Independence Day 2024: आज़ादी के 77 साल,कायम है इंडिया और भारत का फर्क, ग्रामीण भारत की चुनौतियां
Challenges Of Rural India: लोकसभा चुनाव 2024 से ठीक पहले देश में "इंडिया बनाम भारत" नया विवाद खड़ा हो गया था। यह मुद्दा वह सियासी संग्राम का हिस्सा था, लेकिन आजादी के बाद से ही भारत और इंडिया के बीच एक खाई कायम रही है। दरअसल इंडिया को शहरी आबादी और भारत को ग्रामीण जनजीवन के प्रतीक के तौर पर देखा जाता रहा है। कहने को दोनों देश के नाम हैं,पर समाज के भीतर एक बड़े अंतर को दर्शाते हैं।
देश की अर्थव्यवस्था में भी मौजूदा मॉडल में गांवों की भागीदारी खास है। महात्मा गांधी ने गांव और खेती की ताकत को समझा था, उन्होंने ग्रामोद्योग आधारित अर्थव्यवस्था काे बढ़ावा देने की पुरजोर वकालत की थी। आज़ादी के 75 साल से भी अधिक का समय बीत जाने के बाद भी देश में ग्रामीण भारत कई प्रकार की चुनौतियों से लड़ रहा है।

तनाव के ग्रसित है "ग्रामीण भारत"
दिल्ली की ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण इलाकों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं बढ़ रही हैं। सभी लिंगों के 45 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने चिंता संबंधी समस्याओं की बात कही है। इससे पता चलता है कि गांव अब पहले की तरह स्वस्थ और खुशहाल नहीं हैं। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहां 68 फीसदी आबादी गांवों में ही रहती है, लेकिन रोजगार उपलब्ध ना होने के कारण से पलायन होता है,जिससे ग्रामीण शहरों में मजदूरी करके गुजर बसर करने के लिए मजबूर हो रहे हैं।

पलायन को रोकना है जरूरी!
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की 2021 की रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार के लिए एक राज्य से दूसरे राज्य में 87.5 फीसदी लोग पलायन करते हैं। कौशल विकास पलायन को रोक सकता है, क्योंकि इसमें उत्पादकता में वृद्धि करने की क्षमता है, जिससे ग्रामीण आबादी की आय में वृद्धि की जा सकती है। आज़ादी के बाद से लेकर आज तक हर सरकार ने गांवों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए तमाम योजनाओं को शुरू किया,लेकिन जमीनी स्तर पर क्रियान्वयन न हो पाने से हालात नहीं बदल पाएं हैं।
तमाम सरकारें स्किल डेवलपमेंट की बातें करती हैं, लेकिन ग्रामीण भारत से जुड़ा उद्यमी, कुशल कारीगर, युवा और मजदूर गांवों से पलायन करने पर विवश है। पलायन बढ़ने के साथ ही मजदूर संकट ने किसानों की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। यही वजह है कि मनरेगा को कृषि से जोड़ने की मांग होती रही है। संभव है की अगर ऐसा होता है गांवों में भरपूर रोजगार होगा, खेती में किसानों की लागत घटेगी, आमदनी बढ़ेगी और खेती में मजदूर संकट का समाधान हो सकेगा।

