Infantry Day: आज ही के दिन स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य अभियान हुआ, जानिए क्या है इन्फेंट्री डे का इतिहास
Infantry Day: आज ही के दिन स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य अभियान हुआ, जानिए क्या है इन्फेंट्री डे का इतिहास
Infantry Day 2022: भारतीय सेना इन्फेंट्री डे हर साल 27 अक्टूबर को मनाती है। इन्फेंट्री दिवस हर साल 27 अक्टूबर को उन सैनिकों को श्रद्धांजलि देने के लिए मनाया जाता है जिन्होंने देश के लिए लड़ाई लड़ी और कर्तव्य के अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। इस साल 27 अक्टूबर को 76वां फेन्फैंट्री दिवस मनाया जा रहा है। आज के दिन को मनाने के लिए सैनिक सभी प्रमुख दिशाओं, वेलिंगटन (तमिलनाडु), जम्मू (जम्मू और कश्मीर), शिलांग (मेघालय), और अहमदाबाद (गुजरात) से एक साथ चार बाइक रैलियों का आयोजन कर रहे हैं। रैली 16 अक्टूबर को शुरू हुई और देश भर की यात्रा को कवर करेगी, जिसका समापन पैदल सेना दिवस पर राष्ट्रीय युद्ध स्मारक पर होगा।

जानिए क्या है इन्फेंट्री डे का इतिहास?
-आज ही के दिन 27 अक्टूबर को 1947 में स्वतंत्र भारत का पहला सैन्य अभियान हुआ था। इस दिन सबसे पहले भारतीय पैदल सेना ने पाकिस्तानी घुसपैठियों से कश्मीर को आजाद करवाया था।
-आजादी के बाद पाकिस्तान ने कश्मीर को हड़पने की योजना बनाई थी। 22 अक्टूबर 1947 को पाकिस्तान ने 5 हजार कबायलियों को कश्मीर में घुसपैठ करके कब्जा करने के लिए भेजा था। पाकिस्तान के नियमित सैनिक 22 अक्टूबर को उत्तर पश्चिम सीमा प्रांत (NWFP) के आदिवासी और स्वयंसेवकों के वेश में जम्मू-कश्मीर में दाखिल हुए थे। समूह का उद्देश्य राज्य पर जबरन कब्जा करना और इसे पाकिस्तान के साथ मिलाना था।
- तब जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह ने भारत सरकार से मदद मांगी थी। जिसके बाद जम्मू और कश्मीर के महाराजा हरि सिंह के विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने के बाद 26 अक्टूबर, 1947 को यह क्षेत्र भारतीय प्रभुत्व का हिस्सा बन गया था।
-इसके बाद सिख रेजिमेंट की पहली बटालियन पाकिस्तानी आक्रमणकारियों के खिलाफ लड़ने के लिए श्रीनगर एयरबेस पर पहुंची। लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय की कमान वाली पहली भारतीय बटालियन को 26 अक्टूबर की रात को सूचना दी गई। उसके बाद वह दिल्ली से श्रीनगर के लिए रवाना हुए।
-27 अक्टूबर को 947 को भारतीय पैदल सैनिकों ने कश्मीर को कबायलियों के चंगुल आजाद करवाया। इस दौरान बारामूला के पास लेफ्टिनेंट कर्नल दीवान रंजीत राय शहीद हो गए। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत देश के दूसरे सर्वोच्च वीरता पुरस्कार, महावीर चक्र से सम्मानित किया गया था।












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