जम्मू-कश्मीर में यमदूत बनकर आई भीषण बाढ़ के असल कारण
जम्मू-कश्मीर- पिछले छह दशक में आई सबसे भीषण बाढ़ ने जान-माल-जिंदगी सबकुछ उजाड़कर रख दिया है। सेना की मदद से बचाव कार्य लगभग सफल हुआ है व अब विस्थापितों को उनकी जीवनशैली में नए सिरे से वापस ले जाने के लिए सरकार-समाज में मंथन जारी है।
सेना, वायुसेना, एनडीआरएफ और राज्य एजेंसियों ने हजारों को इस त्रासदी में डूबसने से बचाया है। मौजूदा समस्या श्रीनगर के डल क्षील में बढ़ रहा पानी का जलस्तर है। यदि यह थम जाता है तो आगे की रणनीति पर काम शुरु किया जाएगा।
सार्क डिजाजज्सटर मैनेजमेंट के प्रो. संतोष व पर्यावरणविद् हिमांशु ठक्कर ने इस पर विशेष चर्चा कर वज़हें टटोलीं। उनके लेख व वार्ता से निकली बातों से पता चलता है कि इस तबाही का असल जिम्मेदार कोई एक नहीं है। घुमाएं स्लाइडर और जानें इस भीषण तबाही के पीछे की बातें-

अति वर्षा
आम तौर पर हम सभी इस तबाही को वहां की मूसलाधार बारिश से ही जोड़कर देख रहे हैं। दरअसल 3-6 सितंबर तक घाटी में 250 मिमी. बारिश दर्ज की गई। वैज्ञानिक-विशेषज्ञों की मानें तो वहीं कई जगहों पर 500 मिमी. तक की बारिश भी लगातार हुई जिससे हालात असामान्य होते चले गए...

वेस्टर्न डिस्टर्बेंस
इस बारिश का योग 'वेस्टर्न डिस्टर्बेंस' से बना। अफगानिस्तान व मेडीटेरियनन से आए प्रतिकूल वातावरण यहां मॉनसून विंड के साथ मिला और देर तक ना थमने वाली बारिश ने इस तरह तबाही मचाई...

नहीं थे डॉप्लर रडार
विशेषज्ञों का कहना है कि क्षेत्र में डॉप्लर रडार ना होने से तबाही का अंदाज़ा नहीं लगाया जा सका। इन रडारों की मदद से 24-72 घंटे पहले इस तरह के कहर का अंदेशा लग जाता है जो कि घाटी में नहीं थे। हालांकि इससे तबाही रेाकी नहीं जा सकती पर नुकसान को भांपकर सतर्क ज़रूर हुआ जा सकता है।

पाक को वॉर्निंग, हम खाली हाथ
विशेषज्ञों ने बताया कि सेंट्रल वॉटर कमिशन भारत से पाकिस्तान तक जाने वाली नदियों के बारे में फ्लड फोरकास्टिंग करता है, यानि वार्निंग देता है पर हमारे लिए किसी भी तरह की वॉर्निंग की व्यवस्था नहीं है। उत्तराखंड त्रासदी पर भी पर्यावरणविदों ने यही सवाल किया था।

NDMA की भूमिका सवालों में
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन एक्ट 2005 के तहत बनी इस संस्था को राज्य व जिला स्तर पर बचाव इकाइयों को चुस्त रखने की ज़िम्मेदारी है, जिस पर हमेशा से सवाल खड़े हुए हैं कि वह वक्त से पहले तैयार नहीं रहती है। आलम यह है कि अभी तक एनडीएमए का उपाध्यक्ष तक नियुक्त नहीं किया गया है। इसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री होते हैं।

अविकसित हैं लोकल वॉर्निंग तंत्र
विशेषज्ञों से बातचीत में सामने आया कि हिमालयन रीज़न व बाढ़ की आशंका वाले क्षेत्रों में लोकल वार्निंग का काम एनडीएम के क्षेत्रीय व जिला स्तरीय टीमों को करना चाहिए। यह तंत्र मजबूत होता तो तब उत्तराखंड व अब जम्मू-कश्मीर के हालात इतने बदतर नहीं होते।

नदी का अपमान
यहां नदी का अपमान से आशय किसी तरह का पौराणिक भय वाला पहलू नहीं है। दरअसल नदी को एनक्रोच यानि कि उसके रास्ते में बस्ती बस जाने को 'नदी के अपमान' से जोड़ा गया है। जब नदी अपना कोर्स यानि रास्ता बदल लेती है तो खाली भूमि पर लोग आकर बस जाते हैं जो कि नदी का वास्तविक मार्ग होता है। बाढ़ आने पर नदी अपने रास्ते पर वापस लाैट आती है।

सुविधाओं की अनदेखी
जम्मू कश्मीर, वो प्राकृतिक जगह जहां झीलें, नदियां, नाव अक्सर इसकी पहचान के रूप में देखीं जाती हैं। इस भीषण तबाही के दौरान नावें भी दिल्ली-गाज़ियाबाद से मंगवाईं गईं...। इस तरह के नदी-तटीय-हिमालय क्षेत्र में भी बाढ़ की परिकल्पना किसी भी संस्था ने नहीं की।

हाइड्रो-पॉवर प्रोजेक्ट की 'बाढ़'
पर्यावरणविदों ने बताया कि भारत से पाक तक की सरज़मीं को छूने वाली चिनाब नदी पर सबसे ज्यादा हाइड्रो पॉवर प्रोजेक्ट बनाए गए हैं। इसका भी प्राकृतिक असर देखने को मिला। ऐसे में 'हाफिज सईद' का भारत पर 'जल आतंकवाद' जैसे आरोप मढ़ना किसी भी पहलू में जायज़ नहीं माना जा सकता...

आगाह करने का तंत्र सक्रिय हो
एनडीएम यानि राष्ट्रीय आपधा प्रबंधन को आगे से इस तरह के क्षेत्रों में वॉर्निंग तंत्र मजबूत करना होगा। आम जनता को जहां जगह मिलेगी वहां आशियाना खड़े कर लिए जाएंगे पर जिम्मेदार संस्थाओं को यह बताने का फर्ज याद होना चाहिए कि कौन सी जगह खतरा है व कहां है सुरक्षा व खुशहाली?
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