शहीदों को सलाम: गुरिल्ला युद्ध, कालापानी की सजा, जानें कैसे सावरकर ने जेल से काटी ब्रिटिश शासन की जड़ें?
Who was Veer Savarkar: वीर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख सेनानी थे। इनका पूरा नाम विनायक दामोदर सावरकर था। वह एक शिक्षित परिवार से थे और अपने बचपन से ही स्वतंत्रता संग्राम में रुचि रखते थे। उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया और भारतीय युवाओं को संगठित करने का काम किया। 1911 में, सावरकर को दो आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई।
सावरकर पहले स्वतंत्रता सेनानी थे, जिन्हें अंग्रेजों ने काला पानी की सजा सुनाई। काला पानी की सजा बहुत ही कठोर मानी जाती थी, जहां कैदियों को अति दुष्कर परिस्थितियों में रखा जाता था और कठोर श्रम करना पड़ता था। 15 अगस्त 1947 में भारत को आजादी मिली।

करीब 19 साल बाद सावरकर को अपने जीवन का उद्देश्य पूर्ण होने का आभास हुआ। अन्न-जल त्याग कर 26 फरवरी 1966 को, 83 वर्ष की आयु में, वीर सावरकर ने अंतिम सांस ली। वनइंडिया आपको अपनी 'शहीदों को सलाम' सीरीज के जरिए 'सावरकर' के योगदान से रूबरू करा रहा है...
वीर सावरकर का जन्म 28 मई, 1883 को महाराष्ट्र के नासिक के भागपुर गांव में हुआ था। वह एक स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ, वकील, समाज सुधारक और हिंदुत्व के दर्शन के सूत्रधार थे। उनके पिता का नाम दामोदरपंत सावरकर और माता राधाबाई था। सावरकर ने कम उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया था। वह अपने बड़े भाई गणेश (बाबाराव) से काफी प्रभावित थे। वह अपनी बहादुरी के लिए जाने जाते थे और इसलिए उन्हें 'वीर' उपनाम मिला, जो एक साहसी व्यक्ति थे। सावरकर ने फर्ग्युसन कॉलेज, पुणे से शिक्षा प्राप्त की और आगे की पढ़ाई के लिए लंदन गए।
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका
सावरकर ने "1857 का स्वतंत्रता संग्राम" नामक पुस्तक लिखी, जिसमें उन्होंने 1857 की क्रांति को भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम बताया। यह पुस्तक ब्रिटिश सरकार के लिए खतरा थी क्योंकि इसमें ब्रिटिश शासन के खिलाफ विद्रोह करने की प्रेरणा दी गई थी। सावरकर ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ क्रांतिकारी गतिविधियों का समर्थन किया। 'मित्र मेला' और' फ्री इंडिया सोसाइटी' की स्थापना की, जो एक गुप्त क्रांतिकारी संगठन था। इन संगठनों का उद्देश्य भारतीय युवाओं को संगठित करना और उन्हें सशस्त्र संघर्ष के लिए तैयार करना था। उन्होंने गुरिल्ला युद्ध की तकनीकों और सशस्त्र संघर्ष की रणनीतियों का प्रशिक्षण दिया।
भारत की आजादी में रोल
वीर सावरकर का योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने सशस्त्र संघर्ष का समर्थन किया और युवाओं को संगठित किया। उनके विचारों ने कई स्वतंत्रता सेनानियों को प्रेरित किया। वह एक प्रभावशाली लेखक, कवि, और वक्ता थे जिन्होंने भारतीय समाज में नवजागरण का कार्य किया।
वीर सावरकर का नारा
वीर सावरकर का प्रमुख नारा था "हिंदुत्व", जो उन्होंने हिंदू संस्कृति और परंपराओं के पुनरुत्थान के लिए गढ़ा था। हालांकि यह नारा राजनीतिक और सामाजिक रूप से विवादित भी रहा है।
गुरिल्ला युद्ध से अंग्रेजों की काटी जडें!
