खजुराहो की मूर्ति टिप्पणी पर मचा बवाल, CJI BR Gavai ने दी सफाई, कहा– सभी धर्म बराबर
Khajuraho Remark Row: खजुराहो मंदिर परिसर में भगवान विष्णु की मूर्ति को लेकर दिए गए अपने हालिया बयान के बाद विवादों में घिरे भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई (CJI BR Gavai) ने अब सफाई पेश की है। गुरुवार, 18 सितंबर को उन्होंने स्पष्ट किया कि उनकी टिप्पणियों को सोशल मीडिया पर तोड़-मरोड़कर पेश किया गया है और उनका उद्देश्य किसी भी धर्म का अपमान करना नहीं था।
CJI गवई ने कहा - "किसी ने मुझे बताया कि मेरे बयान को सोशल मीडिया पर गलत तरीके से प्रस्तुत किया गया है। मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं।"

क्या था पूरा मामला?
दरअसल, बीते मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका पर सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश गवई ने एक टिप्पणी की थी। यह याचिका मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित यूनेस्को वर्ल्ड हेरिटेज साइट का हिस्सा 'जवरी मंदिर' में भगवान विष्णु की सात फुट ऊंची टूटी हुई मूर्ति को दोबारा स्थापित करने से जुड़ी थी।
याचिकाकर्ता ने अदालत से मूर्ति की पुनर्निर्माण और पुनर्स्थापना का आदेश देने की मांग की थी। इस पर CJI गवई ने कहा था कि यह मामला पूरी तरह से पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग (ASI) के अधिकार क्षेत्र में आता है। साथ ही उन्होंने इसे "पब्लिसिटी इंटरेस्ट लिटिगेशन" करार देते हुए टिप्पणी की थी - "अगर आप भगवान विष्णु के परम भक्त हैं तो उनसे प्रार्थना करें, ध्यान करें। उनसे ही कुछ करवाइए।"
सुनवाई के दौरान CJI गवई ने यह भी कहा था कि फिलहाल याचिकाकर्ता खजुराहो के शिव मंदिर में पूजा कर सकते हैं। उन्होंने कहा - "अगर आपको शैव परंपरा से कोई परहेज़ नहीं है तो आप वहां जाकर पूजा कीजिए। वहां पर एक बहुत बड़ा शिवलिंग है, जो खजुराहो के सबसे बड़े शिवलिंगों में से एक है।"
CJI ने अपनी सफाई में क्या कहा?
CJI की इस टिप्पणी के बाद सोशल मीडिया पर कई लोगों ने आलोचना शुरू कर दी और इसे हिंदू आस्था से जोड़कर विवाद खड़ा हो गया। हालांकि, अब मुख्य न्यायाधीश ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनकी मंशा किसी की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की नहीं थी। उन्होंने कहा कि भारत की विविध धार्मिक परंपराओं का वे सम्मान करते हैं और सभी धर्मों को बराबर मानते हैं।
खजुराहो की विश्व धरोहर स्थली से जुड़े इस मामले ने भले ही विवाद का रूप ले लिया हो, लेकिन CJI गवई का स्पष्टीकरण साफ करता है कि न्यायपालिका की भूमिका केवल संवैधानिक दायरे में आने वाले मामलों तक सीमित है। मूर्तियों के पुनर्निर्माण और संरक्षण से जुड़ा विषय पुरातत्व विभाग का है, अदालत का नहीं












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