क्या टैलेंट की भरमार से जूझ रही है भारतीय क्रिकेट टीम
भारत को आईसीसी की ट्रॉफ़ी घर लाए दशक भर बीत चुका है. इस साल अक्टूबर-नवंबर के महीने में भारत में 50 ओवर वाला विश्वकप होने जा रहा है. ऐसे में दो सवाल उठते हैं.
पहला स्वाभाविक सवाल हैः 2011 में फ़ाइनल में महेंद्र सिंह धोनी के छक्के के साथ जीत के बाद भारत इस साल फिर से अपनी जीत दोहरा पाएगा?
और दूसरा बहुत कम लेकिन आम तौर पर पूछा जाने वाला सवाल हैः क्या भारतीय क्रिकेट बदलाव के दौर से होकर गुज़र रहा है?
खेल की दुनिया में ऐसा कम ही होता है जब रातों रात बदलाव आ जाए. हां, कभी-कभी लगातार जीत के बाद कुछ सीनियर खिलाड़ी युवाओं के लिए रास्ता बनाते हैं, लेकिन अक़्सर, ये हार ही होती है जो बदलाव की ओर ले जाती है.
क्रिकेट के लिहाज से साल 2022 भारत के लिए औसत था. इस दौरान भारतीय टीम ने अपने कुल खेले गए टेस्ट और एकदिवसीय मैचों में से 58 फ़ीसदी मुक़ाबलों में जीत दर्ज़ की और 70 फ़ीसदी टी-20 मैच अपने नाम किए. ये टीम इस साल के अंत में खेले जाने वाले वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप को खेलने के लिए तैयार है और वर्ल्ड कप जीतने की प्रबल दावेदार भी है.
इसके बीच एक भावना हमेशा बनी रही कि भारत ने अपनी क्षमता से कम खेला. शीर्ष बल्लेबाज़ों ने संघर्ष किया और गेंदबाज़ी ने भी कोई ख़ास छाप नहीं छोड़ी. इसके अलावा बड़े खिलाड़ियों के चोटिल होने से समस्या और बढ़ गई. सभी फॉरमेट की टीमें इन परेशानियों से जूझ रही हैं. हालांकि, भारत टेस्ट रैंकिंग में नंबर 2, टी-20 में नंबर एक और वनडे में चौथे पायदान पर है. संभव है कि कुछ टीमें इस स्थिति से खुश होंगी.
भारतीय टीम की समस्याओं का एक सबसे बड़ा हिस्सा है "हद से अधिक उम्मीदें बांधना". भारतीय टीम से उम्मीद की जाती है कि वो सब मुक़ाबले जीत ले और अगर ये उम्मीद कहीं भी टूटती है तो इससे ऐसे लाखों प्रशंसक निराश होते हैं, जिनके लिए क्रिकेट की जीत निजी ज़िंदगी में कहीं मिली हार को पीछे छोड़ने का एक ज़रिया है.
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मैचों की शेड्यूलिंग भी समस्या का दूसरा बड़ा हिस्सा है. टेलीविज़न नामक बड़े दानव का पेट भरने के लिए यानी टेलीविज़न से होने वाली कमाई को क़ायम रखने के लिए ये ज़रूरी है कि ज़्यादा से ज़्यादा मैच खेले जाएं. उदाहरण के लिए टी-20 विश्व कप गुज़र जाने के बाद टी-20 मुक़ाबले खेलने की कोई ज़रूरत नहीं थी.
भारत इस साल मार्च तक श्रीलंका, न्यूज़ीलैंड और ऑस्ट्रेलिया के साथ कुल नौ एकदिवसीय मुक़ाबले खेलेगा.
असल में, भारतीय टीम इस दौरान अपने ख़िलाफ़ ख़ेल रही होगी. उसकी प्राथमिकता सही कॉम्बिनेशन पर काम करना, खिलाड़ियों को पर्याप्त आराम सुनिश्चित करना (ऑस्ट्रेलिया के साथ सिरीज़ के तुरंत बाद आईपीएल खेला जाएगा) और खिलाड़ियों की चोट पर सही से ध्यान देना होगी.
चीफ़ सेलेक्टर चेतन शर्मा को यह कहते हुए सुनना चिंताजनक था कि चोटिल तेज़ गेंदबाज जसप्रीत बुमराह को दोबारा मैदान पर उतारने में शायद जल्दबाज़ी हुई.
वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप फ़ाइनल की उम्मीद
प्वाइंट टेबल में सबसे ऊपर ऑस्ट्रेलियाई टीम के साथ भी भारत घरेलू मैदान पर चार टेस्ट मैच खेलने वाला है. दक्षिण अफ़्रीका और श्रीलंका भी वर्ल्ड टेस्ट चैंपियनशिप की दौड़ में शामिल हैं लेकिन अंकतालिका के हिसाब से फ़ाइनल में पहुंचने के लिए भारत मज़बूत स्थिति में है.
नवंबर में सचिन तेंदुलकर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास लिए 10 साल हो जाएंगे. दिलचस्प बात ये है कि सचिन ने जिन खिलाड़ियों के साथ अपना आख़िरी टेस्ट मैच खेला था, उनमें से सात आज भी अंतरराष्ट्रीय मुक़ाबले खेल रहे हैं और इनका प्रदर्शन भी अच्छा है.
ये खिलाड़ी हैं 37 वर्षीय रविचंद्रन अश्विन, चेतेश्वर पुजारा जो 35 साल के होने वाले हैं, 34 वर्षीय विराट कोहली. रवींद्र जडेजा भी 34 साल के हैं जबकि शिखर धवन 37 साल के हो गए हैं.
