाव तो सपा और भाजपा में किसकी जमीन ज्यादा मजबूत?
UP Lok Sabha Election 2024: पिछले दो लोकसभा चनावों में उत्तर प्रदेश ने ही बीजेपी को दिल्ली में भगवा विजय पताका लहराने का मौका दिया है। पार्टी अबकी बार 400 पार का सपना देख रही है तो उसका भरोसा भी यूपी से ही मिल रहा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के यूपी से चुनाव लड़ने के चलते यह यूं भी नजरों में रहता है। इस बार तो अयोध्या में राम जन्मभूमि पर भगवान राम के मंदिर के उद्घाटन ने पार्टी को अभी से चुनावी नैरेटिव सेट करने का अवसर दे रखा है। चुनावी वर्ष में बीजेपी जैसी पार्टी के पास इस तरह का नैरेटिव होना पूरे विपक्ष खासकर इंडिया ब्लॉक के लिए भारी चुनौती है।

यूपी में इंडिया ब्लॉक रोकेगा बीजेपी का विजय रथ?
इंडिया ब्लॉक की पार्टियां जैसे समाजवादी पार्टी, कांग्रेस या फिर राष्ट्रीय लोकदल जाति और स्थानीय मुद्दों को हवा देकर इसके विजय रथ रोकने की कोशिश कर रहे हैं। बीएसपी तो फिलहाल एक खास वोटबैंक होने के बावजूद हाशिए पर ही नजर आ रही है। जाति-आधारित छोटी-छोटियां ज्यादातर बीजेपी के पक्ष में गोलबंद लग रही हैं।
दो लोकसभा चुनावों से यूपी में अजेय है बीजेपी
2014 में बीजेपी यूपी की 80 में से 71 सीटें ही नहीं जीती थी, उसे 42% वोट भी मिले थे। 2 सीटें सहयोगी अपना दल के खाते में गई थी। भाजपा की इस ताकत को तोड़ने के लिए सपा-बसपा और रालोद ने 2019 में गठबंधन किया। लेकिन, फिर भी बीजेपी का वोट शेयर 50% तक पहुंच गया। अलबत्ता पार्टी 62 सीटें ही जीती, लेकिन जीत का अंतर पिछली बार से भी दमदार हो गया था।
कमजोर सीटों को जीतने की रणनीति तैयार
बीजेपी को अबकी बार राम मंदिर पर पूरा भरोसा है और वह 2014 के आंकड़ों को भी पीछे छोड़ने के विश्वास के साथ काम कर रही है। इसके लिए पार्टी बहुत पहले से कोशिशें शुरू कर चुकी है।
इसने उन सीटों पर फोकस किया है, जो यह अबतक कभी नहीं जीती और जो 2014 में जीती थी, लेकिन 2019 में हार गई थी। पार्टी ने आजमगढ़ और रामपुर लोकसभा उपचुनावों में इस रणनीति में सफल होकर भी दिखाया है।
संभीवना है कि पार्टी इसी महीने ऐसी सीटों के लिए अपने उम्मीदवारों का एलान भी कर सकती है, ताकि उन्हें चुनाव प्रचार के लिए ज्यादा समय मिल सके।
पिछले कुछ चुनावों में पार्टी की बदली हुई रणनीति ने इसके हक में काम किया है। यूपी बीजेपी के अध्यक्ष भूपेंद्र सिंह चौधरी ने ईटी से कहा है, 'ऐसा नहीं है कि हम लोगों के पास चुनाव की वजह से जा रहे हैं। बीजेपी का प्रत्येक कार्यकर्ता पूरे साल लोगों के संपर्क में रहता है। हम चुनाव के लिए हमेशा तैयार रहते हैं।'
राम मंदिर के अलावा बीजेपी को केंद्र की नरेंद्र मोदी और प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार की अनेकों विकास योजनाओं को लेकर भी पूरा आत्मविश्वास है। 2022 के विधानसभा चुनावों के बाद सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी जैसे छोटे दलों ने भी भाजपा की ओर रुख किया है।
2022 मजबूत हुआ सपा का जनाधार
इस बार बीजेपी को टक्कर देने के लिए इंडिया ब्लॉक की सहयोगियों समाजवादी पार्टी, कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल में सीटों के बंटवारे पर बातचीत हो रही है। 2022 के विधानसभा चुनावों में सपा बीजेपी से हार तो गई थी। लेकिन, उसका वोट शेयर 10% से बढ़कर 32% हो गया था।
सपा का यह वोट शेयर 2012 के विधानसभा चुनावों से भी ज्यादा था, जब उसने पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनाई थी। यानी इस बात में दो राय नहीं कि इंडिया अलायंस में अखिलेश यादव की पार्टी ड्राइविंग सीट पर है और कांग्रेस और रालोद को उसकी बैसाखी का सहारा मिलने की उम्मीद है।
