जानिए ITBP के 30 जवान अफगानिस्तान में क्यों चाहते हैं तैनाती ? दिल्ली HC भी हैरान
नई दिल्ली, 8 अगस्त: भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के 30 जवानों ने दिल्ली हाई कोर्ट में याचिका देकर गुहार लगाई थी कि उनकी फिर से अफगानिस्तान में ही तैनाती की जाए। इस अर्जी को देखकर दिल्ली हाई कोर्ट के जज भी हैरान रह गए। हालांकि, अदालत ने आईटीबीपी जवानों की यह याचिका इस आधार पर खारिज कर दी है कि उनकी नियुक्ति और तैनाती करने का अधिकार पूरी तरह से प्रशासनिक है और अदालतें इसमें दखल नहीं दे सकतीं। लेकिन, कोर्ट इस बात से चौंक गया है कि आखिर कैसे कोई अभी खुद से अफगानिस्तान जैसे मुल्क में नियुक्त करने की मांग कर सकता है, जो तालिबान के चलते भयानक हिंसा और उपद्रव की चपेट में है।

अफगानिस्तान में तैनाती की मांग पर अदालत हैरान
दिल्ली हाई कोर्ट ने आईटीबीपी के 30 जवानों की वह याचिका खारिज कर दी है, जिसमें उन्होंने हिंसाग्रस्त अफगानिस्तान में पुनर्नियुक्ति की मांग की थी। याचिका को देखकर अदालत ने कहा कि 'हम हैरान' हैं कि इतने 'खतरनाक हालात' के बावजूद कोई वहां पर वापस जाना चाहेगा। आईटीबीपी के इन जवानों की पहले अफगानिस्तान के कांधार में तैनाती की गई थी। जस्टिस राजीव सहाय एंडलॉ और जस्टिस अमित बंसल की बेंच ने कहा कि 'याचिकाकर्ता आईटीबीपी जैसे सशस्त्र सुरक्षा बल के जवान हैं, जरूरत के हिसाब से उनकी कहीं भी तैनाती की जा सकती है.....(लेकिन) उन्हें अफगानिस्तान में तैनात होने का कोई निहित अधिकार नहीं है।'
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अफगानिस्तान में भयानक हिंसा और अस्थिरता की स्थिति है
अफगानिस्तान में नियुक्ति के लिए आईटीबीपी की एक यूनिट है, जिसके जवानों को काबुल में भारतीय दूतावास और कांधार स्थित कॉन्सुलेट जनरल की सुरक्षा के लिए तैनात किया जाता है। लेकिन, जबसे हाल में तालिबान के हमलावर होने के बाद से अफगानिस्तान में हिंसा बढ़ी है और अस्थिरता का माहौल कायम हुआ है, भारत ने अस्थाई तौर पर कांधार के अपने कॉन्सुलेट जनरल ऑफ इंडिया को बंद करने का फैसला किया है। हाई कोर्ट ने भी वहां की स्थिति की ओर इशारा करते हुए कहा है, 'अफगानिस्तान में हालात अस्थिर हैं, और कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ-साथ वहां भारतीय मिशनों के संचालन के संबंध में तत्काल निर्णय लेने होंगे।'

तैनाती का फैसला प्रशासनिक मामला- दिल्ली हाई कोर्ट
आईटीबीपी के डायरेक्टर जनरल की ओर से अदालत में अपना पक्ष रखते हुए केंद्र सरकार के वकील गौरांग कांत ने कहा कि विदेशी मिशन पर जवानों की नियुक्ति, उन्हें हटाने और फिर से नियुक्त करना पूरी तरह से प्रशासनिक मसला है। इसपर अदालत ने संविधान के आर्टिकल 226 का जिक्र करते हुए सहमति जताई कि 'अदालतें यह तय नहीं कर सकतीं कि आईटीबीपी के जवानों को कहां और कैसे तैनात किया जाना चाहिए।' याचिकाकर्ताओं ने अदालत से यह भी निर्देश देने को कहा था कि उन्हें अफगानिस्तान में तैनाती वाले जवानों के पैनल से न हटाया जाए।

आईटीबीपी के जवान अफगानिस्तान में क्यों चाहते हैं तैनाती ?
सूत्रों की मानें तो विदेश में तैनाती के दौरान आईटीबीपी विदेश मंत्रालय को रिपोर्ट करता है; और देश से बाहर की नियुक्तियों के लिए जिन जवानों को चुना जाता है, उन्हें मोटे अतिरिक्त भत्तों के अलावा बाकी कई लाभ भी मिलते हैं। यही वजह है कि अफगानिस्तान में तैनाती जोखिम भरा जरूर है, लेकिन फिर भी इसके लिए वे लालायित रहते हैं। जिन जवानों की याचिका दिल्ली हाई कोर्ट ने 3 अगस्त को खारिज की थी, उनकी नियुक्ति कांधार स्थित कॉन्सुलेट जनरल ऑफ इंडिया में 2020 के अगस्त-सितंबर से फरवरी 2021 के बीच की गई थी। यह नियुक्ति दो साल के लिए की गई थी, लेकिन वहां हालात बिगड़ने के चलते एहतियात के तौर पर कॉन्सुलेट को ही अस्थाई तौर पर बंद करना पड़ा और भारतीय कर्मचारियों और जवानों को वापस बुला लिया गया। ये जवान अब काबुल स्थित दूतावास में उन जवानों की जगह तैनाती मांग रहे थे, जो अधिकतम कार्यकाल पूरा कर चुके हैं। (अंतिम तस्वीर-फाइल और सांकेतिक)












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