ऐसे में या तो युवा खिलाड़ी पूरी मेहनत नहीं कर रहे हैं या वो कर भी रहे हैं तो उन्हें बड़ी लीग में एंट्री से पहले इनमें से कुछ खिलाड़ियों की तुलना में थोड़ा ज़्यादा इंतज़ार करना पड़ रहा है.
बाएं हाथ के तेज़ गेंदबाज़ अर्शदीप सिंह अगले महीने 24 साल के हो जाएंगे, जबकि टी-20 में दुनिया के सबसे बेहतरीन बल्लेबाज़ सूर्यकुमार यादव 32 साल के हैं.
सूर्य घरेलू सिरीज़ के लिए टेस्ट टीम में शामिल हो सकते हैं, ख़ासतौर पर अगर टीम का मौजूदा टॉप ऑर्डर विपक्षी टीम पर हावी रहने में नाक़ामयाब रहता है.
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ऑलराउंडर की भूमिका में कौन?
भारत को एक ऑलराउंडर की तलाश है या एक ऐसा टॉप 5 स्लॉट में बल्लेबाज़ी करने वाला ख़िलाड़ी, जो ज़रूरत पड़ने पर सीमित ओवरों के मैच में गेंदबाज़ी भी कर ले.
हार्दिक पंड्या और रवींद्र जडेजा इस भूमिका में फ़िट बैठते हैं. अक्षर पटेल भी छोटे फॉर्मैट में उस ओर पहुंच रहे हैं. पर्याप्त गेंदबाज़ों के न रहने पर भारतीय टीम जद्दोजहद करती दिखती है, जैसा कि हाल ही में बांग्लादेश के ख़िलाफ़ हुआ और टीम एकदिवसीय मैच सिरीज़ हार गई.
अगर टी-20 वर्ल्ड कप की हार में भारत के लिए कोई सबक है तो वो ये कि "टी-20 युवाओं का खेल है". भारत ने जब 2007 में ये ख़िताब जीता तो वो संयोग था और जब बीते साल मेलबर्न में भारत ने पहले मुक़ाबले में पाकिस्तान को हराया, तो वो भी एक संयोग था. ग़लती से अच्छा खेल लेने में दिक़्क़त ये है कि टीम को ऐसा भ्रम पैदा हो जाता है कि वो बेहतर प्रदर्शन कर रही है.
अब समय आ गया है कि टी-20 टीम को एक तरफ़ किया जाए, जिसका अपना कप्तान, अपने ख़ास खिलाड़ी, अपना कोच और सहयोगी स्टाफ़ हो. इंग्लैंड ने ऐसा किया है और उसका नतीजा भी उसे मिला. क्रिकेट में विभाजन लाल और सफ़ेद गेंद के बीच नहीं है बल्कि एक तरफ़ टेस्ट और वनडे और दूसरी तरफ़ टी-20 के बीच है.
टी-20 कोच उस पीढ़ी से आने चाहिए जिनके दिमाग में वो फॉर्मैट बसता हो, जो उसी तरह सोचते हों. आपके कवर ड्राइव को सही करने वाले कोचों की तुलना में यहां डेटा ऐनालिस्ट अधिक अहम हैं.
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ओडीआई में सूर्यकुमार जैसे खिलाड़ी की ज़रूरत
भारत के पास एकदिवसीय मैचों के लिए कोई स्थायी टीम नहीं है लेकिन अच्छी बात ये है कि उसके पास वर्ल्ड कप से पहले अपनी गलतियां सुधारने के लिए बहुत समय है. किसी को ऐसा प्रदर्शन करना होगा जैसा सूर्यकुमार यादव ने टी-20 में किया था और ये खुद यादव हो सकते हैं.
शुरुआत में खिलाड़ियों को समर्थन की ज़रूरत है. उन्हें ये भरोसा देने की ज़रूरत है कि वो टीम का हिस्सा हैं. बाएं हाथ के स्पिनर कुलदीप यादव को बांग्लादेश में पहले टेस्ट में 'प्लेयर ऑफ द मैच' रहने के बावजूद दूसरे टेस्ट में बाहर करना, ऐसा न करने का एक तरीका है.
कलाई से स्पिन गेंद फेंकना, उंगली से गेंद को स्पिन देने की तुलना में ज़्यादा कठिन है और इस तरह के गेंदबाज़ हाल के समय में सफ़ल रहे हैं. कुलदीप यादव 'रिस्ट' यानी कलाई के स्पिनर हैं.
फॉरमेट कोई भी हो, संतुलन का सवाल एक ऐसा सवाल है जिस पर कोच और कप्तान को लगातार ध्यान देना होता है. क्या आप एक अतिरिक्त बल्लेबाज़ को चुनेंगे या फिर ऐसे खिलाड़ी को जो थोड़ा-थोड़ा सब कर लेता हो और शायद जिसका दिन अच्छा हो?
क्या आप एक ऐसे विकेटकीपर को चुनेंगे जो नियमित न रहा हो लेकिन वो आपको रन दिलवा सकता है और उम्मीद हो कि वो कैच नहीं छोड़ेगा? दो उंगली से स्पिन करने वाले या एक उंगली और कलाई से स्पिन करने वाला गेंदबाज़, या एक अतिरिक्त मध्यम तेज़ गेंदबाज़?
और टीम के वरिष्ठ खिलाड़ियों का क्या? क्या उन्हें ड्रॉप किया जा सकता है? क्या उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए?
दुर्भाग्य से क्रिकेट जीवन की तरह ही आगे बढ़ता जाता है लेकिन उसे समझने के लिए पीछे मुड़कर देखना पड़ता है. अंत में एक आदर्श टीम की पहचान तो भारत के फ़ाइनल मैच खेलने के बाद ही होगी!
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