‘जज साहब कुछ कीजिए’,BJP के इस मुख्यमंत्री के क्यों खिलाफ हैं 40 Ex IAS अफसर? अब चीफ जस्टिस से लगाई गुहार
असम की सियासत एक बार फिर गरमा गई है। इस बार निशाने पर हैं मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा। उनके खिलाफ 40 से ज्यादा रिटायर्ड नौकरशाहों, पूर्व IAS अफसरों, शिक्षाविदों, डॉक्टरों, लेखकों, पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने एकजुट होकर मोर्चा खोल दिया है।
इन सभी ने गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को चिट्ठी लिखकर अपील की है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कथित नफरती बयानों और एक खास समुदाय को लेकर की गई टिप्पणियों पर अदालत खुद संज्ञान ले।

Himanta Biswa Sarma Controversy: क्या है पूरा मामला?
यह पत्र 6 फरवरी को गुवाहाटी हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस आशुतोष कुमार को भेजा गया। चिट्ठी में कहा गया है कि मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के कुछ सार्वजनिक बयान पहली नजर में नफरती भाषण की श्रेणी में आते हैं। आरोप है कि इन बयानों में सरकारी ताकत का डर दिखाने और एक विशेष समुदाय को खुले तौर पर बदनाम करने की कोशिश नजर आती है।
इन प्रबुद्ध नागरिकों का कहना है कि अगर संवैधानिक संस्थाएं ऐसे मामलों में चुप रहती हैं या निष्क्रिय रहती हैं, तो इससे संविधान की नैतिक ताकत कमजोर होती है।
'मियां' बयान पर क्यों मचा बवाल? (Miya Community Assam)
हिन्दुस्तान की रिपोर्ट के मुताबिक पत्र में खास तौर पर मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की उन टिप्पणियों का जिक्र किया गया है, जो उन्होंने 'मियां' समुदाय को लेकर की हैं। 'मियां' शब्द असम में बांग्ला भाषी मुसलमानों के लिए इस्तेमाल किया जाता है और इसे अपमानजनक माना जाता है। गैर-बांग्ला भाषी आबादी का एक वर्ग इन्हें अक्सर बांग्लादेशी प्रवासी बताकर निशाना बनाता रहा है।
चिट्ठी में लिखा गया है कि बांग्ला भाषी मुसलमान पिछले सौ साल से भी ज्यादा समय से असमिया समाज का अभिन्न हिस्सा हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के बयान अमानवीय, सामूहिक बदनामी करने वाले और राज्य प्रायोजित उत्पीड़न की धमकी जैसे लगते हैं, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ हैं।
संविधान और धर्मनिरपेक्षता का सवाल (Constitutional Values India)
पत्र लिखने वालों ने कहा है कि सीएम हिमंत बिस्वा सरमा जैसे संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति से यह उम्मीद की जाती है कि वह सभी नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा। लेकिन जब सत्ता में बैठे लोग ही एक समुदाय के खिलाफ भाषा का इस्तेमाल करते हैं, तो इससे समाज में डर और विभाजन पैदा होता है।
उन्होंने हाई कोर्ट से आग्रह किया है कि वह धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांत को बनाए रखने के लिए सख्त निर्देश दे। सुप्रीम कोर्ट पहले ही कई फैसलों में साफ कर चुका है कि धर्मनिरपेक्षता संविधान की मूल संरचना का हिस्सा है।
चिट्ठी पर किन-किन के हैं दस्तखत?
इस पत्र पर असम के कई जाने-माने नामों के हस्ताक्षर हैं। इनमें प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हिरेन गोहेन, असम के पूर्व DGP हरेकृष्ण डेका, गुवाहाटी के पूर्व आर्कबिशप थॉमस मेनमपारामपिल, राज्यसभा सांसद अजीत कुमार भुइयां, कई रिटायर्ड IAS अधिकारी, वरिष्ठ पत्रकार, शिक्षाविद, कलाकार और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल हैं।
हस्ताक्षर करने वालों ने एक विस्तृत ज्ञापन में कहा है कि वे गुवाहाटी हाई कोर्ट की संवैधानिक भूमिका में गहरा भरोसा रखते हैं और अदालत से उम्मीद करते हैं कि वह मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आएगी।
हाई कोर्ट से क्या मांग की गई?
पत्र में हाई कोर्ट से कई अहम मांगें की गई हैं। इनमें मुख्यमंत्री के बयानों से जुड़े मामलों में उचित कानूनी कार्रवाई, प्रभावित समुदाय की गरिमा और सुरक्षा सुनिश्चित करना, सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों के लिए संवैधानिक अनुशासन तय करना और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की रक्षा शामिल है।
अब आगे क्या? (Political Impact Assam)
इस पत्र के सामने आने के बाद असम की राजनीति में हलचल तेज हो गई है। सवाल यह है कि क्या गुवाहाटी हाई कोर्ट इस मामले में स्वतः संज्ञान लेगा या नहीं। वहीं, यह विवाद केवल एक मुख्यमंत्री के बयान तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह अभिव्यक्ति की जिम्मेदारी, सत्ता की भाषा और संविधान की मर्यादा से जुड़ी बड़ी बहस बन चुका है। अब निगाहें अदालत पर टिकी हैं, जहां से तय होगा कि 'जज साहब कुछ कीजिए' की यह गुहार किस दिशा में जाती है।












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