खास सोशल इंजीनियरिंग में जुटे हैं अखिलेश
पार्टी के प्रवक्ता सुधीर पंवार के मुताबिक इसने अब खुद को बीजेपी-बीएसपी की तरह कैडर-आधारित पार्टी के रूप में संगठित किया है। पिछड़े दलित अल्पसंख्यक- पीडीए (PDA) के नारे के दम पर अखिलेश नई सोशल इंजीनियरिंग में लगे हैं। निशाना बीएसपी के कोर वोट बैंक और गैर-यादव ओबीसी में बढ़ती बीजेपी की ताकत में सेंध लगाने पर है।
सपा की मजबूत सियासी जमीन में भी बीजेपी लगा चुकी है सेंध
जाति जनगणना, सामाजिक न्याय और बेरोजगारी पार्टी के मुख्य मुद्दे हैं। अखिलेश यादव उम्मीदवारों के चुनाव में जुट चुके हैं, जिसके लिए पार्टी सुप्रीमो अपनी निगरानी में सर्वे भी करवा रहे हैं।
पार्टी के लिए यह तथ्य चुनौती वाला है कि पिछले दो लोकसबा चुनावों से अकेले या गठबंधन में चुनाव लड़ने पर भी उसका ग्राफ 5 सीटों पर सिमटता रहा है। ऊपर से आजमगढ़ और रामपुर की मजबूत जमीन भी खिसक चुकी है।
कांग्रेस के लिए यूपी सिर्फ प्रतिष्ठा का सवाल
सीधे शब्दों में कहें तो कांग्रेस के लिए यूपी अब सिर्फ प्रतिष्ठा का सवाल रह गया है। गांधी-नेहरू परिवार का गढ़ अमेठी का किला पिछली बार ही ढह चुका है और भाजपा इस बार रायबरेली के लिए भी सारे घोड़े छोड़ चुकी है।
कांग्रेस को संगठन से ज्यादा चमत्कार से उम्मीद
जमीनी स्थिति ये है कि 2022 में पार्टी का वोट शेयर गिरकर 2.33% पहुंच गया और यह सिर्फ 2 सीटें ही जीत पाई। खुद प्रियंका गांधी वाड्रा जिस तरह से ठीक चुनाव से पहले उत्तर प्रदेश की जिम्मेदारियों से मुक्त होकर बिना दायित्व के महासचिव रह गई हैं, उससे अंदरूनी हालात का अंदाजा लग जा रहा है।
वैसे पार्टी को उम्मीद है कि कर्नाटक और तेलंगाना की तरह वह मुस्लिम वोट बैंक को यहां भी अपने साथ जोड़ लेगी। उसे दलितों के समर्थन की भी उम्मीद है, जिनका वोट बैंक मिलाकर कुल 40% तक पहुंचता है। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश में पार्टी को अपनी संगठन शक्ति से ज्यादा किसी चमत्कार की उम्मीद ज्यादा हो सकती है।
2022 में आरएलडी को मिला नया जीवन दान
2022 के विधानसभा चुनावों में आरएलडी को एक तरह से चुनावी जीवन दान मिला है। वरना, 2014 में अजीत चौधरी और 2019 में जयंत चौधरी का भी खाता नहीं खुल पाया था। 2022 में पार्टी सपा के साथ गठबंधन में 33 सीटों पर लड़ी और 8 सीटें जीत गई।
जाटों को एकजुट रखना बड़ी चुनौती
हालांकि, जब लोकसभा चुनाव की बात आती है तो पार्टी की चुनौती और बढ़ जाती है और जयंत चौधरी के लिए अपने जाट समाज को एकजुट रखना भी मुश्किल लगता है। क्योंकि, पिछले दो बार से यह वोट बैंक नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट करता रहा है। अबकी बार तो राम मंदिर से भी ऊर्जा मिलने की संभावना है।
अपने कोर वोटर बेस को बचाने में जुटीं मायावती
जहां तक मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) का सवाल है तो इसके साथ आज भी एक बड़ा वोट बैंक मौजूद है। 2019 में सपा-आरएलडी के साथ गठबंधन में यह लोकसभा की 10 सीटें जीती थी। लेकिन, अबकी बार इंडिया और एनडीए दोनों से बराबर दूरी बनाकर चलना तय किया है।
2024 के लोकसभा चुनाव में मायावती के सामने यूपी में प्रमुख चुनौती है, अपना स्वाभाविक दलित वोट बैंक एकजुट रखना। क्योंकि, इसपर अखिलेश यादव की भी नजर है और भाजपा भी सेंधमारी कर रही है। ऊपर से कांग्रेस के अरमान भी कम नहीं हैं।
बीएसपी को सबसे ज्यादा अपना युवा जनाधार खिसकने का डर सता रहा है। पार्टी सुप्रीमो ने हाल ही में अपने भतीजे आकाश आनंद को जो राजनीतिक उत्तराधिकारी घोषित किया है, उसके पीछ मुख्य वजह यही है कि वह अपना कोर-वोट बैंक एकजुट रखना चाहती हैं।












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