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केरल विधानसभा चुनाव 2021 : क्या वामपंथ का अंतिम किला बच पाएगा?

तिरुवनंतपुरम। केरल में इस बार क्या होगा? चुनावी परम्परा के मुताबिक कांग्रेस नीत यूडीएफ सत्ता में आएगा या एलडीफ दोबारा जीत कर इतिहास रचेगा ? इस बार के चुनाव में कई ऐसी प्रवृतियां हैं जिनका मतदान में असर पड़ता दिख रहा है। केरल की चुनावी परीक्षा का रिजल्ट आज आवीएम में बंद हो जाएगा। केरल, देश में वामपंथ का अंतिम किला है। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल से लाल झंडा उखड़ जाने के बाद अब सारी निगाहें केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन पर टिक गयी हैं। क्या वे अंतिम किले को बचा पाएंगे ? क्या राहुल गांधी की अतिसक्रियता से कांग्रेस को चुनावी लाभ मिल पाएगा?

पार्टी में विजयन का विरोध

पार्टी में विजयन का विरोध

वैसे तो पी विजयन ने इस बार के चुनाव में सीपीएम पर एक तरह से प्रभुत्व स्थापित कर लिया है। दो टर्म विधायक का नियम बना कर सीपीएम के वरिष्ठ नेताओं थॉमस इसाक, एके बालन और जी सुधाकरन जैसे वरिष्ठ नेताओं को किनारे लगा दिया गया। ये वो नेता थे जो विजयन से सवाल पूछने की हैसियत रखते थे। लेकिन इसके बावजूद विजयन की राह आसान नहीं हुई। चुनाव प्रचार के दौरान जब सीपीएम में केवल विजयन की ही जय-जयकार होने लगी तो तुरंत इसका विरोध शुरू हो गया। चुनावी सभाओं में जब विजयन के समर्थक उन्हें केरल का कैप्टन कह कर नारा लगाने लगे तो ऐसा लगा कि कैडरों वाली पार्टी सीपीएम में व्यक्तिपूजा शुरू हो गयी। चूंकि सीपीएम की आंतरिक संरचना सामूहिक नेतृत्व पर आधारित है। यहां कोई व्यक्ति नहीं बल्कि दल प्रधान होता है। इसलिए विजयन का विरोध शुरू हो गया। पार्टी के नेता पी जयराजन ने फेसबुक पोस्ट लिख कर संदेश दिया, "केवल पार्टी ही कप्तान है। बाकी हर कोई एक कॉमरेड है।"

क्या दांव पर है विजयन की साख ?

क्या दांव पर है विजयन की साख ?

इस चुनाव में विजयन के खिलाफ कई मुद्दे उठे। कांग्रेस के सीनियर लीडर और विरोधी दल के नेता रमेश चेन्निथला ने विजयन सरकार पर ब्रेवरी-डिस्टिलरी घोटाला, स्विस कंपनी के साथ ई मोबिलिटी डील जैसे कई मुद्दे उठाये। अडानी से सौर ऊर्जा खरीदने के मामले में भी सरकार पर आरोप लगे। सोना तस्करी मामले में विजयन पर सबसे अधिक हमले हुए। लेकिन इन सब के बावजूद जब 2020 में स्थानीय निकाय के चुनाव हुए तो वामपंथी मोर्चे को जबर्दस्त कामयाबी मिली। भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों के बावजूद विजयन ने गरीब जनता का भरोसा जीत लिया था। लेफ्ट ने 941 ग्राम पंचायतों में से 514 जीते थे। कांग्रेस की अगुवाई में यूडीएफ को 375 ग्राम पंचायतों में जीत मिली थी। भाजपा ने भी 23 ग्राम पंचायतों में जीत हासिल कर सबको चौंका दिया था। दूसरी तरफ राहुल गांधी ने इस बार के चुनाव में पूरा जोर लगाया है। छात्रों और मछुआरों से खुद को जोड़ कर राहुल गांधी ने कांग्रेस के लिए समर्थकों का एक नया वर्ग तैयार किया है। अगर इस पैटर्न पर वोटिंग हुई तो विजयन की राह मुश्किल हो सकती है।

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    सबरीमाला विवाद से क्या विजयन को नुकसान ?

