झारखंड विधानसभा चुनाव: आदिवासियों की राजनीति करने वाला झामुमो अब सवर्णों को रिझाने में जुटा
झारखंड: आदिवासियों की राजनीति करने वाला झामुमो सवर्णों को रिझाने में जुटा
नई दिल्ली। जब से नरेन्द्र मोदी सरकार ने गरीब सवर्णों को 10 फीसदी आरक्षण दिया है तब से अन्य दलों को भी इनकी फिक्र होने लगी है। वैसे दल भी सवर्णों की बात करने लगे हैं जिनको इनसे परहेज था। बिहार में राजद के बाद अब झारखंड में झामुमो ने सवर्णों को लुभाने की कोशिश की है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने चुनाव घोषणा पत्र में कहा है कि अगर विधानसभा चुनाव के बाद उसकी सरकार बनी तो वह गरीब सवर्ण छात्रों को मुफ्त शिक्षा और छात्रवृत्ति देगी। छात्राओं को प्राइमरी से पीएचडी तक मुफ्त शिक्षा की व्यवस्था की जाएगी। आदिवासी हितों की राजनीति करने वाले झारखंड मुक्ति मोर्चा ने पहली बार सवर्णों से जुड़ने की कोशिश की है। वैसे झामुमो का घोषणा पत्र आदिवासियों, किसानों पिछड़ों पर ही केन्द्रित है। लेकिन उसने गरीब सवर्णों का मुद्दा उठाकर एक नयी शुरुआत की है।

झामुमो देगा गरीब सवर्णों को मुफ्त शिक्षा
आरक्षण ऐसी उपजाऊ जमीन है जिसकी फसल काट- काट कर राजनीति दल मालामाल होते रहे हैं। केन्द्र सरकार के फैसले के बाद रघुवर सरकार ने जनवरी 2019 में ही गरीब सवर्णों के लिए 10 फीसदी आरक्षण लागू कर दिय़ा था। सवर्ण वोट पर भाजपा के अलावा अन्य दलों की भी नजर है। झारखंड मुक्ति मोर्चा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में चूंकि पिछड़ों के लिए आरक्षण बढ़ाने की बात कही है इसलिए उसको सामाजिक संतुलन साधने की जरुरत पड़ गयी। झामुमो को लगा कि सिर्फ ट्राइब और ओबीसी की बात करना एकतरफा हो जाएगा इस लिए उससे ऊंची जाति के गरीब छात्रों को मुफ्त शिक्षा देने की बात कही। इस समुदाय की गरीब छात्राओं के लिए प्राइमरी से पीएचडी तक नि:शुल्क पढ़ाई का वायदा किया गया है। झामुमो ने अपने घोषणा पत्र में पिछड़े वर्ग को 27 फीसदी आरक्षण देने का वायदा किया है। झारखंड में अभी पिछड़े वर्ग को 14 फीसदी आरक्षण मिलता है। यानी झामुमो ने पिछड़े वर्ग के आरक्षण को 13 फीसदी बढ़ाने का वायदा किया है। यहां कुल 50 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था है जिसके तहत 26 फीसदी अनुसूचित जनजाति को, 10 फीसदी अनुसूचित जाति को, 14 फीसदी पिछड़े वर्ग को रिजर्वेशन मिलता है। गरीब सवर्णों को अलग से 10 फीसदी आरक्षण मिल रहा है जो 50 फीसदी के अतिरिक्त है।

पिछड़ा आरक्षण बढ़ाने का प्रावधान हो चुका है खारिज
झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने आरक्षण व्यवस्था को बदलने की कोशिश की थी। उन्होंने आदिवासियों के लिए 32 फीसदी, एससी के लिए 14 फीसदी और पिछड़ों के लिए 27 फीसदी आरक्षण का प्रवाधान लागू किया था। लेकिन झारखंड हाईकोर्ट ने इस व्यवस्था निरस्त कर दिया जिसकी वजह से यह लागू नहीं हो पाया। कोर्ट ने 50 फीसदी से अधिक के आरक्षण को मान्यता नहीं दी। उसने 26 ,10 और 14 फीसदी की पुरानी व्यवस्था को ही बहाल रखा। कोर्ट के फैसले के बाद पिछड़ा आरक्षण बढ़ाने का मामला अव्वहारिक हो गया। राजनीति दलों ने भी इस पर चुप्पी साध ली थी। यदा-कदा पिछड़े वर्ग के सम्मेलन में यह मांग उठती रही। लेकिन इस साल सितम्बर में जब हेमंत सोरेन ने बदलाव यात्रा शुरु की थी तभी से वे पिछड़े वर्ग के आरक्षण को 27 फीसदी करने का वायदा करने लगे थे। आजसू प्रमुख सुदेश महतो खुद पिछड़ी जाति से आते हैं इसलिए वे भी 27 फीसदी आरक्षण के पक्षधर हैं।

हेमंत ने सवर्ण आरक्षण का किया था विरोध
झामुमो के कार्यकारी अध्यक्ष हेमंत सोरेन ने सवर्ण आरक्षण का विरोध किया था। लोकसभा चुनाव में झामुमो की करारी हार हुई थी। आदिवासियों के मसीहा माने जाने वाले शिबू सोरेन दुमका सीट हार गये थे। झामुमो को किसी तरह राजमहल की एक मात्र सीट मिल पायी थी। 14 में से केवल एक जीत ने झामुमो को अपनी नीतियों पर दोबारा सोचने के लिए मजबूर किया। पार्टी अपनी राजनीति में बदलाव किया। उसकी किताब में ट्राइब, एससी, ओबीसी, माइनोरिटी तो पहले से थे। इसमें अपर कास्ट का एक नया चैप्टर और जोड़ लिया। हालांकि झामुमो ने सवर्णों के लिए कोई बहुत बड़ी घोषणा नहीं की है लेकिन जो भी किया है उसे सकारात्मक बदलाव तो माना ही जा सकता है। जाहिर है झामुमो भी अपना दायरा बढ़ाना चाहता है। वैसे भी कोई राजनीतिक दल किसी समुदाय से परहेज कर लंबा रास्ता तय नहीं कर सकता।
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