क्या 'मिलॉर्ड' कर रहे हैं SC की अवमानना? बाबरी मस्जिद-राम मंदिर केस के फैसले पर रिटायर्ड जज ने क्यों उठाए सवाल
Justice RF Nariman on Supreme Court Ayodhya Verdict: सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस आरएफ नरीमन ने राम मंदिर-बाबरी मस्जिद मामले में सुप्रीम कोर्ट के पांच सदस्यीय संवैधानिक पीठ के ऐतिहासिक फैसले पर निराशा जताई है। उन्होंने सुप्रीम की संवैधानिक बेंच के फैसले पर न सिर्फ सवाल उठाया है, बल्कि यहां तक कह दिया है कि इस फैसले ने सेक्युलरिज्म के सिद्धांत के साथ न्याय नहीं किया है।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज और जाने-माने न्यायविद जस्टिस आरएफ नरीमन ने अयोध्या मसले पर 9 नवंबर,2019 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अब जाकर जिस तरह के सवाल खड़े किए हैं, खुद उससे उनकी मंशा पर प्रश्चचिन्ह लग सकते हैं। उन्होंने अपने ऐसे विचार पूर्व सीजेआई एएम अहमदी की याद में बने अहमदी फाउंडेशन के उद्घाटन भाषण के दौरान व्यक्त किए हैं।

संविधान पीठ की समझदारी पर रिटायर्ड जज ने उठाए सवाल
जस्टिस नरीमन ने जिस तरह की भावनाएं जाहिर की हैं, उससे लगता है कि वह हाल में कुछ मस्जिदों और दरगाहों से जुड़े विवादों से बहुत ही ज्यादा आहत हैं। लेकिन, उनके विचारों से लगता है कि वह देश की सर्वोच्च अदालत की संविधान पीठ के विद्वान जजों की समझदारी पर भी सवालिया निशान खड़े कर रहे हैं।
इस फैसले से सेक्युलरिज्म को उचित स्थान नहीं दिया गया- जस्टिस (रिटायर्ड) नरीमन
अयोध्या पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ही वहां भव्य राम मंदिर बनने का रास्ता साफ हुआ था और बाबरी मस्जिद के लिए मुस्लिम पक्ष को अयोध्या में ही मस्जिद बनाने के लिए पांच एकड़ जमीन राज्य सरकार को देने का आदेश मिला था। लाइवलॉ डॉट इन के मुताबिक जस्टिस नरीमन ने कहा है, 'मेरी राय में न्याय का सबसे भद्दा मजाक ये था कि इस फैसले से सेक्युलरिज्म को उचित स्थान नहीं दिया गया।'
लिब्राहन आयोग पर भी उठाए सवाल
जस्टिस नरीमन को 'सेक्युलरिज्म एंड द इंडियन कॉन्स्टिट्यूशन' विषय पर बोलने के लिए बुलाया गया था। उन्होंने कहा,'पहले सरकार ने लिब्राहन आयोग बनाया, जो 17 वर्षों तक सोया रहा और 2009 में अपनी रिपोर्ट दी। दूसरा, इसने अयोध्या अधिग्रहण क्षेत्र कानून और साथ ही सर्वोच्च अदालत को राष्ट्रपति का संदर्भ दिया,बल्कि मैं इसे शरारतपूर्ण तरीके से प्रस्तुत करूंगा,कि क्या मस्जिद के नीचे कोई हिंदू मंदिर था?'
'बाबरी मस्जिद के नीचे कोई राम मंदिर नहीं था'
एक जगह उन्होंने 2003 के आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया की रिपोर्ट की हवाला दिया कि इसे शैव,बौद्ध और जैन समेत विभिन्न समूहों से संबंधित कलाकृतियां मिलीं। एक जगह उन्होंने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह निकाल था कि 'ढांचे (बाबरी मस्जिद) के नीचे कोई राम मंदिर नहीं था।'
जस्टिस नरीमन ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर और क्या कहा?
