मोदी लौटेंगे या नहीं, इसके अलावा इन वजहों से भी दिलचस्प हैं ये चुनाव
नई दिल्ली- 2019 में नरेंद्र मोदी की सत्ता में वापसी होगी या नहीं, यह भारत के लोगों के लिए तो बड़ा मुश्किल सवाल है ही, दुनिया भी इसपर टकटकी लगाए हुए है। लेकिन, इसके अलावा भी कई ऐसे कारण हैं, जिसके चलते भारतीयों का ही नहीं, पूरे विश्व के लोगों की नजर भारतीय आम चुनाव पर टिकी रहती है। आइए हम यहां उन एक-एक वजहों को समझने की कोशिश करते हैं।

परिणाम का अंदाजा लगाना मुश्किल
भारतीय चुनाव में परिणामों के बारे में निश्चित तौर पर कुछ कह पाना हमेशा से मुश्किल रहा है। इस बार भी मतदाताओं का मूड इतना बंटा हुआ है कि उसके आधार पर कुछ भी अनुमान लगा पाना कठिन है। खासकर 2019 का चुनाव तो मोदी का समर्थन या मोदी के विरोध में ही होता दिख रहा है। इसलिए कोई दावे के साथ नहीं कह सकता कि नरेंद्र मोदी की सरकार सत्ता में दोबारा वापसी करेगी और न ही कोई ये कह सकता है कि इस सरकार का जाना तय है।
ऐसी स्थिति पहले भी रही है। चुनाव से पहले कई सर्वे कराए जाते हैं, चुनाव के दौरान वोट डालकर निकले लोगों से एग्जिट पोलिंग कराई जाती है, लेकिन कई बार उन सबकी भविष्यवाणियां बुरी तरह पिटती रही हैं। आमतौर पर विकसित देशों में ऐसे सर्वे के नतीजे कमोवेश परिणाम के अनुकूल रहते हैं, लेकिन भारत में कोई भी गच्चा खा सकता है।

विश्व का सबसे बड़ा चुनाव
इस साल के चुनाव में 90 करोड़ से ज्यादा मतदाता हैं। यह संख्या अमेरिका की पूरी आबादी से लगभग 3 गुना और यूरोप की कुल आबादी से भी ज्यादा है। 1951 के पहले चुनाव से भारतीय मतदाताओं की संख्या अब करीब 5 गुना बढ़ चुकी है। इसलिए इस साल 2014 के 17 लाख के मुकाबले 23.3 लाख ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है, जो कि 6 लाख अधिक है। यही नहीं बढ़े हुए मतदाताओं के कारण पोलिंग बूथों की संख्या भी 1 लाख बढ़ा दी गई है। 2014 में इसकी संख्या सिर्फ 9.3 लाख थी, जो इस बार बढ़कर 10.4 लाख हो चुकी है।
29 राज्यों और 7 केंद्र शासित प्रदेशों की 543 लोकसभा सीटों के लिए हुए चुनाव पर 2014 में केंद्र सरकार के 38.70 अरब रुपये खर्च हुए थे। यह इतना बड़ा संसाधन है, जिसे किसी सामान्य देश की अर्थव्यवस्था में लगा दिया जाए, तो उसकी अर्थव्यवस्था चमक सकती है।

बहुत ही जटिल है चुनावी प्रक्रिया
दुनिया के सातवें सबसे बड़े और दूसरी सबसे बड़ी आबादी वाले देश में लोकतंत्र का महापर्व मनाना साधारण काम नहीं है। यहां उत्तर में हिमालय के बर्फीले इलाकों में भी पोलिंग पार्टी भेजनी पड़ती है, तो अरब सागर के छोटे से द्वीप में भी। पश्चिम में रेगिस्तानी गांवों भी बूथ बनाया जाता है, तो उत्तर-पूर्व के जंगलों में भी। दुर्गम क्षेत्रों में मतदानकर्मियों को पहुंचाने के लिए भारतीय चुनाव आयोग हवाई जहाज का भी इस्तेमाल करता है, तो हेलीकॉप्टर और ट्रेनों का भी। कहीं पोलिंग पार्टी हाथियों पर सवार होकर पहुंचती है, तो कहीं ऊंटों पर और कहीं-कहीं उन्हें नावों का भी सहारा लेना पड़ता है। कई बार उन्हें मीलों पैदल ही चलकर पहुंचना पड़ता है।
यही कारण है कि इसबार स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने के लिए आयोग ने 1 करोड़ 10 लाख से ज्यादा कर्मचारियों को चुनाव ड्यूटी पर लगाने का इंतजाम किया है।

