जानिए, सहारनपुर में मुस्लिम वोट क्या मायने रखता है?

नई दिल्ली- सहारनपुर के चुनावी महत्त्व का अंदाजा इसी बात से लगता है कि बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में अपने चुनाव प्रचार का आगाज यहीं से शुरू किया और महागठबंधन ने भी अपनी पहली साझा चुनावी रैली यहीं करने का फैसला किया। अगर गहराई से देखें तो हर पार्टी सहारनपुर में अपने फायदे के मुताबिक ध्रुवीकरण करना चाहती है। बीजेपी एंटी मुस्लिम वोट बैंक को अपने पाले में करने में लगी है, तो महागठबंधन और कांग्रेस एंटी-मोदी वोट बैंक को अपने पक्ष में गोलबंदी करना चाहते हैं। सहारनपुर लोकसभा क्षेत्र में कुल 17.22 लाख मतदाता हैं, जिनमें करीब 6 लाख मुसलमान हैं यानी एक-तिहाई से ज्यादा। ऐसे में यह तय है कि सहारनपुर में मुसलमानों का झुकाव जिस ओर होगा, उसी की जीत पक्की होगी। लेकिन, क्या इसबार ऐसा हो पाएगा?

उलझन में सहारनपुर के मुसलमान

उलझन में सहारनपुर के मुसलमान

सहारनपुर में इन दिनों सुबह से शाम तक कभी भी किसी चौक-चौराहे पर चले जाइए, चुनाव पर चर्चा ही सुनाई पड़ेगी। चाहे रिक्शे वाले हों या छात्र अथवा कोई छोटा-मोटा कारोबारी। ज्यादातर लोग खाली समय में राजनीतिक बहसबाजी और चुनावी मुद्दों पर ही अपना नजरिया रखते मिलेंगे। सहारनपुर के लोगों के लिए इसबार का चुनाव इसलिए भी दिलचस्प हो गया है क्योंकि यहां त्रिकोणीय मुकाबला होना तय लग रहा है। सबसे बड़ी बात ये है कि इस त्रिकोणीय मुकाबले के दो कोण मुस्लिम उम्मीदवारों के बीच फंसा है। इमरान मसूद (कांग्रेस) और फैजुल रहमान (BSP)। इनके मुकाबले में बीजेपी के मौजूदा सांसद राघव लखन पाल हैं। यहां के सियासी भविष्य तय करने का दम रखने वाले मुस्लिम मतदाताओं की उलझन ये है कि वो किसे वोट करें? एक तरफ इमरान मसूद का क्षेत्रीय मुसलमानों पर अपना प्रभाव है, तो दूसरी तरफ फैजुल रहमान को मायावती और अखिलेश की राजनीतिक गठबंधन की ताकत मिल रही है।

अपनी उलझन के बारे में सहारनपुर के रिक्शा चालक रमीज कहते हैं "इमरान मसूद एक अच्छे नेता हैं। उन्हें एक मौका मिलना चाहिए। लेकिन, मुझे पका है कि सारे 'हरिजन' वोट फैजुल रहमान को मिलेंगे और मैं सच में यही चाहता हूं कि बीजेपी हारे। इसलिए मैं अपने दिमाग में तय नहीं कर पा रहा हूं कि वोट किसे दूं?" यहीं की एक कॉलेज में आखिरी वर्ष की छात्रा कुलसूम कहती हैं कि उनके घर में भी आजकल पूरे दिन राजनीति पर ही बात होती रहती है। वे चाहती हैं कि सहारनपुर में एक यूनिवर्सिटी बने, जहां पढ़कर वो आगे टीचर बन सकें। उनका कहना है, "मैं चाहती हूं कि मुसलमानों के अधिकारों के लिए सामने आने वाला कोई मजबूत नेता हो। लेकिन, मैं तय नहीं कर पा रही हूं कि वोट किसे दूं?" उनका कहना है कि भाजपा ने सहारनपुर में यूनिवर्सिटी देने का वादा नहीं निभाया। गौरतलब है कि कुलसूम की तरह यहां लगभग 8 लाख महिला वोटर भी हैं।

