झारखंड चुनाव: मॉब लिंचिंग के पीड़ितों को कोई पूछ भी नहीं रहा-ग्राउंड रिपोर्ट
झारखंड में पांच चरणों में होने वाले विधानसभा के चुनावों की हलचल बढ़ती जा रही है. इस प्रचार के शोर में वो क्रंदन दब चुका है जो अपनों के खोने का ग़म ज़ाहिर भी नहीं कर सकता और दबा भी नहीं सकता.
घने जंगलों और मिली-जुली संस्कृति के लिए अपनी पहचान रखने वाला ये राज्य अब उन्मादी भीड़ की हिंसा के लिए बदनाम हो रहा है.
सामीजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों को अफ़सोस है कि पिछले पांच वर्षों में मॉब लिंचिंग यानी भीड़ के हाथों पीट-पीटकर जान लेने की 11 घटनाएं घट चुकीं हैं. इनमें कई लोगों को सरेआम पीट-पीटकर मौत के घाट उतार दिया गया.
कहीं गौ तस्करी या गौ हत्या के नाम पर तो कहीं सोशल मीडिया के ज़रिए फैल रहीं अफवाहों की वजह से. मगर किसी भी राजनीतिक दल ने इसे अपना चुनावी मुद्दा नहीं बनाया है.
राजनीतिक दल अब भी बुनियादी मुद्दों से दूर सिर्फ़ अपने नेताओं के पलायन को रोकने और दूसरे दलों से अपने दल में नेताओं को शामिल करने की होड़ में लगे हुए हैं.
चिंता की बात ये है कि मॉब लिंचिंग की कुछेक घटनाओं को छोड़कर ज़्यादातर घटनाएं सुदूर ग्रामीण या कस्बाई इलाकों में घटीं हैं.
कहीं हमलावर भीड़ को मिले राजनीतिक संरक्षण पर बहस हुई तो कहीं पीड़ितों पर ही आपराधिक मामलों को लादे जाने को लेकर भय का माहौल बना.
यूं तो झारखण्ड में रिपोर्ट किये गए सभी मामले गंभीर हैं और उनपर काफ़ी बहस भी हुई है, मगर गुमला जिले के डुमरी प्रखंड के जुर्मु गांव के बारे में कम ही लोग जानते हैं जहां आदिवासी ईसाई प्रकाश लकड़ा की पास के ही जैरागी गांव की उन्मादी भीड़ ने पीट-पीटकर हत्या कर डाली.
इस घटना में जुर्मु गांव के तीन लोग भी घायल हुए थे. मगर वो प्रकाश की तरह बदक़िस्मत नहीं थे. वे बुरी तरह घायल तो हुए मगर जिंदा हैं, आपबीती और उस वारदात का आंखों देखा हाल बताने के लिए.
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ताज़ा हैं दिलो दिमाग़ के घाव
इन्हीं में से एक हैं जनुवारिस मिंज. बेरहम भीड़ की पिटाई से बुरी तरह घायल हुए मिंज की ज़िंदगी अब पहले जैसी नहीं रही.
शरीर पर लगी चोटों ने उन्हें कमज़ोर कर दिया है. अब वो ना देर तक खड़े हो सकते हैं ना ही खेत में देर तक काम कर सकते हैं. पिटाई में उनकी कई हड्डियां टूटी थीं. उन्हें जबरन पेशाब भी पिलाई गई थी.
ये घटना बहुत पुरानी नहीं है. इसी साल अप्रैल महीने की है इसलिए जुर्मु के आदिवासी ईसाइयों के दिल,जिस्म और आत्मा के घाव अब भी ताज़ा ही हैं.
प्रकाश लकड़ा की पत्नी जेरेमिना अकेली हो गईं हैं क्योंकि पिता की मौत के बाद उनके बच्चे (बेटा और बेटी) गांव छोड़कर चले गए हैं. वो डरे हुए थे.
जनुवारिस मिंज और घटना में घायल दो और ग्रामीण अब भी यहीं रहते हैं. मगर अब बात पहले जैसी नहीं है क्योंकि पूरे गांव में दहशत है और लोग रात भर पहरे देते हैं.
मिंज पूरी घटना के भुक्तभोगी भी हैं और चश्मदीद भी. इसलिए वो और उनके साथ घायल हुए दोनों ग्रामीण डरे हुए हैं. मिंज बताते हैं की अब उन्हें मामला वापस लेने के लिए धमकियां मिल रहीं हैं.
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बीबीसी से बात करते हुए मिंज ने जो बताया वो हम उन्हीं की ज़ुबानी आप तक पहुंचा रहे हैं:
''हमारे ही गांव के अधियास कुजूर हैं जिनका बैल 9 अप्रैल से ही लापता था. गांव वालों ने उसे ढूंढा भी मगर वो नहीं मिला. मगर 10 अप्रैल की शाम वो बैल पास ही नाहर के पास पुलिया के नीचे मरा हुआ मिला.
