72 वर्षों में कितना बदल चुका है इलेक्शन, 2024 लोकसभा चुनाव से पहले एक नजर

देश में अबतक 17 आम चुनाव हो चुके हैं। 2024 में 18वां आम चुनाव होगा। यह यात्रा आजादी मिलने के चार वर्षों बाद 1951-52 में हुए पहले आम चुनावों से ही चल रही है। इन 72 वर्षों में देश की चुनाव व्यवस्था में बहुत ही बदलाव आ चुका है और यह परिवर्तन लगातार चल रहा है।

लाल किले से इस 15 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र को विश्व की सबसे जनसंख्या वाला देश बता चुके हैं। भारत में मतदाताओं की संख्या भी दुनिया में सबसे अधिक यानी 90 करोड़ से ज्यादा है।

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भारतीय चुनावी व्यवस्था 'लोकतंत्र की जननी' की पहचान
भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है और यह बात यहां की चुनाव व्यवस्था में पूरी तरह से फिट बैठती है। सारी सीमाओं के बावजूद ये तथ्य है कि पिछले आम चुनावों यानी कि 2019 के लोकसभा चुनावों में भारत में वोट डालने के मामले में महिलाओं ने पुरुषों को पछाड़ दिया था।

पूरी तरह से ईवीएम से चुनाव कराने वाला पहला देश
भारत अभी विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था है। दुनिया भर के अर्थशास्त्री इसे विकासशील देश की श्रेणी में रखते हैं। लेकिन, यह भी तथ्य है कि 90 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं वाला यह देश कागज वाले मतपत्र से पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक आधारित इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) में शिफ्ट करने वाला विश्व का पहला मुल्क है।

पहला आम चुनाव 68 चरणों में हुआ था
देश में पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर, 1951 से लेकर 21 फरवरी, 1952 के बीच 68 चरणों में हुआ था। इसमें करीब 53 राजनीतिक पार्टियों के प्रत्याशियों और 533 निर्दलीय उम्मीदवारों ने 489 सीटों पर भाग्य आजमाया था। इस चुनाव में 45.8% वो पड़े थे।

पहले चुनाव में हर उम्मीदवार के लिए अलग रंग का बैलेट बॉक्स था
बिल्कुल ही अनपढ़ वोटरों को भी मतदान में किसी तरह की दिक्कत न हो इसलिए पहले आम चुनावों में हर उम्मीदवारों के नाम और चिन्ह से अलग रंग वाले बैलेट बॉक्स में मतदान की व्यवस्था की गई थी। लोगों को जिस उम्मीदवार के लिए वोट देना था, उन्होंने उसी के लिए आवंटित बैलेट बॉक्स में मतदान किया था।

2019 में हुई 67.4% वोटिंग
2019 के 17वें लोकसभा चुनाव आते-आते काफी कुछ बदल गया। सिर्फ 7 चरणों में चुनाव हुए, जो 50 दिनों के अंदर कराए गए। कुल 543 लोकसभा सीटों पर चुनाव हुए, जिसमें नोटा समेत 673 राजनीतिक दलों ने भाग लिया। चुनाव लड़ने वाले कुल उम्मीदवारों की संख्या 8,054 (निर्दलीय समेत) रही। वहीं कुल मतदान बढ़कर 67.4% तक पहुंच गया।

1980 के दशक में 18 साल हुई वोटरों की उम्र
भारतीय चुनाव प्रणाली में सबसे बड़ा बदलाव 1980 के दशक के आखिर में हुआ। पहले आम चुनाव में भारत ने 21 साल से अधिक के लोगों को बिना किसी भेदभाव के एक समान मताधिकार का हक दिया था। उस समय के लिए यह बहुत क्रांतिकारी कदम था। 1980 के दशक में मतदाता की न्यूनतम आयु 18 वर्ष कर दी गई।

पहले चुनाव में 28 लाख महिला वोटरों ने दिलचस्प कारण से नहीं किया मतदान
देश के पहले आम चुनाव में एक बहुत ही दिलचस्प घटना हुई थी। तब तकरीबन 28 लाख महिला वोटर इसलिए वोट नहीं डाल पाई थीं, क्योंकि सामाजिक बंधनों की वजह से उन्होंने खुद का नाम बताने की जगह फलां की पत्नी या फलां की माता बताया था। वोटर लिस्ट में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए, वह वोट नहीं डाल सकीं।

चुनाव आयोग की पहल से 1957 में महिलाओं में बढ़ी जागरूकता
अगले आम चुनाव यानी 1957 से पहले इसको लेकर काफी जागरूकता अभियान चलाया गया। महिलाओं से अपने खुद का नाम लिखवाने को कहा गया और इसका भरपूर असर भी नजर आया। धीरे-धीरे महिला मतदाताओं की संख्या भी बढ़ती गई और उनमें मतदान के प्रति जागरूकता भी पैदा होती गई।

2019 के चुनाव में पुरुषों से ज्यादा महिलाओं ने वोट डाले
हालांकि, फिर भी 1962 में मतदान में भाग लेने वाली महिला वोटरों की संख्या पुरुष मतदाताओं के मुकाबले 16.71% कम थी। लेकिन, 2019 के चुनाव में महिला मतदाताओं ने वोटिंग के मामले में पुरुषों को भी पीछे छोड़ दिया। पुरुष मतदाताओं की तुलना में इस चुनाव में 0.17% अधिक महिला वोटरों ने मतदान किया।

महिलाओं की वोटिंग के साथ-साथ लोकसभा में प्रतिनिधित्व भी बढ़ गया
पहले चुनाव से लेकर आगे के 16 और चुनावों में महिला मतदाताओं की मतदान प्रक्रिया में न सिर्फ दिलचस्पी ही बढ़ी, बल्कि संसद में उनका प्रतिनिधित्व भी बढ़ा। पहले आम चुनाव में सिर्फ 24 महिला उम्मीदवार जीती थीं। 2019 में इनकी संख्या बढ़कर 78 हो गई।

भारतीय चुनाव व्यवस्था में कुछ अन्य बदलाव-

  • इंडेलिबल इंक का इस्तेमाल- 1962 के चुनाव से
  • ईवीएम की शुरुआत- 1990 के दशक से
  • पूरी तरह ईवीएम से ही चुनाव- 2004 के चुनाव से
  • VVPAT का प्रयोग- 2014 में नागालैंड से
  • VVPAT- 2019 से सभी चुनावों में

आने वाले दिनों में ऐसी व्यवस्था हो रही है कि एक वोटर देश के चाहे जिस भी कोने में रहे, वह अपने चुनाव क्षेत्र के लिए तकनीक की सहायता से वोट डाल सकता है। बुजुर्गों और बीमारों के लिए सीमित स्तर पर इस तरह की पहल शुरू भी हो चुकी है।

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