Kargil War में जब घायल 'शेरशाह' की दहाड़ से कांप गई पाकिस्तान की रूह! दुम दबाकर भागे दुश्मन-अकेले पलटा मोर्चा
Kargil Vijay Diwas: जुलाई 1999 की वो ठंडी रातें याद हैं? जब हिमालय की ऊंचाईयों पर गोलियों की आवाजें गूंज रही थीं और हर दिल में एक ही दुआ थी-भारत जीत जाए। इन्हीं गोलियों की गूंज के बीच एक नाम था जो सब पर भारी पड़ रहा था-कैप्टन विक्रम बत्रा। वो सिर्फ एक आर्मी ऑफिसर नहीं थे, वो जज़्बा थे, जुनून थे और जीता-जागता साहस का प्रतीक थे। कारगिल की लड़ाई में उन्होंने जो कर दिखाया, वो सुनकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
प्वाइंट 5140 और प्वाइंट 4875 जैसे मुश्किल मोर्चों पर विक्रम बत्रा ने ना सिर्फ विजय हासिल की, बल्कि दुश्मनों को ऐसा सबक सिखाया जो आज भी याद किया जाता है। उन्होंने अपनी टीम को हमेशा आगे बढ़ाया, खुद सबसे आगे रहे, और अपने आखिरी सांस तक देश के लिए लड़ते रहे।

7 जुलाई 1999 की सुबह, जब वो गंभीर रूप से घायल हो चुके थे, तब भी वो रुके नहीं। 5 दुश्मनों को मार गिराया और अपने साथी की जान बचाई। यही वजह है कि उन्हें 'शेरशाह' कहा गया-वो कोडनेम जो बाद में उनकी पहचान बन गया। 26 जुलाई को जब पूरा देश कारगिल विजय दिवस मनाता है, तो हर एक भारतीय की जुबां पर उनका ही नाम आता है। वो सिर्फ एक सोल्जर नहीं थे, वो एक प्रेरणा हैं। कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया, जो हमारे देश का सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। लेकिन जो सम्मान उन्हें देश की जनता से मिला, वो किसी भी मेडल से बड़ा है-अमरता का सम्मान। आज भी जब हम 'ये दिल मांगे मोर' सुनते हैं, तो सिर्फ एक आवाज गूंजती है-कैप्टन विक्रम बत्रा की। विक्रम बत्रा की शौर्य गाथा से Oneindia Hindi आपको रूबरू करा रहा है....
पालमपुर की खूबसूरत वादियों में 9 सितंबर 1974 को जन्मे विक्रम, बचपन से ही बहादुरी और साहस के प्रतीक थे। उन्हें भारतीय सेना में जाने का सपना हमेशा से था। उन्होंने यह सपना भारतीय सैन्य अकादमी देहरादून में 1997 में पास आउट होकर पूरा किया। जब कारगिल युद्ध छिड़ा, तो यह साहसी युवा देश की रक्षा के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़ा हो गया।
'शेरशाह' का उदय
कारगिल की ऊंचाइयों पर विक्रम बत्रा को 'शेरशाह' का कोडनेम दिया गया। प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने के दौरान उन्होंने अद्वितीय साहस का परिचय दिया। उन्होंने अपने सैनिकों को नेतृत्व प्रदान किया और मिशन को सफलतापूर्वक पूरा किया। उनके साहसिक कार्यों ने उन्हें 'शेरशाह' के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो उनकी अदम्य वीरता का प्रतीक बन गया।
'यह दिल मांगे मोर'
प्वाइंट 5140 पर विजय के बाद विक्रम बत्रा ने अपने अंतिम शब्दों में कहा, "यह दिल मांगे मोर"। यह वाक्य उनके अडिग संकल्प और साहस का प्रमाण था। उन्होंने इसे अपने जीवन का मंत्र बना लिया और आगे बढ़ते रहे।
प्वाइंट 4875 की लड़ाई
