क्‍या है स्‍पेशल फोर्स 22, इसके तिब्‍बती सैनिकों के आगे 30 अगस्‍त को टिक नहीं पाया चीन

नई दिल्‍ली। लद्दाख में चीन बॉर्डर पर इस समय हालात बेहद तनावपूर्ण है। 29 और 30 अगस्‍त की रात चुशुल में चीन की पीपुल्‍स लिब्रेशन आर्मी (पीएलए) के साथ भारतीय सेना के जवानों की झड़प हुई। 15 जून को गलवान घाटी के बाद चुशुल में हुई इस घटना के बाद तनाव एक बार फिर चरम पर पहुंच गया। 15 जून को गलवान में जहां 16 बिहार रेजीमेंट और पंजाब के कमांडोज ने चीन को धूल चटाई तो इस बार चीन का सामना हुआ उन तिब्‍बती नागरिकों से लैस 7 विकास बटालियन से, जिसका कोड है 22। इस रेजीमेंट को इस्‍टैब्लिशमेट 2 2 कहते हैं और इसमें तिब्‍बत के निर्वासित नागरिकों को तरजीह दी जाती है।

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    62 में चीन की जंग के बाद हुई तैयार

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    29 और 30 अगस्‍त के बाद से हर किसी की जुबान पर इसका ही नाम है। 7 विकास एक स्‍पेशल फ्रंटियर फोर्स (एसएफएफ) है। नवंबर 1962 में चीन के साथ पहली जंग खत्‍म होने के बाद ये स्‍पेशल फोर्स अस्तित्‍व में आई। उस समय इंटेलीजेंस ब्‍यूरो (आईबी) के डायरेक्‍टर बीएन मलिक को इसका पहला मुखिया नियुक्‍त किया गया। आपको जानकर हैरानी होगी कि 22 या 7 विकास में तिब्‍बती नागरिकों को शामिल किया जाएगा, यह फैसला तब अमेरिकी इंटेलीजेंस एजेंसी सीआईए और आईबी ने मिलकर लिया था। यह वह दौर था जब तिब्‍बत में गुरिल्‍ला मूवमेंट जारी था। काफी ऑफिसर्स और जवान तब पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग में थे।

    एक तिब्‍बती ऑफिसर हुए शहीद

    एक तिब्‍बती ऑफिसर हुए शहीद

    30 अगस्‍त को तिब्‍बती मूल के कंपनी लीडर न्‍याइमा तेनजिन, थाकुंग पोस्‍ट पर चीन से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्‍त हो गए है।बीएन मलिक ने तब दलाई लामा के बड़े भाई ग्‍यालो थोंडुप से इनका संपर्क कराया। अगले कुछ माह के अंदर उन तिब्‍बती नागरिकों को इसमें शामिल किया गया जो सन् 1959 के बाद भारत में बतौर शरणार्थी आए थे। तेजी से इनकी संख्‍या बढ़ी और 6,000 से 7,000 तिब्‍बतियों की भर्ती हो गई। उस समय इसका आइडिया तिब्‍बत वापस जाकर उसे चीन के चंगुल से आजाद कराना था। बहुत से युवा तिब्‍बती इसमें शामिल हुए। तिब्‍बत मामलों के जानकारी क्‍लाउडे आरपी ने इंडिया टुडे को दिए इंटरव्‍यू में बताया कि गठन के बाद भी इसका मकसद पूरा नहीं हो पा रहा था और तिब्‍बत के इस खास बल को कभी चीन के खिलाफ लड़ने का मौका नहीं मिला।

    71 की जंग में भी था रोल

    71 की जंग में भी था रोल

    उन्‍होंने इस इंटरव्‍यू में जानकारी दी कि इस्‍टैब्लिशमेंट 22 ने सन् 1971 की जंग में पाकिस्‍तान के खिलाफ जंग में भी योगदान दिया था। मेजर जनरल सुजन सिंह उबान एसएफएफ के पहले इंस्‍पेक्‍टर जनरल थे। भारतीय सेना ने जब बांग्‍लादेश में ऑपरेशन शुरू किया तो उससे पहले एसएफएफ वहां पर गई थी। 7 विकास कैबिनेट सेक्रेटरी और पीएमओ के तहत आती है। सेना के साथ इसका संपर्क बहुत कम होता है। इस फोर्स में शामिल जवानों को भारत की इंटेलीजेंस एजेंसी रॉ की तरफ से भी ट्रेनिंग दी जाती है। 30 अगस्‍त को पहला मौका था जब गठन के बाद इस फोर्स का प्रयोग चीन को जवाब देने में किया गया था।

    कैसे मिला नाम 22

    कैसे मिला नाम 22

    सूत्रों के मुताबिक चीन की परमाणु हथियारों की तैनाती करने की योजना पर नजर रखने के लिए इसका प्रयोग इस समय लद्दाख में हो रहा है। एसएफएफ को इसका नाम इस्‍टैब्लिशमेंट 22 इसके पहले मुखिया फाउंडर मेजर जनरल सुजन सिंह उबान ने दिया था। मेजर जनरल सुजन सिंह वर्ल्‍ड वॉर टू के समय ब्रिटिश इंडियन आर्मी की 22वीं माउंटेन रेजीमेंट को कमांड कर रहे थे। इसका हेडक्‍वार्टर उत्‍तराखंड के चकराता में है और करीब 5,000 कमांडो को पहाड़ों पर लड़ाई के गुर सिखाए जाते हैं। इनके साथ सर्व करने वाली ऑफिसर्स भी इनके बारे में कोई जानकारी किसी से साझा नहीं कर सकते हैं।

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