कालाहांडी के दाना माझी को कौन भूल सकता हैं?
केंद्र और राज्य सरकारों के लिए विकसित भारत के ध्येय को पाना आसान नहीं हैं। देश के कई गांव आज भी शहरों से नहीं जुड़ पाए हैं। मध्य प्रदेश के जबलपुर जिला मुख्यालय से करीब 70 किलोमीटर दूर स्थित खिरका डूंडी गांव वीरान हो चुका है। यहां लोग अपना घर और जमीन छोड़कर दूसरे गांवों में बसने लगे हैं। खिरका डूंडी में एक समय 250 से ज्यादा परिवार थे, लेकिन अब 10 से 15 परिवार ही बचे हैं। यह केवल एक उदाहरण है कि एमपी समेत कई राज्यों में सड़क, पानी बिजली और अस्पताल न होने के कारण न जाने कितने लोग ग्रामीण भारत छोड़कर न्यू इंडिया के विकसित शहरों में मजदूरी करने के लिए विवश हैं।
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कमोबेश यही स्थित छत्तीसगढ़, ओड़िशा,झारखंड, बिहार, यूपी के कई गांवों की हैं। यह लगभग सभी देखा और महसूस किया होगा कि आज भी गांवो में रहने नदी या पहाड़ पार करके कोसो दूर रोज स्कूल जाते हैं। अब भी देशभर के गांवों में सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के आभाव में मरीज को खाट पर ही लेटकर अस्पताल तक ले जाया जाता हैं। ज्यादा समय नहीं बीता है, ओडिशा के कालाहांडी के दाना माझी को कौन भूल सकता हैं,जो अपनी पत्नी के शव को कंधे पर लादकर 10 किलोमीटर पैदल चले थे।

माओवादी समस्या और जल जंगल जमीन के मसले
छत्तीसगढ़,आंध्र प्रदेश और ओड़िशा जैसे राज्यों में माओवादियों की बढ़ती पैठ भी,ग्रामीण भारत की समस्याओं की श्रृंखला का आधार है। इन राज्यों के कई वनांचलों में जंगलो के काटे जाने, जल-जंगल- जमीन पर कॉर्पोरेट जगत की दखल और आदिवासी जीवन में दखल बढ़ने से सशस्त्र विद्रोह भड़का हुआ है। ग्रामीण भारत का युवा शोषित हैं, तो वहीं जंगलों पहाड़ों को काटकर खदाने और उद्योग लगाकर शहरी उद्यमी लाभ कमा रहे हैं।
छत्तीसगढ़ के सुकमा और बीजापुर जिले की सरहद पर स्थित सिलगेर का उदाहरण पूरी दुनिया ने देखा है। इस इलाके माओवदियों की समानांतर सत्ता चलती है। ग्रामीणों में सरकार के प्रति अविश्वास इस हद तक घर कर चुका हैं कि इलाके में सड़क बनाने के काम में लगे सुरक्षाबलों की तैनाती के खिलाफ बड़ा आंदोलन कर चुके हैं। हाल ही में यहां नया पुलिस कैम्प खुला है ,लेकिन कैम्प खुलने के बाद से ही ग्रामीण लगातार कैम्प का विरोध कर रहे हैं। ग्रामीण स्कूल ,अस्पताल तो चाहते हैं, किंतु भ्रष्ट तंत्र ने शासन के प्रति अविश्वास की जड़ों को बेहद मजबूत बना दिया है।

इंडिया को अब भी भारत का ही सहारा, प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना बड़ी समस्या
फोर्ब्स अरबपति रैंकिंग के डेटा से पता चलता है कि 1 बिलियन डॉलर से अधिक की शुद्ध संपत्ति वाले भारतीयों की संख्या 1991 में एक से बढ़कर 2022 में 162 हो चुकी है। एशिया के दो सबसे अमीर व्यक्ति, रिलायंस इंडस्ट्रीज के मुकेश अंबानी और अदानी समूह के गौतम अदानी भारतीय हैं। इसके बावजूद भारत में प्रति व्यक्ति आय बढ़ाना एक बड़ी समस्या है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में यही चिंता जताई है कि भारत समेत 100 से अधिक देश हाई-इनकम वाले देश बनने का प्रयास कर रहे हैं, किंतु उन्हें कड़ी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। पोर्ट के मुताबिक, भारत को अमेरिका के एक चौथाई प्रति व्यक्ति आय के स्तर तक पहुंचने में भी लगभग 75 साल लगेंगे।
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फोर्ब्स के मुताबिक, दुनिया की टॉप-10 इकोनॉमी वाले देश की सूची में अमेरिका 28.78 ट्रिलियन डॉलर की जीडीपी के साथ पहले नंबर पर है। अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय 71.30 लाख है, जबकि भारत की केवल 2.28 लाख रुपए है। इसी प्रकार 143 देशों की ग्लोबल हैप्पीनेस इंडेक्स (वैश्विक प्रसन्नता सूचकांक) में भारत 126वें स्थान पर है। यह स्थित भारत की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्वस्था बनाने के दावों और एशिया के दो सबसे अमीर व्यक्तियों के भारतीय नागरिक होने के बावजूद दुविधाजनक है।

