महाराष्ट्र में फिर हुए चुनाव और अकेले लड़ी भाजपा तो मिल सकती हैं इतनी सीटें?
नई दिल्ली- महाराष्ट्र में चुनाव नतीजों के बाद भाजपा और शिवसेना के बीच विवाद इतना गहरा चुका है कि अब बीजेपी की ओर से दोबारा चुनाव मैदान में उतरने की बात भी कही जाने लगी है। शिवसेना को सबक सिखाने के लिए इस तरह का बयान खुद देवेंद्र फडणवीस सरकार में मंत्री जय कुमार रावल की ओर से आया है। उनका कहना है कि शिवसेना के रवैये के चलते नेता और कार्यकर्ता इतने खफा हैं कि वह फिर से चुनाव लड़कर अकेले अपनी दम पर सरकार बनाने के लिए तैयार बैठे हैं। अब सवाल उठता है कि भारतीय जनता पार्टी की ओर से इतनी सख्त लाइन क्यों ली जा रही है? दरअसल, चुनाव नतीजों के आकलन के बाद बीजेपी के नेताओं को लगता है कि अगर वह शिवसेना को साथ लेने की बजाय अकेले चुनाव मैदान में जाती तो शायद वह अपने दम पर ही बहुमत जुटा सकती थी। आइए देखते हैं कि बीजेपी के इन दावों में कुछ तथ्यात्मक दम भी है, या सिर्फ सियासी हवाबाजी करने का प्रयास हो रहा है और अभी चुनाव होने पर बीजेपी राज्य में कहां खड़ी होगी?
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दो चुनावों का लेखा-जोखा
महाराष्ट्र में 2014 और 2019 के विधानसभा चुनावों और उसके नतीजों में एक बड़ा अंतर है। 2014 में वहां बीजेपी और शिवसेना अलग-अलग चुनाव लड़ी थी, लेकिन 2019 में दोनों पार्टियां एक गठबंधन के तहत चुनाव लड़ी हैं। 2014 के चुनाव में बीजेपी ने अकेले 260 उम्मीदवार उतारे थे और वह 122 सीटें जीतने में कामयाब रही थी। जबकि, इसबार गठबंधन के तहत वह कुल 164 सीटों (14 सीटें बीजेपी के निशान पर छोटी पार्टियां लड़ीं और भाजपा अकेले 150 सीटों पर मैदान में थी) पर चुनाव लड़ी और 105 सीटें ही जीत पाई। वहीं, शिवसेना ने 2014 में 288 में से 282 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और उसके कुल 63 उम्मीदवार जीतकर विधान भवन पहुंचने में कामयाब रहे थे। इसबार बीजेपी के साथ तालमेल के तहत शिवसेना को लड़ने के लिए सिर्फ 124 सीटें ही मिलीं और वह कुल 56 विधानसभा क्षेत्रों में चुनाव जीत पाई।

दो चुनावों में वोट शेयर का अंतर
अगर दोनों चुनावों में बीजेपी-शिवसेना के परफॉर्मेंस पर गौर करें तो 2014 में बीजेपी को महाराष्ट्र में कुल पड़े वैलिड वोट में से 27.81 फीसदी मत प्राप्त हुए थे। लेकिन, इसकी तुलना अगर सिर्फ उन 260 सीटों से करें जहां भाजपा ने अपने उम्मीदवार उतारे थे तो पार्टी को मिला वोट शेयर 31.15 फीसदी दर्ज हुआ था। मौजूदा चुनाव में पार्टी जिन कुल 164 सीटों (150 बीजेपी) पर लड़ी उसमें उसे 25.75 फीसदी वोट हासिल हुए हैं। वहीं शिवसेना की बात करें तो 2014 में उसे कुल पड़े वैलिड वोट में से 19.35 फीसदी वोट मिले थे, जबकि अगर सिर्फ उन 282 सीटों की बात की जाय जहां वह चुनाव लड़ी थी तो उसे 19.80 फीसदी वोट हासिल हुए थे। जबकि, 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में शिवसेना का वोट शेयर 16.41 फीसदी दर्ज किया गया है।

बीजेपी के साथ रहने पर शिवसेना को दोगुना से ज्यादा फायदा
अगर 2014 और 2019 के चुनाव परिणामों के आधार पर शिवसेना की स्ट्राइक रेट देखें तो पार्टी की सफलता का प्रतिशत दोगुना से ज्यादा हो गया है। मसलन, 2014 में वह जितनी सीटों पर चुनाव लड़ी थी, उसमें से उसे 22 फीसदी सीटों पर कामयाबी मिली थी। जबकि, इसबार बीजेपी के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ने पर उसकी कामयाबी का प्रतिशत 45 फीसदी तक पहुंच गया है, जो कि पिछली बार से दोगुने से भी ज्यादा है।

अकेली लड़ी बीजेपी तो जुटा सकती है भारी बहुमत
24 अक्टूबर को महाराष्ट्र के चुनाव नतीजे आने के बाद बीजेपी की सीटों में आई कमी पर पूछे गए सवालों के जवाब में मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने एक अहम तथ्य मीडिया के सामने रखे थे। तब उन्होंने मीडिया वालों के सामने दावा किया था कि उनकी पार्टी की सीटें इसलिए कम हुई हैं, क्योंकि वह 2014 के मुकाबले काफी कम सीटों पर चुनाव लड़े हैं, लेकिन उनकी पार्टी की स्ट्राइक रेट बहुत ही ज्यादा है। अगर इस दावे का आंकड़ों के आधार पर विश्लेषण करें तो हमें पता चलता है कि 2014 में 260 सीटें लड़ने पर बीजेपी को 122 सीटें मिली थीं। यानि तब उसकी स्ट्राइक रेट 46% रही थी। जबकि, इसबार 164 सीटों पर लड़कर वह 105 सीटें जीती है और इस हिसाब से मौजूदा चुनाव में उसकी स्ट्राइक रेट कहीं ज्यादा 64 फीसदी रही है। अब इस आधार पर यदि बीजेपी अगला चुनाव अकेले दम पर सभी 288 सीटों पर लड़ती है और वह 64 फीसदी की स्ट्राइक रेट बरकरार रखती है तो पार्टी को प्रदेश में 187 सीटें तक मिल सकती हैं, जो कि साधारण बहुमत के लिए जरूरी सीटों (145) से 42 सीटें ज्यादा हैं। वैसे यह आकलन सिर्फ मौजूदा परिस्थियों और वोटरों के मौजूदा रुझान के आधार पर है।
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