7 जुलाई 1999 की रात, प्वाइंट 4875 पर विक्रम बत्रा ने अद्वितीय बहादुरी का परिचय दिया। जब उनके एक साथी अधिकारी गंभीर रूप से घायल हो गए, तो उन्होंने अपने प्राणों की परवाह किए बिना उन्हें बचाने के लिए कदम बढ़ाया। उनके इस बलिदान ने यह साबित कर दिया कि उनके लिए साथी सैनिकों का जीवन और देश की रक्षा सर्वोपरि थी। इस वीरता के प्रदर्शन में, कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए।
सर्वोच्च सम्मान: परमवीर चक्र
कैप्टन विक्रम बत्रा को उनके अद्वितीय साहस और बलिदान के लिए मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह सम्मान केवल उनकी वीरता का प्रतीक नहीं है, बल्कि उनकी उस आत्मा का भी सम्मान है, जिसने देश के लिए सब कुछ न्योछावर कर दिया।
उनकी विरासत
कैप्टन विक्रम बत्रा का जीवन और बलिदान हर भारतीय के लिए प्रेरणास्रोत है। उनके माता-पिता, भाई-बहन, और पूरे देश ने उन्हें खोया, लेकिन उनकी वीरता और देशभक्ति की गाथा अमर हो गई। उनकी कहानी हर उस युवा को प्रेरित करती है जो देश की सेवा करने का सपना देखता है। आपकी वीरता और बलिदान को हम कभी नहीं भूल सकते। आप अमर हैं, हमारे दिलों में, हमारी यादों में, और हमारे देश के हर कोने में। जय हिंद!
कैप्टन विक्रम बत्रा का परिचय:
जन्म: 9 सितंबर 1974, हिमाचल प्रदेश के पालमपुर में।
शिक्षा: विक्रम बत्रा ने डीएवी कॉलेज, चंडीगढ़ से स्नातक किया और फिर भारतीय सेना में भर्ती हुए।
भारतीय सैन्य अकादमी: वह 1996 में भारतीय सैन्य अकादमी, देहरादून में शामिल हुए और 1997 में पास आउट हुए।
कैसे पड़ा 'शेरशाह' का उपनाम?
कारगिल युद्ध के दौरान, कैप्टन विक्रम बत्रा को "शेरशाह" का कोडनेम दिया गया था। कैप्टन विक्रम बत्रा की अद्वितीय बहादुरी और नेतृत्व के कारण उन्हें 'शेरशाह' कहा जाता है। उनके साहस और नेतृत्व के गुणों ने भारतीय सेना और देश के लोगों पर गहरा प्रभाव डाला।
कारगिल योद्धाओं की शौर्य गाथा, वनइंडिया की जुबानी
https://www.youtube.com/playlist?list=PLkLQB0QZKvQ-p_iPyN76OSO76Zo8iXvnY
सर्वोच्च बलिदान:
- कारगिल युद्ध: 1999 में भारत और पाकिस्तान के बीच कारगिल युद्ध छिड़ा। विक्रम बत्रा ने 13 जम्मू और कश्मीर राइफल्स के साथ इस युद्ध में हिस्सा लिया।
- प्वाइंट 5140: कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने साथी सैनिकों के साथ प्वाइंट 5140 पर कब्जा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी नेतृत्व क्षमता और साहस के कारण यह मिशन सफल रहा।
- प्वाइंट 4875: प्वाइंट 5140 पर विजय के बाद, उन्हें प्वाइंट 4875 पर कब्जा करने का आदेश दिया गया। इस दौरान उन्होंने अद्वितीय बहादुरी का परिचय दिया और कई पाकिस्तानी सैनिकों को मार गिराया।
- शहादत: 7 जुलाई 1999 को, प्वाइंट 4875 की लड़ाई के दौरान, कैप्टन विक्रम बत्रा ने अपने एक साथी अधिकारी को बचाने के प्रयास में अपनी जान गंवा दी। उनके बलिदान ने उन्हें भारत के सबसे बहादुर और सम्मानित सैनिकों में शामिल कर दिया।
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