'राम भक्त' संन्यासी की प्रार्थना- बस 16 दिन की जिंदगी और मिल जाए...
हिंदी भाषा फादर कामिल बुल्के के जीवन में कुछ वैसी ही थी, जैसे किसी जिंदा व्यक्ति के लिए सांस। राष्ट्रीय हिंदी दिवस के मौके पर जानिए हिंदी के सपूत बाबा बुल्के की प्रेरक कहानी। Hindi Diwas Father Camille Bulcke Hindi Schol
नई दिल्ली, 13 सितंबर : भारत की धरती कुछ मायनों में सचमुच विलक्षण है। यहां देश को माता का दर्जा तो मिलता ही है, भाषाओं को भी मां का दर्जा दिया जाता है। संस्कृत को अधिकांश भाषाओं की जननी कहा जाता है, तो हिंदी को मातृभाषा और मां का दर्जा दिया जाता है। बात हिंदी की करें तो फादर कामिल बुल्के के बिना ये विमर्श अधूरा ही रहेगा। हिंदी भाषा और भारत के प्रति बुल्के का प्रेम कुछ ऐसा था कि उन्होंने अपने अंतिम दिनों में कहा था कि अगर दूसरे जन्म जैसी कोई चीज है तो वे भारत में ही जन्म लेना चाहेंगे। भाषाओं के प्रति फादर कामिल बुल्के का सबसे चर्चित कथन है, संस्कृत राजरानी है, हिंदी महारानी है और अंग्रेजी नौकरानी है।

26 साल की आयु में भारत पहुंचे
दरअसल, बेल्जियम से भारत आकर 'राम कथा' पर शोध करने वाले फादर कामिल बुल्के के हिंदी प्रेम से भाषा प्रेमी भलिभांति वाकिफ हैं, लेकिन इसके बावजूद कुछ व्यक्तित्व ऐसे होते हैं जिनका कद जीवन से भी बड़ा लगने लगता है। ऐसे ही किसी मौजूं पर आशुतोष राणा ने कहा,
ये पता न चला कि कब ये कद हो गया
मैं तो एक पौधा था, आज बरगद हो गया
दरअसल, कामिल बुल्के नवंबर, 1935 में मात्र 26 साल की आयु में भारत पहुंचे। इससे पहले की उनकी यात्रा भी काफी दिलचस्प रही।

113 साल पहले राम के मंदिर में जन्म
बुल्के एक सितंबर 1909 को बेल्जियम के रम्सकपैले गांव में जन्मे। स्थानीय भाषा में रम्सकपैले का मतलब है राम का मंदिर। 20 अक्टूबर 1935 को फादर बुल्के जब भारत रवाना हो रहे थे तो पूरा गांव उन्हें विदा करने आया था। उससे पहले यूरोपीय देशों में पढ़ाई के बाद 1934 में कामिल बुल्के को बेल्जियम के ईसाई धर्मगुरुओं ने ब्रदर की उपाधि दी और धर्मप्रचार का काम मिलने पर उन्होंने भारत आने का फैसला लिया।

तुलसीदास और बुल्के का रिश्ता
भारत आने के फैसले के पीछे तुलसीदास की रामचरितमानस की बड़ी भूमिका रही। बेल्जियम से भारत आने वाले फादर बुल्के पहले जेसुइट संन्यासी नहीं लेकिन वे सबसे अनोखे जरूर थे। जेसुइट का मतलब ईसाई समाज। क्लास में बच्चों के साथ बैठकर गुमला (उस समय बिहार राज्य की एक जगह) के स्कूल में हिंदी सीखी। हिंदी के साथ भोजपुरी, अवधि और ब्रज भाषाएं भी सीखी।

सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली हिंदी
बाद में उन्होंने गुमला के दिनों को याद कर लिखा, देख रहा हूं किस देश में लॉर्ड मैकाले द्वारा अंग्रेजी राज को चलाने के लिए शुरू की गई शिक्षा प्रणाली अपनी मंजिल पा चुकी है। भारत की सभी भाषाएं उपेक्षित हैं। शिक्षित और धनी लोगों में अंग्रेज बनने की होड़ लगी है। यहां सर्वाधिक प्रयोग में आने वाली हिंदी की भी दुर्दशा है, लेकिन लोगों तक मैं किसी भाषा को सीखकर ही पहुंच सकूंगा। हिंदी प्रेम और विद्वत्ता के कारण एकीकृत बिहार में बुल्के बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् के आजीवन सदस्य भी रहे।