    सबरीमाला विवाद से क्या विजयन को नुकसान ?

    केरल के सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश की मंजूरी देकर क्या विजयन सरकार ने हिंदू भानवाओं को आहत किया है? कई हिंदू वोटरों का मानना है कि विजयन सरकार ने कोर्ट के फैसले को लागू करने में बहुत जल्दबाजी दिखायी जिससे लोगों में नाराजगी है। वैसे तो यह भाजपा के लिए अच्छा मौका माना गया लेकिन आश्चर्यजनक तरीके से कांग्रेस ने भी सबरीमाला मंदिर में सभी उम्र की महिलाओं के प्रवेश का विरोध कर दिया। कांग्रेस ने घोषणा कर रखी है कि वह सबरीमाला मंदिर की परम्पराओं को कायम रखने के लिए कानून बनाएगी। कानून तोड़ने वालों के लिए दंड का प्रावधान होगा। कांग्रेस की यह रणनीति उसके लिए दोधारी तलवार की तरह है। अगर उसे हिंदू वोट मिले को मुसलमान दूरी बना सकते हैं। हालांकि सबरीमाला मुद्दे पर कांग्रेस 2019 में लोकसभा का चुनाव जीत चुकी है। इस चुनाव में कांग्रेस नीत यूडीएफ ने 20 में से 19 सीटें जीती थीं।

    क्या वामपंथ का आखिरी किला बचेगा ?

    क्या वामपंथ का आखिरी किला बचेगा ?

    पश्चिम बंगाल में 34 साल तक शासन करने वाला लेफ्ट आखिरी क्यों से उखड़ गया ? आखिर क्या कारण है कि केरल में आज भी वामपंथी मोर्चा एक मजबूत ताकत है ? इस बात को समझने के लिए दोनों राज्यों में वामपंथी दलों की कार्यशेली पर गौर करना होगा। पश्चिम बंगाल में वामपंथी दलों का नेतृत्व वहां के भद्रलोक यानी उच्च जाति के कुलीन लोगों के हाथों में रहा। दलित और नामशुद्र समुदाय के लोगों को वामपंथी दलों में उभरने नहीं दिया गया। जाति की असमान सोच के कारण सीपीएम और अन्य कम्युनिस्ट दलों में धीरे-धीरे बिखराव शुरू हो गया। इसका फायदा पहले तृणमूल कांग्रेस ने उठाया। अब भाजपा उठा रही है। पश्चिम बंगाल के भद्रलोक ने राज्य के मुस्लिम समुदाय को पढ़लिख कर आगे बढ़ने का मौका नहीं दिया। अब मुस्लिम समुदाय ममता बनर्जी के साथ खड़ा है। इन बदलावों ने पश्चिम बंगाल में वामपंथी गढ़ को ध्वस्त कर दिया। जब कि केरल में दलित और पिछड़ी जातियों ने अपनी ताकत से वामपंथी दलों में अपना प्रभाव अर्जित कर लिया। उन्होंने ब्राह्मणों और नायरों को किनारे कर पार्टी में प्रमुख स्थिति बना ली। दक्षिण भारत में ब्राह्मणवाद के खिलाफ जो माहौल बना उससे वामपंथी दलों ने दलित और पिछड़ी जातियों में अपना आधार बनाया। केरल के मुख्यमंत्री पी विजयन पिछड़ी जाति, एझवा से ताल्लुक रखते हैं। दलितों, पिछड़ों और मुस्लिम समुदायक के समर्थन के कारण केरल में आज भी वामपंथ का परचम लहरा रहा है।

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