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Karnataka Elections 2023: DK Shivakumar यूं ही नहीं कहलाते 'मैन ऑफ द कर्नाटक', जानिए अनकही बातें

DK Shivakumar in Hindi: डीके शिवकुमार कांग्रेस के वोक्कालिगा समुदाय के सबसे बड़े चेहरे हैं, वो पार्टी के शिल्पकार कहे जाते हैं।

Karnataka Elections

DK Shivakumar: 224 सीटों वाले कर्नाटक के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस पार्टी ने कमाल कर दिया है। ये जीत उसके लिए काफी अहम है क्योंकि इस जीत के जरिए लगातार चुनावों में हार का भार सह रही कांग्रेस में एकदम से जोश भर दिया है। पार्टी ने इस चुनाव में 136 सीटें जीतकर बड़ा कमाल किया है। कर्नाटक की कमान राज्य के दिग्गज नेता सिद्धारमैया के हाथ में दी जाएगी तो वहीं डीके शिवकुमार उपमुख्यमंत्री की भूमिका निभाएंगे।

हालांकि कांग्रेस के आलाकमान के इस फैसले से डीके के समर्थकों को तगड़ा झटका जरूर लगा है क्योंकि इसमें कोई शक नहीं कर्नाटक में कांग्रेस की स्टोरी लिखने में डीके शिवकुमार का बहुत बड़ा हाथ रहा है इसलिए इस बंपर जीत के बाद लोग उन्हें 'मैन ऑफ द कर्नाटक' कहने में बिल्कुल संकोच नहीं कर रहे।

डीके शिवकुमार को पार्टी का संकटमोचक कहा जाता है। जब-जब कांग्रेस पर संकट आया तब-तब डीके का ही ब्रह्मास्त्र पार्टी के काम आया। वो राज्य के सबसे धनी राजनेता में से एक हैं तो वहीं उन्हें Resort Politicis में भी महाराथ हासिल है। आज भले ही 60 साल के डीके को लंबा राजनीतिक अनुभव हो गया हो लेकिन पार्टी उनपर तब से ही भरोसा करती है, जब वो मात्र 23 साल के थे और उन्हें चार बार के MLA रहे एचडी देवगौड़ा के खिलाफ टिकट दिया था, ये बात साल 1985 की है, हालांकि इस जीत में उनकी 15000 वोटों से हार हुई लेकिन वो घर- घर पहचाने जाने लगे थे।

कांग्रेस में उन्हें युवा जोश के साथ तेज दिमाग भी नजर आया, साल 1985 में देवगौड़ा ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था और ये दो सीट थी होलानरसीपुर और साथनूर सीट, साथनूर में ही उन्हें डीके को हराया था। लेकिन जीत के बाद उन्होंने साथनूर सीट छोड़ दी और उसके बाद वहां पर उपचुनाव हुए जिसमें डीके जीत गए और यहीं से डीके का राजनीति करियर एक तरह से प्रारंभ हुआ था।

इस चुनाव में एचडी देवेगौड़ा ने दो सीटों होलानरसीपुर और बेंगलुरु के साथनूर सीट से नॉमिनेशन फाइल किया था। वो दोनों सीटों से जीत गए। बाद में देवगौड़ा ने साथनूर सीट छोड़ दी। यहां उपचुनाव हुए तो डीके शिवकुमार फिर मैदान में उतरे और जीत गए। डीके के असली सियासी करियर की शुरुआत यही से हुई है।

साल 1989 में डीके वापस साथनूर से जीते और मंत्री बनाए गए थे, तब उनकी उम्र मात्र 27 साल थी और वो राज्य के सबसे कम उम्र से मिनिस्टर थे। 1989, 1994, 1999 और 2004 मतलब की लगाचार चार सालों से डीके साथनूर सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे लेकिन साल 2008 में वो कनकपुरा सीट से चुनावी अखाड़े में उतरे और तब से वहां से जीतते आ रहे हैं इसलिए वो 'कनरपुरा की चट्टान' भी कहलाते हैं।

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