भारत क्यों है इंटरनेट शटडाउन का ‘बादशाह’
भारत ने लगातार चौथे साल इंटरनेट बैन करने का इतिहास बनाया है. यानी साल 2021 में दुनिया भर में दर्ज किए गए 182 इंटरनेट प्रतिबंधों में से 106 भारत में हुए.
इंटरनेट तकनीक मामलों के वैश्विक थिंक-टैंक एक्सेस नाउ द्वारा जारी किए गए ताज़ा आँकड़ों से ये भी पता चलता है कि साल 2016 से लेकर 2021 के बीच तक दुनिया में अगर इंटरनेट पर बैन या प्रतिबंध लगाने के 937 मामले सामने आए तो उसमें से पूरे 567 भारत से ही थे.
रिपोर्ट के मुताबिक़ 'विरोध प्रदर्शनों को दबाने से लेकर ऑनलाइन फ्रॉड वग़ैरह रोकने' के लिए इंटरनेट बंद करने के कारण बताए गए हैं.
वैसे भारत में इस बात को लेकर एक लंबे समय से बहस भी जारी है कि इंटरनेट प्रतिबंध कब और क्यों लगाया जाना चाहिए.
मिसाल के तौर पर, जनवरी 2020 में भारत की सुप्रीम कोर्ट ने भी माना था कि इंटरनेट के माध्यम से सूचना तक पहुँच भारतीय संविधान के तहत दिया गया एक मौलिक अधिकार है.
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सुप्रीम कोर्ट ने बताया मौलिक अधिकार
अदालत ने अनुराधा भसीन VS यूनियन ऑफ़ इंडिया मामले की सुनवाई करते हुए ये भी फ़ैसला दिया कि इंटरनेट के इस्तेमाल पर सरकार अगर प्रतिबंध लगाती है तो वो अस्थायी, एक दायरे तक में सीमित, क़ानूनी तौर पर वैध और आवश्यक होना चाहिए.
दिसंबर, 2021 में कांग्रेस नेता शशि थरूर की अगुवाई में बनी एक संसदीय समीति ने लोक सभा में पेश हुई अपनी रिपोर्ट में भी इंटरनेट प्रतिबंधों वाले सरकारी फैसलों पर सवाल उठाते हुए ज़्यादा पारदर्शिता बरतने और सही आँकड़े मुहैया कराने की मांग की थी.
संसदीय समिति के मुताबिक़ भारतीय सेल्यूलर ऑपरेटर्स ने उन्हें "इस बात से अवगत कराया था कि किसी सर्किल एरिया में एक घंटे के इंटरनेट प्रतिबंध लगा देने से हर उस घंटे क़रीब ढाई करोड़ रुपयों का नुक़सान भी झेलना पड़ता है".
उधर केंद्र सरकार का कहना रहा है कि, "देश में इंटरनेट बंद होने के असल कारणों में कानून-व्यवस्था और सुरक्षा चिंताएं सबसे प्रमुख हैं".
सेंटर फ़ॉर इंटरनेट एंड सोसायटी के पॉलिसी डायरेक्टर प्रनेश प्रकाश को लगता है कि, "इंटरनेट शटडाउन अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार क़ानून में भारत की प्रतिबद्धता का उल्लंघन करते हैं और उन्हें ग़ैर-क़ानूनी करार दिया जाना चाहिए".
उनके मुताबिक़, "अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्था ने अपने 'ज्वाइंट डेक्लेरेशन ऑन फ़्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन' में इस तरह के प्रतिबंधों को ग़ैर-ज़रूरी और मौलिक अधिकारों का हनन करने वाले करार देते हुए कहा था कि भारत में या कहीं और भी किसी व्यक्ति को किसी तरह के दूरसंचार या जानकारी वाले माध्यम से दूर रखना अच्छी मंशा नहीं दर्शाता".