विविधता से भरपूर चुनाव
भारत विविधताओं से भरा देश है, तो यहां के चुनाव में भी कई तरह के रंग देखने को मिलते हैं। मसलन हाथी से लेकर, केले और कंघी तक कोई भी ऐसी चीज नहीं है, जिसे चुनाव निशान के रूप में इस्तेमाल न किया जाता हो। जिन मतदानकर्मियों को हिमाल की ऊंचाइयों में ड्यूट लगती है, उन्हें अपने साथ ऑक्सीजन सिलेंडर भी ले जाना पड़ता है और स्लीपिंग बैग एवं खाना भी।
छत्तीसगढ़ के दुर्गम जंगलों में आयोग को मेडिकल टीम भी भेजनी पड़ती है, ताकि वे मधुमक्खियों के हमले के बाद पोलिंग पार्टी और वोटरों का इलाज कर सकें। इसी तरह गुजरात में गिर के जंगल में इकलौते वोटर के लिए भी बूथ का इंतजाम करना पड़ता है, जहां शेरों के खतरे के बीच चुनाव कराया जाता है। लेकिन, फिर भी इस चुनाव का रंग कुछ खास है। पिछले चुनाव में हिमाचल प्रदेश के एक बूथ पर 98 साल के एक बुजुर्ग कई मील चलकर वोट डालने पहुंचे थे।

नारी शक्ति को सम्मान देने वाला चुनाव
इस बार के चुनाव में 43.2 करोड़ महिला मतदाता हैं, जो पिछली बार के 39.7 करोड़ से 8.8% अधिक हैं। इसके अलावा चुनाव आयोग ने पहली बार हर विधानसभा क्षेत्र के कम से कम एक बूथ के सारे मतदानकर्मी महिलाओं को ही बनाने का फैसला किया है। महिला मतदानकर्मियों की यह परंपरा पिछली बार से ही शुरू हुई थी, लेकिन अबकी बार उसका विस्तार हर विधानसभा क्षेत्र तक कर दिया गया है। आज भारत में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों की तुलना में लगभग 3 करोड़ ही कम रह गई है। यानी भारत में जो भी सरकार बनती है, उसमें महिलाओं की इच्छा को पूर्ण सम्मान मिलना तय है।

भारत के भविष्य का चुनाव
इस लोकसभा चुनाव में 6.6 करोड़ से ज्याद वोटर पहली बार मतदान करेंगे। जबकि, 1.5 करोड़ वोटर 18 से 19 आयु वर्ग के फर्स्ट टाइम वोटर होंगे। यह संख्या नीदरलैंड की कुल जनसंख्या के लगभग बराबर है। सबसे ज्यादा यानी 20.3 लाख फर्स्ट टाइम वोटर राजस्थान में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे। पिछले चुनाव में भी इनकी संख्या 2.3 करोड़ थी।
ये वो वोटर हैं, जो टेक्नो सेवी हैं, दुनिया की घटनाओं से ज्यादा जुड़े हुए हैं। ये भारत के भविष्य हैं।

डिजिटल चुनाव
भारत जैसे विशाल एवं विविधता वाले देश में ईवीएम से चुनाव कराना अपने आप में बहुत बड़ी चुनौती है। इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस साल कुल 23.3 लाख ईवीएम का इस्तेमाल होना है, जो कि पिछली बार के 17 लाख ईवीएम से 6 लाख ज्यादा है।
आज से डेढ़-दो दशक पहले की ही बात है भारत में चुनाव प्रचार के लिए पोस्टर-बैनर और लाउडस्पीकरों का ही सहारा होता था। आज करीब 45 करोड़ भारतीय स्मार्टफोन का इस्तेमाल करते हैं और करीब इतने ही इंटरनेट से जुड़े हुए हैं। करीब 30 करोड़ लोग फेसबुक और 20-20 करोड़ लोग वॉट्सअप और ट्विटर से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि आज भारत का चुनावी युद्ध सोशल मीडिया पर उतर आया है, जिसे सभी राजनीतिक दल इस्तेमाल करने लगे हैं। चुनाव आयोग ने भी इस बार इनको नियंत्रण करने के लिए खास दिशा निर्देश जारी किए हैं।












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