9 नवंबर, 2019 के फैसले के कई आदेशों का हवाला देते हुए उन्होंने सर्वोच्च अदालत की ओर से दी गई दलीलों से असहमति जताई है। खासकर उनकी आपत्ति इस बात को लेकर दिखी कि जब सुप्रीम कोर्ट ने मस्जिद के ढांचे को गिराए जाने को गैर-कानूनी कहा,फिर वह जमीन राम मंदिर को क्यों सौंप दी गई।
जस्टिस नरीमन ने कहा कि इस फैसले में एक सकारात्मक पहलू यह है कि इसमें पूजा स्थल (विशेष प्रावधान) अधिनियम, 1991 को बरकरार रखा गया है,जिस पर आदेश के पांच पन्नों में चर्चा की गई है।
पांच जजों की संविधान पीठ के फैसले पर सवाल उठाते हुए वे बोले,'इस निष्कर्ष के बावजूद कि मुसलमान वहां 1857 से लेकर 1949 तक प्रार्थना करते रहे,अदालत ने कहा कि वे यह नहीं कह सकते कि उनका एकमात्र कब्जा था और यह पक्ष विवादित था। अदालत ने कहा कि यह इस अर्थ में विवादित है कि रूल ऑफ लॉ के विपरीत उन्हें हटाने के लिए बहुत ज्यादा प्रयास किए गए,जो कि अदालत का निष्कर्ष है। तीन बार ऐसा हुआ, 1857, 1934 और 1940 में। वे आगे कहते हैं कि इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि यह पक्ष निर्विवाद है। इसका जो भी मतलब हो। क्योंकि यह पक्ष अब निर्विवाद है,इसलिए हम ये नहीं कह सकते कि उनका अंदरूनी हिस्से पर विशेष अधिकार है। इसलिए, यह पूरी तरह से एक पूर्ण हिस्सा है और अब हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि यह पूरा हिस्सा अब हिंदुओं का है।'
धर्म-स्थलों से जुड़े मुद्दों पर विवाद बढ़ने से परेशान हैं नरीमन
कुल मिलाकर जस्टिस नरीमन को तकलीफ ये है कि अयोध्या पर आए फैसले के बाद देश में धार्मिक स्थलों से जुड़ी मुकदमेबाजी बढ़ क्यों गई है। उनका कहना है कि 1991 के पूजा स्थल कानून को उस ट्रायल कोर्ट में पढ़ा जाना चाहिए, जहां ऐसे दावे से जुड़े मुकदमे दर्ज हो रहे हैं।
क्या न्याय की मांग करना गुनाह है जस्टिस (रिटायर्ड) नरीमन?
सवाल है कि क्या 1991 में केंद्र सरकार की ओर से बनाया गया पूजा-स्थल कानून निर्विवाद हो सकता है? क्या उसे देश के संविधान और देश की जनता की भावनाओं की कसौटी पर नहीं कसा जाना चाहिए? देश में कई धर्म-स्थल ऐसे हैं, जहां कोई भी इंसान खुली आंखों से देख सकता है कि इतिहास में एक खास समुदाय की आस्था के साथ खिलवाड़ किया गया है, उसकी धार्मिक मान्यताओं को हथियारों के दम पर रौंदा गया है।
क्या ऐसे में एक स्वतंत्र मुल्क में उस जनता को अपनी अदालत के सामने न्याय की गुहार लगाना, सिर्फ इसलिए गुनाह है कि इससे कथित तौर पर समाजिक माहौल बिगड़ सकता है?
अदालतों की अवमानना क्यों कर रहे हैं 'मिलॉर्ड?
क्या यह ऐतिहासिक तथ्य नहीं हैं कि मुगलों के आने से सैकड़ों वर्षों पहले से ही विदेशी और मजहबी लुटेरों ने भारत की संस्कृति के साथ खिलवाड़ किया है? क्या कुतुब मीनार परिसर तक में मौजूद साक्ष्य चीख-चीख कर न्याय की गुहार नहीं लगा रहे हैं? क्या इसके लिए अपने देश की अदालत से न्याय मांगना अपराध हो गया? सिर्फ इसलिए क्योंकि कथित तौर पर इससे किसी समुदाय विशेष को उन संपत्तियों से दूर होने का डर सताने लगता है, जो ऐतिहासिक तौर पर शायद उनके हैं ही नहीं?
अगर किसी विवादित धार्मिक स्थल पर दावा जताने के लिए कोई भी पक्ष हिंसा का इस्तेमाल करता है तो वह निश्चित तौर पर देश के कानून और संविधान के साथ खिलवाड़ है। लेकिन, न्याय के लिए देश की निचली अदालत से लेकर सर्वोच्च अदालत तक का दरवाजा खटखटाना, जब सुप्रीम कोर्ट के एक रिटायर्ड जज की नींदें उड़ाने लगता है तो संदेह देश की न्याय-व्यवस्था पर नहीं, न्यायपालिका के सर्वोच्च पदों पर बैठ चुके लोगों की निहित मानसिकता पर उठता है।
कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत-विरोधी कुछ शक्तियां लगातार देश को कमजोर करने के लिए सक्रिय हैं। ऐसे में अगर सुप्रीम कोर्ट का एक रिटायर्ड जज उसी सर्वोच्च न्यायलय के फैसले को संदिग्ध ठहराने की कोशिश करने लगे तो देश-विरोधी शक्तियों का तो काम और भी आसान हो सकता है। क्योंकि, इस तरह के प्रयासों से समाजिक सौहार्द बढ़ने की जगह अपनी अदालतों के प्रति संदेह पैदा होने से उन्मादी ताकतों का ही हौसला बुलंद हो सकता है!












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