दरअसल, जिस मुस्तैदी से देश में शहरों को स्मार्ट सिटी के रूप में विकसित करने की तत्परता दिखाई देती है, उतनी पहुंचविहीन गांवों के प्रति नहीं झलकती है। सरकारी सेवकों में अपने काम के प्रति उदासीनता और भ्रष्टाचार की बुरी लत ने हालत बिगाड़ रखे हैं। क्योंकि यह मान लिया गया है कि गाँवो में जाकर देखने वाला कोई नहीं हैं। बहरहाल गांवों में मोबाइल सेवा के विस्तार, डिजिटलाईजेशन और शासकीय योजनाओं लाभ सीधे बैंक ट्रांसफर के माध्यम से पहुंचने से ग्रामीण भारत में जनजागरुकता बढ़ी है।
ग्रामीण भारत के नागरिक कृषि और गांव की ताकत का भरपूर इस्तेमाल नहीं कर पाएं हैं, लेकिन 21वीं सदी में इन समस्याओं के बीच गांव और कृषि अपनी ताक़त का अहसास करने में सफल रहे हैं। कोरोना काल में भारत को ग्रामीण अर्थव्यवस्था को टूटने नहीं दिया था। देश की मौजूदा सरकार का मत हैं कि देश की कृषि व गांवों में विकास की भरपूर संभावनाएं हैं, जो शहरों का आधार बन सकती हैं। माना जा रहा है कि मोदी सरकार 3.0 में भारतीय अर्थव्यवस्था अब ग्रामीण विकास की पटरी पर दौड़ेगी, जिसका आधार कृषि और उससे जुड़े ग्रामद्योग होंगे।

आगामी सालों में बदलेगी तस्वीर, घटेगी सामाजिक असमानता
हालाकिं हाल में नीति आयोग के नोट में हाल ही में बताया गया था कि भारत का बहुआयामी गरीबी अनुपात 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रह गया है, जो कि 2013-14 में 29.17 पर था। इसमें रिकॉर्ड 17.89 फीसदी की गिरावट देखने को मिली है। इन सबके बावजूद आज़ादी के 75 साल के बाद भी इंडिया और भारत में फर्क बरकरार है। ग्रामीण भारत की चुनौतियां अब भी कायम हैं। इन सबके बीच उम्मीद की किरण जगाये रखनी चाहिए।
देश में इस समय विपक्ष जातीय जनगणना की वकालत कर रहा है। तर्क यह है कि इससे सामाजिक असमानता को कम करने के लिए जरूर डेटा मिलेगा। हालाकिं बिना जातीय भेदभाव के कैसे संभव होगा? यह सवाल सत्ता पक्ष उठा रहा है। इन सबके इतर लोकसभा में 2024-25 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा था कि इस साल मैंने ग्रामीण बुनियादी ढांचे सहित ग्रामीण विकास के लिए 2.66 लाख करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसमें ग्रामीण क्षेत्रों में सुविधाओं के विस्तार, किसानों, मजदूरों और महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान हैं। इसके अलावा ग्रामोद्योग आवास निर्माण पर भी एक बड़ा हिस्सा खर्च किया जायेगा। लिहाजा उम्मीद की जानी चाहिए कि ग्रामीण भारत खुशहाली के रास्ते अपने कदम बढ़ाएं।
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