झारखंड में फिर भूख से मौत, क्या है पूरी कहानी

पोस्टमार्टम रिपोर्ट कहती है कि प्रेमनी कुंवर के पेट में अन्न के दाने थे. लेकिन, उनके घर के बरतनों से अन्न 'ग़ायब' है.
घर के अहाते में मिट्टी का एक चूल्हा है. वहां अल्युमिनियम और स्टील के कुछ बरतन पड़े हैं. चूल्हे से लगी दीवार पर लंबा काला निशान हैं. मानो गवाही दे रहा हो कि यहां कभी खाना बनाया जाता था.
इसके लिए प्रेमनी ने लकड़ियां जलाई होंगी. उनसे धुआं निकलता होगा. यह काला निशान उसी 'टेम्पररी धुएं' का 'परमानेंट अक्स' हैं.
प्रेमनी कुंवर अब इस घर में नहीं रहतीं. वे वहां चली गयी हैं, जिसे जमाना 'परलोक' कहता है. मरने से पहले तक वे कोरटा गांव में रहती थीं. यह झारखंड के सुदूर गढ़वा ज़िले के डंडा प्रखंड का हिस्सा है.
'काश, यह आधार इतना ज़रूरी नहीं होता'
आधार के पेंच से भूखों मरने की नौबत आई
अब इस लोक में उनकी निशानी के निमित तेरह साल का एक बच्चा है, जो एक दिसंबर को उनकी मौत के पहले तक उन्हें मां-मां कहकर पुकारा करता था. अब वह बच्चा उनकी पासपोर्ट साइज फ़ोटो को मां कहते हुए रोने लगता है.
प्रेमनी कुंवर उसे उत्तम कहकर बुलाती थीं. वह उनके पति मुकुल महतो की आख़िरी और इकलौती निशानी है. लिहाजा, गांव वाले उसे उत्तम महतो के नाम से जानते हैं. वह डंडा के एक स्कूल में सातवीं क्लास में पढ़ता है.
'आधार के चलते' भूखा रह रहा है एक बच्चा
भूख से मौत
उत्तम महतो ने मुझे बताया कि अक्टूबर में उनके घर में अंतिम बार राशन का चावल आया था. पिछले महीने डीलर ने अपनी मशीन (बायोमिट्रिक सिस्टम) में मां के अंगूठे का निशान तो लिया लेकिन उन्हें राशन नहीं दिया. वह नवंबर महीने की 27 तारीख थी.
इसके ठीक तीन दिन बाद 64 साल की प्रेमनी कुंवर की मौत हो गयी. उत्तम के दावे पर भरोसा करें तो अपनी मौत के आठ दिन पहले से उन्होंने अपने चूल्हे पर कुछ भी नहीं पकाया था, क्योंकि घर में राशन ही नहीं था.
उत्तम महतो ने कहा, "मेरी मां भूख से मर गईं. मेरे घर में आठ दिन से खाना नहीं बना था. हम स्कूल जाते थे तो मिड डे मिल खा लेते थे. थोड़ा-बहुत बचाकर लाते तो मां को वही खिला देते. लेकिन, इससे पेट नहीं भरता था. इस कारण मेरी मां मर गयीं."
"घर में हमीं दोनों रहते थे. हमको तो पिताजी का चेहरा भी याद नहीं है. अब हम अकेले कैसे रहेंगे. हमको कौन बनाकर खिलाएगा."
आधार-राशन कार्ड नहीं जुड़े और बच्ची 'भूख' से मर गई
नहीं मिल रहा था राशन
डंडा प्रखंड के प्रमुख वीरेंद्र चौधरी ने बीबीसी को बताया कि प्रेमनी कुंवर को अगस्त और नंवबर का राशन नहीं मिला था.
वो कहते हैं, "उन्हें जुलाई के बाद से वृद्धावस्था पेंशन भी नहीं मिल रहा था. इस कारण उनके घर की हालत ख़राब हो चुकी थी. उनकी कई शिकायतों के बावजूद प्रशासन ने इस पर कोई कार्रवाई नहीं की और प्रेमनी की मौत भूख से हो गयी."
क्या कांगों में भूख से लाखों बच्चे मर जाएंगे?
प्रशासन का इनकार
गढ़वा की उपायुक्त डा नेहा अरोड़ा इस आरोप को नहीं मानतीं. उनका दावा है कि प्रेमनी कुंवर की मौत का कारण भूख नहीं हो सकती क्योंकि पोस्टमार्टम करने वाले डाक्टरों ने उनके पेट में फूड ग्रेन्स (अन्न के दाने) पाए हैं.
वो कहती हैं, "इसके बावजूद हम लोग इस मामले की जांच करा रहे हैं. इसके बाद ही कुछ ठोस बात की जा सकेगी."
डंडा के बीडीओ शाहजाद परवेज भी यही दावा करते हैं. उन्होंने कहा, "यह कहना ग़लत है कि उन्हें अनाज नहीं मिल रहा था. अक्टूबर में वे अनाज लेकर गयी थीं. उन्हें 35 किलो चावल दिया गया था क्योंकि वे अंत्योदय कार्ड धारी थीं."
"प्रेमनी के घर में सिर्फ दो लोग रहते थे. ऐसे में 35 किलो चावल एक महीने में ही कैसे खत्म हो सकता है. सच तो यह है कि उनकी तबीयत ख़राब थी और मौत से एक दिन पहले गांव के ही एक झोला छाप डाक्टर ने उनका इलाज किया था."
नौ दिनों तक भूख से तड़पते बच्चे की मौत
राइट टू फूड कैंपेन का सर्वे
राइट टू फूड कैंपेन की सकीना धोराजिवाला बीडीओ शाहजाद परवेज की बातों को हास्यास्पद क़रार देती हैं. वो कहती हैं कि उनके साथियों ने गांव जाकर इसकी पड़ताल की थी.
"पता चला कि प्रेमनी कुंवर को अगस्त में राशन नहीं मिला था. इस कारण सितंबर मे मिले राशन से उन्होंने अगस्त में लिया पइंचा (उधार) चुकाया. इस कारण उनके घर में चावल की कमी हो गयी. सकीना ने बताया कि राशन डीलर 35 की जगह 33 किलो चावल ही दिया करता था."
आठ महीने से नहीं मिला था संतोषी को राशन
वृद्धावस्था पेंशन दूसरे खाते में
दरअसल, प्रेमनी कुंवर का वृद्धावस्था पेंशन उनके पति की पहली पत्नी शांति देवी के खाते में ट्रांसफ़र हो गई थी. जबकि वो 25 साल पहले ही मर चुकी हैं.
इसकी जानकारी ना तो बैंक को थी और ना प्रेमनी को. पड़ताल में पता चला कि शांति देवी का खाता ग़लती से प्रेमनी कुंवर के आधार कार्ड से लिंक हो गया था.
इस कारण वृद्धावस्था पेंशन की राशि जुलाई के बाद से उनके हाथ में नहीं मिल सकी.
और भी हैं मामले
पिछले दो महीने के दौरान झारखंड मे चार बार भूख से मौत की चर्चा हुई. सिमडेगा ज़िले की संतोषी की मौत के बाद धनबाद के बैजनाथ रविदास, देवघर के रुपलाल मरांडी और गढ़वा के सुरेश उरांव की मौत के लिए भी भूख को वजह बताया गया.
लेकिन, सरकार ने इसे सिरे से नकार दिया. मुख्यमंत्री ने कहा कि ऐसे आरोप उनकी सरकार को बदनाम करने के लिए लगाए जा रहे हैं.
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