कुजूर ने गांव आकर बताया तो प्रकाश लकड़ा मैं और दो अन्य ग्रामीण वहां गए. हम मरे हुए बैल की खाल छील रहे थे.
इस खाल का इस्तेमाल ढोल बनाने और मांदर बनाने में होता है. हम चारों मरे हुए बैल की खाल छील रहे थे. तब तक जैरागी गांव के लोगों की भीड़ अचानक वहां आ गई और बिना कुछ पूछे ही उन्होंने हमें मारना शुरू कर दिया.
वो कह रहे थे की हमने गाय को मारा है जबकि हमने उन्हें बताया कि वो मरा हुआ बैल था.
उन्होंने हमारी एक नहीं सुनी और हमें मारते गए. उनके हाथों में तलवार और दूसरे हथियार थे. फिर उन्होंने बोतल में पेशाब किया और हमें मारते हुए उसे पीने को कहा. हम क्या करते. हम सिर्फ़ चार थे और वो पूरी भीड़. हम उन्हें पहचानते थे. मगर उन्होंने हमपर दया नहीं की.
फिर वो हमें पकड़ कर मारते हुए थाना ले गए. मगर थाना प्रभारी ने मदद करने की जगह भीड़ को और उकसाया.
फिर भीड़ ने और बेरहमी से मारना शुरू किया. हमसे धार्मिक नारे भी लगवाए. इतना मार रहे थे कि प्रकाश वहीं गिर गया.वो समझ गए कि प्रकाश मर गया है. फिर सभी वहां से चले गए.
हम बुरी तरह घायल और बेसुध ज़मीन पर पड़े रहे.
ये बात सात बजे की है. हम वैसे ही पड़े रहे. फिर सुबह चार बजे हमें डुमरी के सदर अस्पताल में भरती कराया गया. प्रकाश भी था. हम देखते ही समझ गए कुछ गड़बड़ है. हमने उसे छू कर देखा. उसका बदन ठंडा था और आंखें ऊपर चढ़ी हुईं थीं. मैंने अपने घायल साथियों से कहा, "प्रकश मर गया है..."
फिर हमारा बयान हुआ जिसके आधार पर पुलिस ने केस दर्ज किया. लेकिन इसके बाद भी हम पर गौहत्या का केस कर दिया जो बिलकुल झूठ है. बैल पहले से मरा हुआ था."
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डर के साए में कटती ज़िंदगी
मिंज और गांव के दूसरे लोग डर के साए में जी रहे हैं. उनकी दुनिया ही बदल गयी है. उनका कहना है कि वो पहले रात बे-रात शहर से गांव लौट आते थे. मगर अब धमकियां मिलने के बाद उन्होंने गांव से बाहर न जाने को ही बेहतर समझा.
उन्हें जैरागी होकर ही अपने गांव आना पड़ता है क्योंकि शहर से बस जैरागी ही आती है. फिर गांव तक वो पैदल सफ़र तय करते हैं.
जेरेमिना लकड़ा का कहना है कि उनके पति की मौत को पुलिस ने छुपाया और पोस्टमॉर्टम के बाद ही उन्हें ये ख़बर दी गई.
उन्होंने ये भी बताया कि पुलिस ने उनके पति के शव को दफ़नाने के लिए दबाव डाला था.
सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि जो भीड़ की हिंसा का शिकार बने, पुलिस उन पर ही मामले दर्ज करके उन्हें ही परेशान कर रही है.
सिराज दत्ता ने झारखंड में हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं का अध्ययन किया है. वो कहते हैं कि ज़्यादातर मामलों में पाया गया कि पीड़ितों पर ही मामले भी दर्ज किये गए. ख़ासकर तौर पर गौ हत्या के मामले.
ऐसे में इंसाफ़ के लिए उनकी राह और भी मुश्किल हो गई है.
सिराज दत्ता पूछते हैं, "वो अपने ऊपर हुए हमलों का इंसाफ़ मांगें या ख़ुद को निर्दोष साबित करने में ही रह जाएं?"
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'न मुआवज़ा मिला, न कोई मिलने आया'
ग्रामीणों को दुख है कि प्रकश लकड़ा के आश्रितों और घटना में घायल तीन ग्रामीणों को ना किसी तरह का मुआवज़ा मिला है और न ही उनसे मिलने कभी कोई अधिकारी आया है.
संसद के शीतकालीन सत्र में गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने कहा कि केंद्र ने सभी राज्यों को इन घटनाओं से निपटने के लिए कड़े क़दम उठाने के निर्देश दिए हैं.
लेकिन जानकारों का कहना है कि अभियुक्तों को राजनीतिक संरक्षण की वजह से मॉब लिंचिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं.
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