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क्या है हैदराबाद के भाग्यलक्ष्मी मंदिर का 'आधुनिक' इतिहास, जिसे भाजपा ने बनाया चुनावी मुद्दा

नई दिल्ली- हैदराबाद में आज ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम के लिए मतदान का दिन है। इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी ने प्रचार के दौरान अपनी अप्रत्याशित ताकत झोंकी है। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह तक यहां चुनाव प्रचार करने पहुंचे थे। प्रचार में बीजेपी ने यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी उतारा, जिन्होंने हैदराबाद का नाम भाग्यनगर किए जाने का मुद्दा छेड़कर पार्टी कार्यकर्ताओं में जान फूंकने की कोशिश की। अब सवाल है कि जिस 'भाग्यनगर' के भरोसे भाजपा तेलंगाना की राजनीति में अपना भविष्य चमकाना चाहती है, वह जिस श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर के वजूद पर टिका है उसका इतिहास क्या है? अमित शाह जब प्रचार के लिए हैदराबाद पहुंचे तो यहां पर पूजा करके पार्टी की ओर से जनता को संदेश देना नहीं भूले।

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    भाग्यलक्ष्मी मंदिर: आस्था और 'आधुनिक' इतिहास

    भाग्यलक्ष्मी मंदिर: आस्था और 'आधुनिक' इतिहास

    देश के अनेकों प्राचीन मंदिरों का कोई ठोस लिखित इतिहास नहीं मिलता है। लेकिन, फिर भी जब बात आस्था की आती है तो उपासकों और श्रद्धालुओं के लिए उसकी पवित्रता और उसके प्रति निष्ठा सबसे ऊपर होती है। हैदराबाद के विश्व प्रसिद्ध चारमीनार से सटे श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर भी उन्हीं आस्था के केंद्रों में से एक है। इसलिए, हम यहां भाग्यलक्ष्मी मंदिर के 'आधुनिक' इतिहास की चर्चा कर रहे हैं। मां लक्ष्मी का यह मंदिर चारमीनार के दक्षिण-पूर्वी मीनार से सटा है। मंदिर का अस्थाई ढांचा बांस-तिरपाल और टिन से निर्मित है, जिसकी पिछली दीवार चारमीनार की ही एक मीनार है। श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर का मौजूदा ढांचा भी वहां कब से है, इसके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है। लेकिन, कहते हैं कि यहां कम से कम 1960 की दशक से तो जरूर पूजा-अर्चना हो रही है। गौरतलब है कि चारमीनार को निर्माण 1591 में शुरू हुआ था। लेकिन, हिंदुओं का दावा है कि चारमीनार से पहले भी वहां भाग्यलक्ष्मी मंदिर मौजूद था। इस तरह का दावा करने वालों में सिकंदराबाद के बीजेपी सांसद और केंद्रीय गृहराज्य मंत्री जी किशन रेड्डी भी शामिल हैं।

    कैसे बना आस्था का केंद्र ?

    कैसे बना आस्था का केंद्र ?

    लेकिन, इंडियन एक्सप्रेस ने आर्कयोलॉजिक सर्वे ऑफ इंडिया के सूत्रों के हवाले से बताया है कि यह मंदिर चारमीनार की सुरक्षित परिधि का अतिक्रमण करता है। अधिकारियों का दावा है कि स्मारक को गाड़ियों से सुरक्षित रखने के लिए एक पिलर खड़ा किया गया था, जिसे 1960 की दशक में कभी भगवा रंग में रंगा हुआ पाया गया और लोगों ने वहां पर आरती करनी शुरू कर दी। इसी दावे के मुताबिक स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट की एक बस ने उस पिलर में टक्कर मार दी थी, जिससे वह क्षतिग्रस्त हो गया; और तभी रातों-रात वहां बांसों से बना एक छोटा सा ढांच तैयार कर दिया गया, जिसके अंदर देवी मां की प्रतिमा स्थापित कर दी गई। तेलंगाना विधान परिषद में विरोधी दल के नेता मोहम्मद शब्बीर अली का दावा है कि, '(उस) घटना के बाद हर त्योहार में मंदिर का एक या दो फीट विस्तार शुरू हो गया, जब तक कि 2013 में हाई कोर्ट ने पुलिस को विस्तार रोकने का निर्देश नहीं दिया।' तथ्य ये है कि चारमीनार इलाके में जिन हिंदुओं का कारोबार है या उनकी वहां दुकानें हैं, वह रोजाना इस मंदिर में आते हैं। दिवाली जैसे त्योहारों के मौके पर तो यहां श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लग जाती हैं।

    मंदिर का नाम भाग्यलक्ष्मी क्यों पड़ा?

    मंदिर का नाम भाग्यलक्ष्मी क्यों पड़ा?

    श्रद्धालुओं का ऐसा विश्वास है कि श्री भाग्यलक्ष्मी मंदिर में पूजा करने से उनके जीवन में खुशहाली आती है और उनका भाग्य संवरता है। हिंदुओं का एक ऐसा वर्ग भी है, जो मानता है कि यह नाम हैदराबाद के असल नाम 'भाग्यनगर' से जुड़ा है। मसलन, भाजपा नेताओं का कहना है कि मोहम्मद कुली कुतुब शाह ने भाग्यनगर का नाम बदलकर हैदराबाद कर दिया था। यही वजह है कि जब यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ चुनाव प्रचार के लिए हैदराबाद आए तो एक रैली में उन्होंने फैजाबाद और इलाहाबाद का नाम बदले जाने का जिक्र करते हुए कहा कि, 'कुछ लोग मुझसे पूछ रहे हैं कि क्या हैदराबाद का नाम फिर से भाग्यनगर किया जा सकता है। मैनें कहा है कि क्यों नहीं?'

    भाग्यलक्ष्मी मंदिर को लेकर कब-कब हुआ विवाद ?

    भाग्यलक्ष्मी मंदिर को लेकर कब-कब हुआ विवाद ?

    हैदराबाद के पवित्र भाग्यलक्ष्मी मंदिर का जो 'आधुनिक' इतिहास रहा है, उसके चलते वहां कई बार हिंसक विवाद भी हो चुके हैं। 1979 में दिवाली के समय में एमआईएम की ओर से पुराने हैदराबाद में बंद के आह्वान को लेकर हिंसा भड़क उठी थी, जिसमें मंदिर पर हमला किया गया था और उसे अपवित्र किया गया। सितंबर 1983 में गणेश उत्सव के दौरान मंदिर पर एक बैनर लगाने को लेकर तनाव भड़क गया था, जिसको लेकर मंदिर और मस्जिद दोनों को निशाना बनाया गया था। सबसे ताजा विवाद 2012 के नवंबर में हुआ था, जब आरोप लगे थे कि मंदिर प्रबंधन ढांचे का विस्तार कर रहा है। इसके बाद आंध्र प्रदेश हाई कोर्ट ने मंदिर में किसी तरह के निर्माण की गतिविधि पर रोक लगा दी।

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