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जम्मू-कश्मीर में सबसे ज़्यादा शटडाउन
अगर राज्यों की बात की जाए तो पिछले पांच सालों में भारत में सबसे ज़्यादा मामले जम्मू-कश्मीर में दिखे जिसके बाद नंबर उत्तर प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र सूची में आते हैं.
जितने आँकड़े मौजूद हैं उनके मुताबिक़ जम्मू-कश्मीर में सबसे ज़्यादा इंटरनेट शटडाउन दर्ज किए गए हैं.
यानी साल 2021 में पूरे भारत में हुए 106 शटडाउन में से पूरे 85 इसी राज्य में हुए जिसमें पुलवामा, श्रीनगर और कुलगाम सबसे ज़्यादा प्रभावित होने वाले क्षेत्र रहे.
सरकार का दावा रहा है कि सभी इंटरनेट प्रतिबंधों को लगाने की प्रमुख वजह चरमपंथियो के ख़िलाफ़ होने वाले ऑपरेशन, अशांति फैलाने की कोशिश को रोकना और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों पर क़ाबू पाने की नीति रही.
लेकिन एक्सेस नाउ संस्था की एशिया पैसिफ़िक पॉलिसी काउन्सिल नम्रता महेश्वरी के मुताबिक़, "इंटरनेट शटडाउन इस आधार पर सही नहीं ठहराया जा सकता क्योंकि यह व्यक्ति के मौलिक अधिकार को छीन लेता है".
भारत की सुप्रीम कोर्ट ने भी साल 2020 में इंटरनेट एक्सेस को एक मौलिक अधिकार के तौर पर माना था.
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आर्थिक नुक़सान
दुनिया में इंटरनेट प्रतिबंध के मामलों में शीर्ष स्थान पर बने रहने का एक दूसरा पहलू आर्थिक चोट भी है.
जहां एक तरफ़ सरकार ने ज़्यादा से ज़्यादा बैंकिंग और लेन-देन, कारोबार और पढ़ाई तक को ऑनलाइन करने की प्रक्रिया तेज़ रखी है वहीं दूसरी तरफ़ इंटरनेट शटडाउन होने से सारा काम-काज एकाएक लगभग ठप पड़ जाता है.
ब्रिटेन के डिजिटल प्राइवेसी एंड सिक्योरिटी रिसर्च ग्रुप 'टॉप-10 वीपीएन' की एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2021 में कुल 8,920 घंटों तक इंटरनेट पर लगे बैन से क़रीब 1.3 करोड़ भारतीय उपभोक्ता प्रभावित हुए, वहीं दूसरी तरफ़ इससे करीब 200 अरब रुपयों का नुक़सान भी हुआ.
भारत में इंटरनेट फ़्रीडम फ़ाउंडेशन के संस्थापक और वरिष्ठ वकील अपार गुप्ता पिछले कई सालों से 'इंटरनेट फ़्रीडम' की पैरवी करते हुए अदालतों का दरवाज़ा खटखटाते रहे हैं.
उनके अनुसार, "अब इसमें कोई शक़ नहीं कि इंटरनेट प्रतिबंधित करने से नुक़सान ज़्यादा और फ़ायदे कम होते हैं. अदालत एक ऐसे शटडाउन पर स्टे भी दे चुकी है. ज़रूरत भरोसा बढ़ाने की है, घटाने की नहीं".
ग़ौरतलब है कि मंगलवार को रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्ज़ द्वारा जारी की गई सालाना रिपोर्ट के मुताबिक़ भारत में पत्रकारों की आज़ादी लगातार घटती जा रही है और उन्हें अपने काम के दौरान कई बड़े खतरों से गुज़रना पड़ता है.
इस रिपोर्ट के अनुसार विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक - 2022 में 180 देशों में से आठ स्थानों की गिरावट के साथ अब भारत 150वें स्थान पर पहुँच गया है जबकि पिछले साल भारत को 142वां स्थान मिला था.
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