बुल्के हिंदी-संस्कृत किस कॉलेज में पढ़ें
हिंदी और संस्कृत पढ़ने के लिए सेंट कोलंबस कॉलेज (अब झारखंड में) पहुंचे कामिल बुल्के ने एडमिशन लिया। कुछ ही दिनों में कामिल बुल्के तुलसीदास के कई ग्रंथों का अध्य्यन कर लिया। इसके अलावा, श्रीमद्भगवद्गीता, वाल्मीकि रामायण, महाभारत और वैदिक साहित्यों का अध्य्यन किया। बेल्जियम में उन्होंने तुलसीदास की एक चौपाई जर्मन भाषा में पढ़ी, इसके बाद वे तुलसीदास के मुरीद हो गए।
धन्य जनमि जगतीतल तासु
पितहि प्रमोद चरित सुनि जासू

भारत आने में तुलसीदास की भूमिका
इसके बारे में फादर कामिल बुल्के नया आने वाले दिनों में लिखा कि अनेक भाषाओं का साहित्य पढ़ने के बावजूद पिता-पुत्र के रिश्ते का ऐसा उच्च आदर्श किसी दूसरी भाषा में नहीं मिला इसने मेरे जीवन की दिशा मोड़ दी और मेरी कर्म भूमि का भी चुनाव कर दिया विश्व साहित्य में माता पुत्र के संबंधों की बहुत चर्चा हुई है लेकिन पिता पुत्र संबंधों की व्याख्या भारत के भक्तिकालीन कवि तुलसीदास ही कर सकते थे शायद यही चौपाई मुझे भारत लेकर आई।

कलकत्ता में BA की पढ़ाई
1939 में दार्जिलिंग पहुंचे। धर्मशिक्षा शुरू हो गई। चार साल बाद फादर बन गए। धर्मसाधना तमिलनाडु में होनी थी। 1944 में तमिलनाडु पहुंचे। 1944 में ही उन्होंने इलाहाबाद विवि में हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ धीरेंद्र वर्मा को पत्र लिखा। उन्हें बताया का बेल्जियम से धर्म सेवा के लिए भारत आया हूं। हिंदी भाषा में रुचि है। इलाहाबाद से एमए करना चाहता हूं, मार्गदर्शन करें। महीनों तक कोई जवाब नहीं आया तो बनारस में आचार्य रामचंद्र शुक्ल से मिले। ज्ञान से प्रभावित आचार्य ने धर्मसाधना पूरी करने का सुझाव दिया। साधना पूरी कर कलकत्ता से संस्कृत और हिंदी में स्नातक की उपाधि ली। इसके बाद इलाहाबाद पहुंचे।

साहित्य के दिग्गजों से मिले
हिंदी विभाग के अध्यक्ष ने बुल्के से पूछा, आप विदेशी हैं, कैसे करेंगे। एमए करना आसान नहीं है। कामिल बुल्के ने परीक्षा लेने को कहा। विनय पत्रिका का अनुवाद करने को कहा। प्रोफेसर धीरेंद्र चकरा गए। ऐसा अद्भुत अनुवाद उन्होंने नहीं देखा था। इसके बाद उन्हें एमए में एडमिशन मिला। इलाहाबाद बड़ा साहित्यिक केंद्र था, ऐसे में उनकी इच्छा थी, इलाहाबाद से ही शोध करें। इलाहाबाद में उनका हिंदी साहित्य के दिग्गजों से मिलना हुआ।

इलाहाबाद में बना इतिहास, डी. फिल की उपाधि
फादर कामिल बुल्के की प्रतिभा के मुरीद प्रोफेसर वर्मा ने उन्हें शोध के लिए प्रेरित किया। दोनों के बीच संवाद हुआ। शोध का विषय 'राम कथा' तय हुआ। रामकथा में करुणा का पक्ष है वह इसाइत में भी है, राम के चरित्र की भव्यता और इसके साथ सहजता उन्हें अपील करती है। वेद, पुराण, उपनिषद्, बौद्धिक धर्मग्रंथ, कश्मीर के शैव परंपरा से जुड़े ग्रंथों का भी अध्ययन किया। 1949 में डी. फिल की उपाधि मिली।

फादर बुल्के अपने संकल्प से डिगे नहीं
हालांकि, शुरुआत में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में शोध करने पहुंचे फादर कामिल बुल्के ने जब हिंदी भाषा में शोध करने का फैसला लिया तो सहजता से अनुमति नहीं मिली। दरअसल, उस दौर के भारत में शोध कार्य अंग्रेजी में करना अनिवार्य था। हालांकि, फादर बुल्के अपने संकल्प से डिगे नहीं। एकेडमिक काउंसिल में हुई लंबी बहस के बाद आजाद भारत का हिंदी भाषा में पहला शोध प्रबंध फादर कामिल बुल्के ने जमा किया।