मुस्लिम वोट बंटने के भरोसे बीजेपी

मुस्लिम वोट बंटने के भरोसे बीजेपी

सहारनपुर के लोगों को लगता है कि यहां मुस्लिम वोटों का बंटना तय है, जो बीजेपी के लिए फायदेमंद होगा। अब्दुल सलाम रोड, जो हाथ से बनी लकड़ी के सामानों के लिए मशूहर है, वहां पर ग्रोसरी शॉप चलाने वाले पंकज भी इस संभावना की तस्दीक करते हैं। वे कहते हैं, "हम जानते हैं कि एससी/एसटी (SC/ST) का वोट एवं मुसलमानों के वोट का बड़ा हिस्सा महागठबंधन में जाएगा, जो कि कांग्रेस के लिए नुकसानदेह है।" हालांकि वे खुद बीजेपी के मौजूदा सांसद के कार्यों से बहुत उत्साहित नहीं हैं। शहर में कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें लगता है कि कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के मेरठ के अस्पताल जाकर भीम आर्मी चीफ से भाई कहकर मिलना मसूद को फायदा दे सकता है। हालांकि तथ्य ये भी है कि उस मुलाकात के कुछ ही दिन बाद चंद्रशेखर आजाद रावण ने कांग्रेस को दलितों के लिए 60 साल में कुछ नहीं करने का आरोप लगा दिया था। सहारनपुर में ही एक हैंडीक्राफ्ट कारोबारी समीरन कहते हैं, "भीम आर्मी सहारनपुर की है और पश्चिमी यूपी में दलित युवाओं के बीच यह काफी लोकप्रिय है।" गौरतलब है कि इन्हीं चर्चाओं के बाद रावण के खिलाफ अपनी नाराजगी मायावती सार्वजनिक भी कर चुकी हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि वे उनके दलित वोट बैंक पर एकाधिकार को चुनौती देने लगे हैं। हालांकि, समीरन ये दावा करते हैं कि, "चुनाव के नतीजे देखना बहुत ही दिलचस्प होगा। इस बात की बहुत संभावना है कि मुस्लिम वोट यहां के परिणाम तय करेंगे।"

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सहारनपुर का चुनावी महत्त्व

सहारनपुर का चुनावी महत्त्व

इस क्षेत्र में जाट मतदाता भी भारी तादाद में हैं, जिनके ज्यादातर वोट लगभग हर चुनाव में बीजेपी को मिले हैं। इनके अलावा यहां करीब 3 लाख एससी/एसटी (SC/ST) और 1.5 लाख गुज्जर वोटर भी हैं। पंजाबी और सिख मतदाताओं की संख्या भी लगभग 1.45 लाख है। मुस्लिम वोट में संभावित विभाजन की आशंका से मुस्लिम प्रत्याशी भी आशंकित हैं। इमरान मसूद का कहना है, मुसलमान वोट "विचारधारा का वोट" है- "अगर मायावती जी को कांग्रेस से बात करने में दिलचस्पी नहीं है, तो वो सेक्युलर वोटों को बांट रही हैं।" वे ये भी कहते हैं कि "हमें नफरत और ध्रुवीकरण की राजनीति से ऊपर उठना चाहिए। मेरा फोकस युवाओं को रोजगार और किसानों को उनका बकाया दिलाने पर है।" ये वही मसूद साहब हैं, जो 2014 के चुनाव से पहले प्रधानमंत्री मोदी की "बोटी-बोटी" करने की बात कह चुके हैं। हालांकि, बाद में उन्होंने "रात गई, बात गई" कहकर इससे पल्ला झाड़ने की कोशिश भी की थी। लेकिन, मसूद के उस नफरत भरे अंदाज ने इस चुनाव में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा है। खुद नरेंद्र मोदी भी यहां की सभा उस भड़काऊ बयान को फिर से उठा चुके हैं।

अलबत्ता जाति और धर्म के अलावा लोकलुभावन वादे भी यहां के चुनावी चर्चा में मौजूद जरूर हैं, लेकिन उनका कोई खास प्रभाव पड़ता नहीं दिख रहा है। मसलन 60 की दहलीज पर खड़े वही रिक्शा चालक रमीज, कांग्रेस के 72,000 रुपये वाले वादे पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। वे रिक्शा चलाकर ही तकरीबन रोजाना 600 रुपये की कमाई कर लेते हैं। उनका कहना है कि ऐसे वादों पर अब तक वोट देते रहे हैं, लेकिन इसबार इसके झांसे में पड़ने वाले नहीं हैं। उनके शब्दों में- "सिर्फ चुनाव के समय में ही पार्टियों को गरीबों की याद आती है।" हालांकि बीजेपी के उम्मीदवार का कहना है कि वे विकास के मुद्दे पर ही चुनाव लड़ रहे हैं। समाज के सभी समुदायों के समर्थन की उम्मीद जताते हुए लखनपाल कहते हैं- "हमनें पहले भी विकास पर फोकस किया और इसबार भी विकास ही हमारा एजेंडा होगा। मेरी इच्छा है कि रोजगार के लिए किसी को यहां से बाहर न जाना पड़े। मैं जैसे ही चुना जाऊंगा, इसपर काम करना शुरू कर दूंगा।"

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