KHAM के पुराने खेल के दम पर फिर गुजरात की सत्ता में वापसी की जुगत में कांग्रेस
नई दिल्ली। KHAM यानि खाम। गुजरात में इसे जिसने समझ लिया, उसने गुजरात की वैतरणी पार कर ली। इसका लंबा इतिहास है। इसी के सहारे कांग्रेस का खंभा गुजरात में खड़ा था और बीजेपी का भी । इस बार भी KHAM ही तय करेगा कि गुजरात की गद्दी पर कौन बैठेगा। गुजरात के बाहर के लोग भले ही इसे न समझते हों पर गुजरात के लोग जानते हैं कि KHAM की ताकत क्या है। इसमें कोई शक नहीं कि किसी भी चुनाव में भारी उलटफेर जातियां करती हैं और जातियों में भी यूथ तय करते हैं कि भविष्य किसका होगा। तो इस बार भी सारा दारोमदार खाम पर ही है। ये खाम गुजरात के लिए क्यों इतना अहम है और इसकी शुरूआत कब और कैसे हुई। इसे जानना जरूरी है जिससे गुजरात की राजनीति बिलकुल साफ हो जाएगी। तमाम लोग भले ही इससे वाकिफ न हों लेकिन बीजेपी और कांग्रेस को गहराई से मालूम है कि KHAM (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुस्लिम) ही चुनाव का रुख तय करने वाला है । दोनों ही दल इसी खाम की वजह से चिंतिंत हैं और इसे साधने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

आखिर क्या है KHAM
आपको ये जानकर हैरानी होगी कि गुजरात में KHAM की शुरूआत कांग्रेस ने ही की थी। इसको अस्तित्व में लाने वाले थे गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री स्व.माधव सिंह सोलंकी । ये बात है 1985 की, जब सोलंकी के दिमाग की उपज ने कांग्रेस को गुजरात में वो जीत दिलाई जिसका रिकॉर्ड आज तक नहीं टूट पाया। उस वक्त KHAM की बदौलत कांग्रेस को 182 सीटों में 149 पर जीत मिली और अब उनके बेटे गुजरात कांग्रेस के अध्यक्ष भरत सिंह सोलंकी इसी खाम को फिर से जीवित करने के प्रयास में जुटे हैं जिसे बीजेपी बहुत ही गंभीरता से भांप रही है। खाम का इतना महत्व इसलिए भी है क्योंकि गुजरात की 70 फीसदी जनता इससे जुड़ी है जिसमें क्षत्रिय, ओबीसी, दलित और मुस्लिम आते हैं।

कांग्रेस ने ही की थी गुजरात में KHAM की शुरूआत
राजनीति की ये सोशल इंजीनियरिंग नई नहीं है। इसका उपयोग सबसे ज्यादा यूपी और बिहार के चुनावों में हर बार होता आया है। आपको यदि याद हो तो कु.मायावती ब्राह्मण को लगातार गरियाने के बावजूद एक चुनाव उनके बलवूते पर जीत चुकी हैं। ये लोकतंत्र की छटा है कि कोई दल मुसलमानों का वोट लेने के साथ ही ब्राह्मणों का वोट भी हथिया ले। ये सोशल इंजीनियरिंग वाकई चौंकाने वाली थी। बिहार के चुनाव में भी मुस्लिम, हिंदू, दलित, ओबीसी की राजनीति की दम पर चुनाव जीते गए हैं। गुजरात का नजारा भी इस बार ऐसा ही है। खाम का खूंटा जहां गढ़ गया, सरकार उसी की बननी है । ये खेल स्व.माधव सिंह सोलंकी ने खेला था और ऐसी जीत फिर कभी कांग्रेस तो बहुत दूर, बीजेपी को भी नहीं मिली।

खाम ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ा
ये जानकर और भी हैरानी होगी कि इसी खाम ने कांग्रेस का खेल बिगाड़ा भी । आरक्षण के कारण पाटीदार इस खाम के खिलाफ हो गए। आंदोलन छेड़ दिया गया और माधव सिंह सोलंकी की विदाई हो गई। इस चुनाव में थोड़ा अंतर है, खाम को तो कांग्रेस साध ही रहा है, आरक्षण के लिए बीजेपी से लड़ाई लेने वाला पाटीदार समाज भी कांग्रेस का होता नजर आ रहा है। ये फिर वही स्थिति है जो स्व. माधव सिंह सोलंकी ने बनाई थी और ये संयोग ही है कि उनके बेटे भरत सिंह सोलंकी इस वक्त प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष हैं। अब कांग्रेस इसी KHAM को दोहराने की कोशिश में जुटी है और बीजेपी पाटीदार समाज को याद दिला रही है कि कांग्रेस के KHAM से बचना है। कुल मिलाकर वही हालात हैं जो उस वक्त थे यानि KHAM एकजुट हो गया और पाटीदार भी कांग्रेस के साथ रहा तो बीजेपी की मुश्किल बढ़नी ही है।












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