कर्नाटक में BJP-JDS गठबंधन से 2024 के लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को कितना नुकसान?
कर्नाटक में 2024 के लोकसभा से पहले बड़ा राजनीतिक उलटफेर हुआ है। वहां बीजेपी और जनता दल (सेक्युलर) ने अगले साल होने वाले आम चुनावों के लिए गठबंधन का ऐलान किया है। मई में हुए विधानसभा चुनावों में बंपर जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस के लिए यह गठबंधन बड़ी चुनौती साबित हो सकती है।
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी नेता बीएस येदियुरप्पा के मुताबिक केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह जेडीएस के लिए 4 लोकसभा सीटें छोड़ने के लिए तैयार हो गए हैं। हालांकि, ये चारों लोकसभा सीटें कौन सी होंगी यह अभी पूरी तरह से फाइनल नहीं है।

2019 में कांग्रेस-जेडीएस मिलकर लड़े थे चुनाव
कर्नाटक में बीजेपी-जेडीएस का गठबंधन इसलिए चौंकाने वाला है, क्योंकि 2018 के विधानसभा चुनावों के बाद वहां जेडीएस और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाई थी। 2019 का लोकसभा चुनाव भी वहां कांग्रेस और जेडीएस ने बीजेपी के खिलाफ मिलकर लड़ा था।
जेडीएस के लिए कौन सी 4 सीटें छोड़ेगी बीजेपी?
जानकारी के मुताबिक जेडीएस मांड्या, हासन, तुमकुरु, चिकबल्लापुर और बेंगलुरु ग्रामीण सीटों की मांग कर रही है। जबकि, बीजेपी कोलार, हासन, मांड्या और बेंगलुरु ग्रामीण सीटें छोड़ने के लिए राजी है। मांड्या सीट अभी निर्दलीय सांसद सुमालता अंबरीश के पास है, जो 2019 में बीजेपी के समर्थन से जीती थीं।
बीजेपी-जेडीएस गठबंधन की वजह?
दरअसल, बीजेपी और जेडीएस ने 2023 के विधानसभा चुनावों का परिणाम देखने के बाद आपस में तालमेल करने का फैसला किया है। बीजेपी जहां संभावित खतरे को भांप चुकी है, वहीं पूर्व पीएम एचडी देवगौड़ा की पार्टी जेडीएस के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो चुका है।
कर्नाटक विधासनभा चुनावों में कांग्रेस को मिली बड़ी जीत
गौरतलब है कि पिछले कर्नाटक विधानसभा चुनावों में कांग्रेस ने राज्य की 224 में से 135 सीटें जीत ली थी और उसे 42.88% वोट भी मिले थे। जबकि, बीजेपी सिर्फ 66 सीट ही जीत सकी और उसे मात्र 36% ही वोट मिले थे। वहीं, जेडीएस को केवल 19 सीटें मिलीं और जितने सीटों पर वह लड़ी, उसमें कुल मिलाकर उसे 13.3% वोट मिले। भाजपा के वोट शेयर में पिछले लोकसभा चुनावों की तुलना में भारी गिरावट आई थी।
2019 के लोकसभा चुनावों का परिणाम
अब जरा 2019 के लोकसभा चुनावों के परिणाम को देखते हैं। बीजेपी राज्य की 28 में से 25 सीटें जीती थी और उसे करीब 52% वोट मिले थे। यही नहीं, जेडीएस के गढ़ मांड्या में भी उसके समर्थन से जीतने वाली निर्दलीय सांसद को पूरे राज्य में पड़े मान्य वोटों में से करीब 4% वोट हासिल हुए थे।
वहीं जेडीएस के साथ गठबंधन के बावजूद कांग्रेस सिर्फ 1 सीट जीती और करीब 32% वोट ही ला पाई थी। वहीं उसकी सहयोगी रही जेडीएस भी एक सीट जीती (हासन-देवगौड़ा के पोते की संसद सदस्यता अब खत्म हो चुकी है) और वह करीब 10% वोट ले पाई थी।
कांग्रेस की 20 से ज्यादा सीटें जीतने का है लक्ष्य
ऐसे में राज्य में पिछले दो चुनावों में भाजपा का जो वोट शेयर भयानकर रूप से गिरा है, वह उसकी भरपाई जेडीएस के साथ तालमेल करके करना चाहती है और कांग्रेस जो इस बार लोकसभा में 20 से ज्यादा सीटें जीतने का लक्ष्य लेकर चल रही है, उसे इसकी वजह से नुकसान झेलना पड़ सकता है।
कांग्रेस को क्यों हो सकता है नुकसान?
इसे थोड़ा और स्पष्ट करने के लिए 2014 के लोकसभा चुनावों परिणामों पर भी गौर किया जा सकता है। तब बीजेपी का वोट शेयर 43%, कांग्रेस का करीब 41% और जेडीएस का 11% रहा था। तब बीजेपी को 17, कांग्रेस को 9 और जेडीएस को 2 सीटें मिली थीं।
इस तरह से अगर हम 2014 के लोकसभा चुनावों के परिणाम के हिसाब से भी वोट शेयर को जोड़ें तो बीजेपी-जेडीएस मिलकर 54% के आंकड़े तक पहुंच सकती है,जो कि बीजेपी के 2019 वाले प्रदर्शन से भी बेहतर साबति हो सकता है। इससे कांग्रेस को विधानसभा चुनावों के मुकाबले भारी नुकसान हो सकता है।












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