क्या कर्नाटक में एक बार फिर से जाति ही रहेगा सबसे बड़ा चुनावी फैक्टर, सारे मुद्दे पीछे छूटे?
कर्नाटक चुनाव में लग रहा था कि इस बार जनता से जुड़े मुद्दे ही मतदाताओं को प्रभावित कर सकते हैं। लेकिन, अब दिख रहा है कि आखिरकार जातिगत मुद्दा ही सब पर भारी पड़ रहा है।

कर्नाटक में जैसे-जैसे मतदान का दिन नजदीक आता जा रहा है, यह स्पष्ट होता जा रहा है कि इस बार राज्य के वोटर किन मुद्दों के आधार पर वोट देंगे। राजनीतिक दलों के जो लक्षण दिख रहे हैं, उससे लगता है कि एक भार फिर से वहां जाति का ही मुद्दा सबसे अधिक हावी रहने वाला है। जिसके पॉलिटिकल इंजीनियरिंग में जाति का फॉर्मूला फिट कर गया उसी की लौटरी लग सकती है।

जनता से जुड़े मुद्दे कम पर गए?
कर्नाटक चुनाव से 6 महीने पहले तक कांग्रेस और जेडीएस जैसी विपक्षी पार्टियां महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे को लेकर भाजपा की डबल इंजन की सरकार के दावों के पीछे हाथ धोकर पड़ी थीं। उन्होंने इन मुद्दों पर कुछ लोकलुभावन वादे भी कर डाले। लेकिन, चुनाव में 15 दिन भी नहीं बचे हैं, तो ये सारे मुद्दे बैक सीट पर चले गए हैं।

सभी दल जातिगत समीकरण फिट करने में जुटे
दोनों ही विपक्षी दलों की चुनावी कहानियां पूरी तरह से बदली हुई नजर आ रही हैं। अब उनका पूरा फोकस जातिगत समीकरण को साधने पर टिक चुका है। विपक्ष ही नहीं सत्ताधारी बीजेपी ने भी विकास और डबल इंजन की सरकार का ट्रैक छोड़कर वही आजमाए हुए फैक्टर को दुरुस्त करने में जुट चुकी लगती है।

कर्नाटक में भी जातिगत आधार पर होती रही है वोटिंग
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक राजनीति में नैतिकता के अभियान से जुड़े और सिविक ऐक्टिवस्ट विवेक मेनन का कहना है, 'कर्नाटक में जाति की राजनीति हमेशा से मुख्य भूमिका में रही है।' 'जबकि कन्नड़ शायद सबसे ज्यादा घुलने-मिलने वाले लोग हैं, वह भेदभाव भी नहीं करते, लेकिन वह वोट अपनी ही जाति को देना पसंद करते हैं, कई बार इसकी वजह से वे वोट भी नहीं डालते।'

सभी दल जातिगत गोटियां सेट कर रहे हैं
कांग्रेस राज्य की भाजपा सरकार पर 40% कमीशनखोरी का आरोप लगा रही है, लेकिन साथ ही वह इस बात पर बहुत ज्यादा फोकस कर रही है कि उसने कुछ लिंगायत नेताओं के साथ बहुत गलत किया। वहीं बीजेपी मुस्लिमों से 4% कोटा झटकने के फैसले को हवा देने में लगी है। भाजपा सरकार ने इसे दो प्रभाविशाली जातियों लिंगायत और वोक्कालिका मं वितरित किया है। इस तरह से ये तमाम मामले आज बाकियों पर भारी पड़ रहे हैं।
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बदली रणनीति पर कांग्रेस के एक वरिष्ठ पदाधिकारी ने कहा है कि 'ऐसा नहीं है कि विपक्ष असल मुद्दों को लाने की कोशिश नहीं कर रहा है, लेकिन सत्ताधारी दल की ओर से उसे अनसुना कर दिया जा रहा है। बीजेपी के पास इन मुद्दों का कोई जवाब नहीं है।'

असल मुद्दे चुनाव में पीछे क्यों छूट जाता हैं?
कांग्रेस पदाधिकारी ने यह भी दावा किया है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, लोग अपने उम्मीदारों की जाति को लेकर ज्यादा चिंतित हैं और उनसे जुड़ना चाहते हैं। असल मुद्दे को भूल रहे हैं। जबकि महंगाई से बहुत बड़ी आबादी प्रभावित है। खासकर गरीब जनता की तो हालत बुरी हो रही है। एलपीजी की कीमतें बढ़ी हैं तो पेट्रोल-डीजल के दाम पिछले पांच वर्षों में 35-40% तक बढ़ चुके हैं। बाकी जरूरी चीजों के दाम भी बढ़े हैं। विभिन्न सरकारी विभागों में करीब 2 लाख पद खाली पड़े हैं।
पहले भी कुछ सर्वे आ चुके हैं, जिससे यह अंदाजा मिलता है कि मतदान के दिन आखिरकार जाति और स्थानीय मुद्दे ही हावी रहते हैं। पॉलिटिकल कमेंटेटर विश्ववास शेट्टी ने कहा है, 'यह एक विरोधाभास है, जिसे गहराई से समझने की जरूरत है।' उनके मुताबिक पार्टियां चुनाव अभियान को क्या धार देती हैं, वोटरों की पसंद उसपर भी निर्भर करता है।












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