वीर सावरकर ने '1857 के विद्रोह' की तर्ज पर स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए गुरिल्ला युद्ध के बारे में सोचा। उन्होंने "द हिस्ट्री ऑफ द वॉर ऑफ इंडियन इंडिपेंडेंस" नामक पुस्तक लिखी, जिसने कई भारतीयों को आजादी के लिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ने के लिए प्रेरित किया। सावरकर ने गुरिल्ला युद्ध की तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया, जिसमें छोटे समूहों में छापामार हमले करना, दुश्मन के कमजोर बिंदुओं पर हमला करना, और शत्रु के संसाधनों को नष्ट करना शामिल था। उन्होंने इस प्रकार के असंतुलित युद्ध को प्रभावी मानते हुए ब्रिटिश शासकों के खिलाफ इसका समर्थन किया।
लंदन में गिरफ्तारी
1909 में, सावरकर के भाई गणेश सावरकर को को लंदन में गिरफ्तार किया गया और भारत लाया गया। इसके विरोध में विनायक सावरकर ने लंदन में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलन किया। 1909 में ही, मदन लाल धींगरा ने लंदन में विलियम हट कर्ज़न वायली की हत्या कर दी थी, जिसमें सावरकर का हाथ माना गया। हालांकि सावरकर ने इस घटना में प्रत्यक्ष रूप से भाग नहीं लिया था, फिर भी उन्हें संदेहास्पद गतिविधियों में शामिल माना गया। उन्हें नासिक षड्यंत्र केस में मुख्य आरोपी बनाया गया। सावरकर को 1910 में ब्रिटिश पुलिस द्वारा पेरिस में गिरफ्तार किया गया था।
सजा और काला पानी भेजना
1911 में, सावरकर को दोहरे उम्रकैद की सजा सुनाई गई, प्रत्येक 25-25 सालों की थी। यानी कुल 50 सालों के लिए। उन्हें अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की कुख्यात सेलुलर जेल (काला पानी) में भेजा गया। काला पानी की सजा बहुत ही कठोर मानी जाती थी, जहां कैदियों को अति दुष्कर परिस्थितियों में रखा जाता था और कठोर श्रम करना पड़ता था।
जेल के दौरान सावरकर का जीवन
सावरकर ने सेलुलर जेल में अपने कठिन कारावास के दौरान भी अपने विचारों को लिखना और व्यक्त करना जारी रखा।
1921 में, उन्हें रत्नागिरी जेल में स्थानांतरित किया गया। 1924 में, उन्हें जेल से रिहा किया गया लेकिन उन पर कई प्रतिबंध लगाए गए और वे रत्नागिरी में नजरबंद रहे। वीर सावरकर की जेल यात्रा और उनके संघर्ष ने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम को एक नई दिशा दी और उन्हें भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण स्थान दिलाया।
आजादी के बाद त्याग दिया संसार
15 अगस्त 1947 को भारत को ब्रिटिश शासन से आजादी मिली। करीब 19 साल बाद उन्होंने महसूस किया कि उनका जीवन उद्देश्य पूरा हो चुका है और अब उनका शरीर केवल एक भार बन चुका है। वीर सावरकर की स्वास्थ्य स्थिति बिगड़ने लगी थी। वे बुढ़ापे और विभिन्न बीमारियों से पीड़ित थे, जो उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही थीं। सावरकर ने "आत्मार्पण" की संकल्पना को अपनाया, जिसका अर्थ है कि जीवन के सभी धारणाओं और आवश्यकताओं का त्याग करना।
1 फरवरी 1966 को भोजन, पानी, और दवाओं का त्याग कर दिया। उन्होंने अपने प्रियजनों और अनुयायियों को अपने निर्णय के बारे में सूचित किया और उनसे आग्रह किया कि वे उन्हें इस निर्णय में समर्थन दें। अपने अंतिम दिनों में, सावरकर ने किसी भी प्रकार की चिकित्सा सहायता लेने से इनकार कर दिया और पूरी तरह से ईश्वर की इच्छा पर छोड़ दिया। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों का पाठ किया और ध्यान में लीन रहे। 26 फरवरी 1966 को, 83 वर्ष की आयु में, वीर सावरकर ने अंतिम सांस ली।
वीर सावरकर का परिवार
वीर सावरकर के परिवार में उनकी पत्नी यमुनाबाई, उनके तीन भाई - गणेश (बाबाराव), नारायण, और माखनलाल - और एक बहन थीं। उनके बच्चे नहीं थे, लेकिन उनके भाई-बहनों के परिवार ने सावरकर की विरासत को आगे बढ़ाया।
2024 में, वीर सावरकर के पोते रणजीत सावरकर सबसे प्रमुख हैं, जो सक्रिय रूप से सावरकर की विरासत और विचारधारा को प्रसारित कर रहे हैं। उनके अन्य वंशज भी विभिन्न सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल हैं, लेकिन रणजीत सावरकर सबसे अधिक जाने जाते हैं।
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