महाराष्ट्र की जंग में अब ऐसे है शरद पवार के दोनों हाथों लड्डू
बहुत तेजी से बदले इन घटनाक्रमों के 12 घंटों के अंदर ही यह साफ हो गया कि शरद पवार ही अब भी एनसीपी के बॉस हैं और वह चूके नहीं हैं। उनके मास्टरस्ट्रोक से उलटे अजित पवार बुरे फंसते दिख रहे हैं और शरद पवार के दोनों हाथों में लड्डू दिख रहे हैं।

नई दिल्ली। महाराष्ट्र में शुक्रवार की रात अचानक ऐसा राजनीतिक उलटफेर हुआ जिसकी भनक तक किसी को नहीं थी। राजनीतिक पार्टियां तो दूर हर समय चौकस रहने वाला मीडिया भी गच्चा खा गया। सुबह नींद खुली और पता चला कि देवेंद्र फडणवीस ने एक बार फिर से महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले ली है और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी प्रमुख शरद पवार के भतीजे अजित पवार प्रदेश के उपमुख्यमंत्री बन गए हैं। किसी को कुछ समझ नहीं आया। इसके बाद मीडिया में ख़बरें फैली। फिर लोगों ने यह कहना शुरू कर दिया कि राजनीति के भीष्म माने जाने वाले शरद पवार को उनके भतीजे अजित पवार ने ही आखिर में पटखनी दे दी। लोग शरद पवार को चुका हुआ समझने लगे। उनकी समझ में यहां राजनीति के चाणक्य समझे जाने वाले पवार ने फैसले लेने में काफी देर करने की कीमत चुकाई है। लेकिन बदलते घटनाक्रम में बात केवल इतनी सी ही पर सिमट नहीं गई। बहुत तेजी से बदले इन घटनाक्रमों के 12 घंटों के अंदर ही यह साफ हो गया कि शरद पवार ही अब भी एनसीपी के बॉस हैं और वह चूके नहीं हैं। उनके मास्टरस्ट्रोक से उलटे अजित पवार बुरे फंसते दिख रहे हैं और शरद पवार के दोनों हाथों लड्डू लग रहा है।

ऐसा क्यों लग रहा है?
दरअसल, जब अजित पवार ने आनन-फानन में भाजपा का समर्थन करके महाराष्ट्र में देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में सरकार गठन किया तो उन्होंने आश्वस्त किया था कि उनकी पार्टी के कुल 54 विधायकों में से 35 उनके साथ हैं। टेक्निकली अगर दो-तिहाई या उससे ज्यादा विधायक या सांसद किसी दल से एक साथ अलग होते हैं तो उनपर दल-बदल कानून लागू नहीं होता है और सदन की उनकी सदस्यता बची रहती है। वैसे तो एनसीपी के विधायकों के सन्दर्भ में यह संख्या 36 होती है लेकिन अगर 35 विधायक अजित पवार के साथ होते तो एक और विधायक को आसानी से वे एनसीपी से तोड़ सकते थे। ऐसे में सरकार को कोई परेशानी ही नहीं होती। लेकिन शरद पवार अधिकांश विधायकों को अपने पाले में रोकने में कामयाब होते हुए दिखते हैं। उनका कहना है कि फिलहाल 51 विधायक उनके साथ हैं और बचे हुए भी वापस आ जायेंगें। ऐसे में फडणवीस सरकार संकट में नजर आने लगी है। लेकिन इस घटनाक्रम से जिस पर संकट सबसे ज्यादा आया जान पड़ता है वह हैं अजित पवार।

अजित पवार ही घाटे में क्यों दिख रहे हैं?
बात ऐसी है कि पवार परिवार में आंतरिक मतभेद की खबरें बहुत पहले से आती रही हैं। ऐसा माना जाता है कि शरद पवार की विरासत को लेकर उनकी बेटी सुप्रिया सुले और भतीजे अजित पवार के बीच एक तरह का कोल्ड वॉर लगातार चल रहा है। ये और बात है कि शरद पवार अक्सर कहते आए हैं कि सुप्रिया सुले की दिलचस्पी केंद्र की राजनीति में है और वह उसमे सक्रिय हैं। वहीं दूसरी तरफ अजित पवार शुरू से ही महाराष्ट्र की राजनीति में सक्रिय रहे हैं। फडणवीस सरकार गठन करवाने तक वे विधायक दल के नेता थे। बदलते घटनाक्रम में शरद पवार ने उन्हें अपदस्थ कर दिया है। पहले तो यह कयास लगये जा रहे थे की इस राजनीति के पीछे शरद पवार ही होंगें लेकिन अब पवार के विधायक दल के नेता के पद से अपदस्थ करने के बाद अब इसमें अच्छा खासा संदेह है। शरद पवार ने ऐसा करके अब अजित पवार को एनसीपी में नेतृत्व की दौड़ से लगभग बाहर ही कर दिया है। अगर उनकी वापसी भी होती है जैसा कि शरद पवार चाह रहे हैं तो भी यह समझने की बात है कि अब पार्टी में उनका कद पहले वाला नहीं ही रहा जायेगा। कुल मिलाकर कहें तो शरद पवार की राजनीतिक विरासत अब अजित पवार के हाथ से फिसल गई लगती है।

पवार की चाणक्य वाली छवि और मजबूत हुई
पिछले कुछ सालों में यह माना जाता रहा अमित शाह ही जोड़-तोड़ की राजनीति में माहिर हैं। शनिवार को जब फडणवीस ने बतौर मुख्यमंत्री दोबारा शपथ ली तो भी यही समझा गया। और ऐसा समझा जाना लाजिमी है भी। लेकिन अब जब ऐसा लग रहा है कि देवेंद्र फडणवीस के लिए बहुमत साबित करना मुश्किल होता जा रहा है, तो वहीं दूसरी तरफ शनिवार की सुबह तक महाराष्ट्र की राजनीति में हारे हुए खिलाड़ी माने जाने वाले शरद पवार अंत में सबसे मजबूत सियासी खिलाड़ी के तौर पर उभरते दिख रहे हैं। इससे अमित शाह की उस छवि को धक्का जरूर लगेगा और यह सन्देश जायेगा की महाराष्ट्र की राजनीतिक कूटनीति में शरद पवार का कोई तोड़ नहीं है। ऐसे में फायदे में सिर्फ शरद पवार ही दिख रहे हैं।












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