दीपा जोसेफ:केरल की पहली महिला एम्बुलेंस ड्राइवर, जिन्होंने वायनाड में लोगों को बचाने के लिए लगा दी जान की बाजी
Kerala's woman ambulance driver Deepa, केरल के वायनाड जिले में पिछले दिनों हुए विनाशकारी भूस्खलन ने सैंकड़ों परिवारों को तबाह कर दिया। अरबों रुपए की संपत्ति का नुकसान हुआ। इस त्रासदी के शिकार हुए लोगों की मदद के लिए सेना, एनडीआरएफ औऱ स्थानीय लोग हर संभव मदद कर रहे हैं। इन मददगारों में एक ऐसी महिला भी है। जो लगातार अपनी एंबुलेस से लोगों को अस्पताल पहुंचाती रही।
इनका नाम है दीपा जोसेफ। हादसे के बाद से दीपा जोसेफ की एम्बुलेंस सड़कों पर लोगों की मदद के लिए लगातार मौजूद रही। केरल की पहली महिला एम्बुलेंस चालक दीपा लगातार आपदाग्रस्त इलाकों से घायलों और मृतकों को अस्पताल ले जा रही थीं।

दीपा जोसेफ ने इस बचाव अभियान में बड़ी भूमिका निभाई। उन्होंने आपदा वाले क्षेत्र से घायलों को सुरक्षित स्थान पर ले जाने और मेप्पाडी में बने स्थायी मुर्दाघर में मृतकों व पीड़ितों के शरीर के अंगों को ले जाने का काम किया। फ्रीजर बॉक्स वाली एम्बुलेंस की जरूरत के बारे जानकारी मिलने पर वह कोझिकोड से वायनाड पहुंची थीं।
बेटी के गम में छोड़ी थी ड्राइविंग
बता दें कि, अपनी बेटी की ब्लड कैंसर से मृत्यु के बाद अवसाद के कारण दीपा ने ड्राइविंग से ब्रेक ले लिया था , लेकिन भूस्खलन के बाद के पांच दिनों ने उनकी लाइफ को पूरी तरह से बदलकर रख दिया है। उन्हें एहसास हुआ कि उनके साथ जो हुआ उससे आसानी से उभरा जा सकता था।
दीपा ने मीडिया से बात करते हुए बताया कि, एक और दो दिन हमने ऐसे लोगों को देखा जो यह मानने के लिए तैयार नहीं थे कि उनके अपने अब नहीं रहे। लेकिन उसके बाद के दिनों में वही लोग मुर्दाघर में आए और प्रार्थना करने लगे कि जो शव मिले हैं वो उनके प्रियजनों के हों। अगले दो दिनों में और दिल दहलाने वाले नजारे देखे। बहुत सारे शव, लोगों के कटे हुए अंग और बुरी तरह कुचले हुए शव। मैंने सोचा कि अब यह सहन नहीं कर पाऊंगी।'
दीपा को दिखा भयावह मंजर-
दीपा आगे कहती हैं कि, "मैं साढ़े चार साल से एम्बुलेंस चालक के रूप में काम कर रही हूं। मैंने कई दिनों पुराने और अत्यधिक सड़े हुए शव देखें हैं। लेकिन वायनाड में, रिश्तेदारों को कटे हुए उंगली या कटे हुए अंग को देखकर ही शवों की पहचान करनी पड़ी। यह उनके लिए परेशान कर देने वाला था।
दीपा ने बताया कि, पूरा शवगृह सड़े हुए शवों की दुर्गंध से भर गया था। शवों से निकलने वाली गैसों ने हमारी दृष्टि धुंधली कर दी।
दीपा ने शुरू में घर वापस जाने के बारे में सोचा लेकिन आपदा की गंभीरता को समझते हुए, उन्होंने कुछ दिनों के लिए यहीं रहने और मदद करने का फैसला किया। मैं एक दिन के लिए वापस गई और अपने बेटे को साथ ले आई। अब अन्य जिलों की एम्बुलेंस वापस चली गई हैं, और मैं भी जल्द ही वापस चली जाऊंगी।
हर कोई अब दीपा को जानता है-
दीपा अब आपदा प्रभावित क्षेत्रों में स्वयंसेवकों के बीच एक जाना-पहचाना चेहरा है। स्थानीय महिलाएं जिन्होंने भूस्खलन में अपना सब कुछ खो दिया। उन्हें अपनी डरावनी कहानियां सुनाती हैं। अपनी पीड़ा से जूझते हुए भी वे दीपा को सांत्वना देने के लिए समय निकालती हैं जब वह अपनी बेटी के बारे में सोचकर भावुक हो जाती हैं।
दीपा एम्बुलेंस चलाने के लिए वापस जाना चाहती है क्योंकि उसका एक बेटा है जो अब पढ़ाई कर रहा है। दीपा ने कहा,मैं अभी बेरोजगार हूं और जल्द ही एम्बुलेंस चलाने के लिए वापस जाना चाहती हूं।












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