J&K Election: दरबार प्रथा क्या है? जम्मू कश्मीर की क्षेत्रीय पार्टियों ने क्यों बनाया चुनावी मुद्दा?

Jammu and Kashmir Chunav: जम्मू-कश्मीर में पहले चरण के चुनाव से पहले फिर से 'दरबार प्रथा' की चर्चा तेज हो गई है। केंद्र शासित प्रदेश की तमाम क्षेत्रीय दलों ने इस परंपरा को फिर से शुरू करने का वादा किया है। 'दरबार प्रथा' करीब 150 साल पुरानी जम्मू-कश्मीर की वह सरकारी परंपरा थी, जिसमें हर 6 महीने पर सरकार के महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तर श्रीनगर से जम्मू और जम्मू से श्रीनगर शिफ्ट होते रहते थे।

जम्मू-कश्मीर विधानसभा चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस, पीडीपी और अपनी पार्टी जैसे दल फिर से इस परंपरा को वापस लाने का वादा कर रहे हैं। यह प्रथा एक समय में बेवजह के खर्चों की वजह से काफी आलोचनाओं की शिकार बनने लगी थी और जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने भी मई 2020 में इसे समय की बर्बादी बताते हुए स्थानीय समाधन निकालने को कहा था।

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जम्मू-कश्मीर की पार्टियों ने फिर सेदरबार मूव बहाल करने का किया वादा
फारूक अब्दुल्ला की नेशनल कांफ्रेंस ने अपने घोषणापत्र में 'दरबार प्रथा (Durbar Move) की पूर्ण व्यवस्था को फिर से बहाल करके हमारे राज्य की एकता को बढ़ाना' का संकल्प लिया है। इसी तरह से अल्ताफ बुखारी की अपनी पार्टी के घोषणापत्र में भी इस व्यवस्था को फिर से शुरू करने का वादा किया गया है।

जम्मू कश्मीर की दरबार प्रथा क्या है?
पूर्ववर्ती जम्मू कश्मीर राज्य की दो राजधानियां थीं। सर्दी के मौसम में सरकार का संचालन श्रीनगर से होता था और गर्मियों में यह कामकाज जम्मू शिफ्ट हो जाता था। सर्दियों में सिविल सचिवालय और सभी महत्वपूर्ण सरकारी दफ्तर श्रीनगर से जम्मू आ जाते थे। वहीं गर्मियों में यह स्थिति उलट जाती थी।

जम्मू में अप्रैल के आखिरी शुक्रवार को दफ्तर बंद हो जाते थे और एक हफ्ते के अंतराल के बाद मई में सोमवार से इसका संचालन श्रीनगर में शुरू होता था। इसी तरह से अक्टूबर के अंतिम शुक्रवार को श्रीनगर में सरकारी दफ्तर बंद हो जाते थे और एक हफ्ते बाद पहले सोमवार को नवंबर में यह जम्मू से काम करने लगता था।

दरबार प्रथा कब शुरू हुई?
आम मान्यता यह है कि यह परंपरा दरअसल करीब 150 साल पहले डोगरा शासकों ने शासन की सुविधा के लिए की थी। वे जम्मू से थे, लेकिन उनके राज्य की सीमाएं पूरे जम्मू कश्मीर तक फैली थीं। इसमें पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर (PoK) और लद्दाख भी शामिल था। लेकिन, ऐसा भी कहा जाता 1870 के दशक में रूसी सेना के भय से अंग्रेजों ने यह प्रथा शुरू करवाई थी।

2019 में आर्टिकल 370 हटाए जाने तक प्रशासन को सरकारी दफ्तरों को शिफ्ट करने के लिए हर 6 महीने में सैकड़ों ट्रकों और बसों को काम पर लगाना पड़ता था। इनमें सरकारी दस्तावेजों को एक से दूसरी राजधानी ले जाया जाता था। इसी तरह से बसों में बैठकर सरकार सरकारी कर्मचारी शिफ्ट किए जाते थे। लेकिन, कोविड-19 महामारी और सरकारी दस्तावेजों के ऑनलाइन होने के साथ ही यह प्रथा थम गई।

2021 से श्रीनगर ही पूरी तरह से जम्मू-कश्मीर की राजधानी बन गई है और वहीं से सभी महीने सारा सरकारी कामकाज होने लगा है। अब जम्मू और श्रीनगर के बीच हर मौसम में काम करने वाली सड़कें भी काम कर रही हैं, इसलिए आवाजाही में पहले वाली कई दिक्कतें इतिहास में तब्दील हो चुकी हैं।

एक मौके पर जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने बताया था कि साल में दो बार राजधानियां बदलना बंद हो जाने से इस केंद्र शासित प्रदेश को सालाना 200 करोड़ रुपए की बचत होगी। एक आंकड़े के मुताबिक यह कितना बड़ा शिफ्टिंग का काम था, उसका अंदाजा इसी से लग सकता है कि जम्मू-कश्मीर के करीब 10,000 सरकारी कर्मचारी श्रीनगर से जम्मू और फिर जम्मू से श्रीनगर शिफ्ट किए जाते थे।

आरटीआई से हुए एक खुलासे के अनुसार साल 2011 से लेकर 2020 तक 9 वर्षों में राजधानी अदला-बदली करने पर लगभग 15,800 करोड़ रुपए खर्च हो गए।

क्षेत्रीय दल क्यों शुरू करना चाहती हैं पुरानी परंपरा?
राजनीतिक दलों का कहना है कि राजधानी अदला-बदली से दोनों क्षेत्रों के बीच तालमेल बढ़ाने में सहायता मिलेगी और स्थानीय कारोबार को भी बढ़ावा मिलेगा।

नेशनल कांफ्रेंस के नेता उमर अब्दुल्ला का कहना है कि कश्मीर से जो कर्मचारी जम्मू आते थे, उनकी वजह से इसकी अर्थव्यवस्था मजबूत होती थी। वह किराए पर घर लेते थे, जिससे जम्मू के लोगों को फायदा मिलता था। लेकिन, यह व्यवस्था बंद होने से उन्हें नुकसान हुआ है। दरअसल, सियासी दलों की नजरें जम्मू के मतदाताओं पर अटकी पड़ी हैं और उन्हें लगता है कि इससे उनकी सहानुभूति बटोरी जा सकती है।

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