1974 में पद्मभूषण सम्मान
इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सहायक प्राध्यापक डॉ सूर्यनारायण के अनुसार, बुल्के ने ही हिंदी में शोध की परंपरा शुरू की, यहां तक कि तत्कालीन विभागाध्यक्ष प्रोफेसर वर्मा को भी अंग्रेजी में ही शोध पत्र जमा करना पड़ा था। 'राम कथा उत्पत्ति और विकास' शीर्षक से प्रकाशित शोध प्रबंध बाद में किताब की शक्ल में प्रकाशित हुई। 1962 में बुल्के की रामकथा का दूसरा संस्करण और बाद में कई और संस्करण भी प्रकाशित हुए। 1951 में भारत सरकार ने उन्हें भारत की नागरिकता दी। साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में अतुल्य योगदान के लिए उन्हें 1974 में पद्मभूषण सम्मान मिला।

आजादी के बाद हिंदी राजनीति का शिकार
हिंदी के बारे में फादर बुल्के ने कहा, मुझे अपनी मातृभाषा फ्लैमिश की तरह हिंदी से बहुत प्रेम है। मैं सविधान से मान्यता प्राप्त राजभाषा को उसके सिंहासन पर देखना चाहता हूं। जब तक हिंदी को उसके घर में सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक बाहर भी कोई नहीं पूछेगा। आजादी के बाद हिंदी राजनीति का शिकार हो गई। प्रजातंत्र में सबको अपने वोटों की चिंता है। देश का गौरव हाशिए पर है। अंग्रेजी न केवल हिंदी बल्कि हिंदुस्तान की सारी भाषाओं के अस्तित्व का संकट बन गई है।

बिहार में बाबा बुल्के की मुंहबोली बेटी
साल 1982 में 73 साल की आयु में फादर बुल्के को गैगरीन हो गया। दिल्ली के AIIMS में भर्ती कराया गया। उनकी मुंहबोली बेटी भूपेंद्र कलसी बताती हैं कि बुल्के अपने अंतिम दिनों में कहते थे, "इसी देश में मरना चाहता हूं। भारतीय संस्कृति के अनुसार अगर पुनर्जन्म हो तो इसी देश में जन्म लेना चाहूंगा। स्वर्ग में जाकर पहले तुलसीदास से मिलूंगा, फिर अपने माता-पिता से मिलूंगा।"

400 घंटे चाहिए, पैर कट जाएं तो भी गम नहीं
गैगरीन जैसी जानलेवा बीमारी से संघर्ष कर रहे बुल्के के हिंदी के प्रति समर्पण का आलम ये था कि उन्होंने अस्पताल के बिस्तर पर तकिया के नीचे बाइबल और तुलसीदास की विनय पत्रिका का गुटका संस्करण मिला। बुल्के ने बाइबल में कई जगहों पर मार्किंग कर रखी थी। वे अनुवाद पूरा करना चाहते थे। कहते थे 400 घंटे और चाहिए। पैर कट जाएं तो भी कोई गम नहीं। आंखें और हाथ ठीक रहें तो बचा हुआ काम पूरा कर लूंगा। 400 घंटों का मतलब लगभग 16.66 दिन।

रांची में जीवन का अधिकांश वक्त गुजरा
बेल्जियम में जन्मे जेसुइट और प्रतिष्ठित हिंदी विद्वान बुल्के युवा संन्यासी के रूप में भारत आए। फादर बुल्के ने अपना अधिकांश जीवन सेंट जेवियर्स कॉलेज, रांची में बिताया। AIIMS में 1982 में अंतिम सांस लेने वाले बुल्के को संस्कृतियों से परे आधुनिक हिंदी साहित्य का वास्तुकार माना गया। उनके प्रमुख योगदान भगवान राम के महाकाव्यों पर आधारित साहित्य की रचना, अंग्रेजी हिंदी शब्दकोष और गोस्वामी तुलसीदास की अद्वितीयता पर साहित्यिक काम शामिल हैं।

40 साल पहले चिर निद्रा में सो गए बुल्के
17 अगस्त 1982 के दिन सुबह आठ बजे बाबा बुल्के चल बसे। हिंदी से लगाव का आलम ये कि उनकी कब्र पर तुलसीदास की पंक्ति 'अग्या सम न सुसाहिब सेवा' लिखा गया। आज के झारखंड की राजधानी रांची में स्थित फादर कामिल बुल्के की कब्र रांची जेसुइट सोसाइटी ने बनवाई। मनरेसा हाउस में उनकी स्मृतियां सहेजी गई हैं। कहना गलत नहीं होगा कि बेल्जियम के 'राम मंदिर' से भारत आया 'हिंदी का सपूत' करोड़ों भारतवासियों को वर्षों तक प्रेरित करते रहेंगे।
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