अकबर के चीते से लेकर पीएम मोदी के चीते मंगवाने तक
भारत में अफ्ऱीकी नस्ल के चीतों को जिस मध्य प्रदेश में बसाने की कोशिश हो रही है, उसी मध्य प्रदेश के कोरिया में अंतिम एशियाई चीते मारे गए थे. अब कोरिया, छत्तीसगढ़ का हिस्सा है.
इसी कोरिया रियासत के राजमहल के एक कमरे में, मारे गए इन अंतिम चीतों के सिर टंगे हुए हैं.

पुराने दस्तावेज़ बताते हैं कि दिसंबर 1947 में कोरिया के महाराज रामानुज प्रताप सिंहदेव ने अपनी रियासत के रामगढ़ इलाक़े में तीन चीतों का शिकार किया था.
उसके बाद भारत में एशियाई चीतों के कोई प्रमाण नहीं मिले और भारत सरकार ने 1952 में चीता को भारत में विलुप्त प्राणी घोषित कर दिया.
रामानुज प्रताप सिंहदेव के बेटे और मप्र, छत्तीसगढ़ में मंत्री रहे रामचंद्र सिंहदेव ने 2016 में बीबीसी से बातचीत में दावा किया था कि उन्होंने ख़ुद इस शिकार के दो साल बाद वहां चीता देखा था. उसी दौर में झारखंड और ओडिशा में भी चीतों के देखे जाने की बात सामने आई.
लेकिन इन सभी दावों की प्रामाणिकता संदिग्ध रही है.
मध्य भारत में पिछले 35 सालों से भी अधिक समय से वन्यजीवों पर शोध करने वाले डॉक्टर राकेश शुक्ला कहते हैं, "वन्यजीवों के अंग्रेज़ी नामों को लेकर तो कोई भ्रांति नहीं है लेकिन हिंदी और दूसरी भाषाओं-बोलियों में एक ही वन्यजीव को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है. यही कारण है कि आज भी लिखने-बोलने में तेंदुआ, चीता, बाघ और शेर को लेकर भ्रम की स्थिति बनती रही है. ऐसे में 50 या 60 के दशक में अगर चीता देखे जाने के दावे होते रहे हैं तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए."
डॉक्टर राकेश शुक्ला का कहना है कि कोरिया में मारे गये तीन चीतों के बाद भारत में चीतों की उपस्थिति के कोई प्रमाण फिर कभी नहीं मिले.
पहले भी लाए गए थे अफ्ऱीकी चीते
भारत में गुफा चित्रों से लेकर राजा-महाराजाओं तक भारत में चीता का लंबा इतिहास रहा है.
नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के पूर्व उपाध्यक्ष दिव्य भानु सिंह द्वारा लिखी गई किताब 'द एंड ऑफ ए ट्रेल-द चीता इन इंडिया' के अनुसार, "मुगल बादशाह अकबर के पास एक हजार चीते थे. इनका इस्तेमाल हिरण और चिंकारा का शिकार करने के लिए किया जाता था."
अलेक्ज़ेंडर रोगर्स की अनुदित और हेनरी बेवेरिज के संपादन में 1909 में प्रकाशित, लगभग पांच सौ पन्नों की 'द तुज़ूक-ए-जहांगीरी ऑर मेमरी ऑफ जहांगीर' की मानें तो मुग़ल बादशाह अकबर के पास कम से कम एक हज़ार पालतू चीते हुआ करते थे.
जहांगीर ने लिखा है कि उनके पिता ने अपने जीवनकाल में नौ हज़ार चीतों को पाला था. पंद्रहवीं-सोलहवीं शताब्दी में भारत में चीतों का यह सुनहरा दौर माना जाता है.
भारत की छोटी-छोटी रियासतों में भी शिकार के लिये चीतों को पाला जाता था और बजाप्ता बैलगाड़ी में बैठा कर उन्हें शिकार के लिये जंगल ले जाया जाता था.
ऐसे पालतू चीते, जंगल में हिरण समेत दूसरे जानवरों पर हमला कर उन्हें मार डालते थे.
पालतू चीते के प्रसव की पहली घटना जहांगीर के शासन काल में ही दर्ज की गई, जहां पहली बार एक पालतू नर और मादा चीता के संपर्क में आने और तीन शावकों के जन्म के दस्तावेज़ उपलब्ध हैं.
पालतू चीता के प्रसव का दूसरा मामला 1956 में अमरीका के फिलाडेल्फिया चिड़ियाघर में दर्ज़ किया गया.
लेकिन ऐसी घटनाएं अपवाद थीं. पालतू नर और मादा चीतों के संपर्क में नहीं आने के कारण इनकी जनसंख्या घटती चली गई.
हालत ये हो गई कि 1918 से 1945 तक अलग-अलग अवसरों पर कम से कम 200 अफ्रीकी चीतों को भारतीय राजा-महाराजाओं ने शिकार के लिये भारत आयात किया.
लेकिन समय के साथ ये चीते भी ख़त्म हो गये और आज़ादी के बाद भारत में चीता, इतिहास के पन्नों में दर्ज हो कर रह गया. इस इतिहास का अंतिम पन्ना, अविभाजित मध्य प्रदेश के कोरिया के अध्याय के साथ ख़त्म हुआ.
दीवार पर टंगे चीते
कोरिया के राजमहल के मुख्य हॉल में प्रवेश करते ही दीवारों पर तरह-तरह के जानवरों की 'ट्रॉफी' नज़र आती है. ये वो जानवर हैं, जिनका शिकार कोरिया रियासत के राजाओं ने समय-समय पर किया था.
जानवरों की इन्हीं ट्राफी के बीच दो चीतों के सिर भी टंगे हुए हैं.
इस रियासत के वारिस रामचंद्र सिंह देव के अनुसार, जिन चीतों का शिकार उनके पिता ने दिसंबर 1947 में किया था, उसी समय दक्षिण भारत में उनकी ट्रॉफी बनवाई गई थी. रामचंद्र सिंहदेव ने बीबीसी से एक बातचीत में कहा था कि उनके पिता ने मारे गए चीतों में से एक की ट्राफी, बस्तर के राजा को भेंट की थी, जो अब बस्तर के राजमहल में रखी हुई है.
2018 में रामचंद्र सिंहदेव के निधन के बाद अब उनके परिजन राजमहल की देखरेख करते हैं.
कोरिया में जिन तीन चीतों को मारा गया, उसकी तारीख़ का ठीक-ठीक पता नहीं है. लेकिन माना जाता है कि इन चीतों का शिकार दिसंबर 1947 की किसी तारीख़ को किया गया था.
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के दस्तावेज़ में इस बात का उल्लेख है कि रामानुज प्रताप सिंहदेव के इस शिकार गाथा को प्रकाशित करने के अनुरोध के साथ, रामानुज प्रताप सिंहदेव के निजी सचिव ने 9 जनवरी 1948 को एक चिट्ठी सोसायटी को भेजी थी.
बाद में उसकी तस्वीर भी सोसायटी को भेजी गई.
रामचंद्र सिंहदेव का दावा था कि आदमखोर जानवरों को लेकर ग्रामीणों की शिकायत के बाद उनके पिता रामानुज प्रताप सिंहदेव शिकार के लिए निकले थे. उसी दौरान कहीं से भटक कर आए ये तीनों चीते रात के अंधेरे में गलती से रामानुज प्रताप सिंहदेव के हाथों मारे गए.
भारत में चीता से संबंधित शोध और लेखन में अक्सर इस बात का उल्लेख होता है कि मारे गये इन तीनों चीतों में से एक मादा चीता थी और उसके दो बच्चे थे.
लेकिन पुराने दस्तावेज़ों के अनुसार, मारे गए तीनों चीते, नर थे और पूरी तरह से वयस्क थे. इनमें से हरेक की लंबाई 6 फीट 4 ईंच से अधिक थी.
बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के अनुसार रामानुज प्रताप सिंहदेव रात को शिकार के लिए निकले थे, उसी समय एक-दूसरे से सट कर बैठे तीनों चीते नज़र आए. सिंहदेव के हथियार से निकली पहली गोली ने एक चीते को मौत की नींद सुला दिया. वहीं दूसरी गोली, दूसरे चीते की देह को पार कर, तीसरे चीते के शरीर में समा गई.
इन दो गोलियों में ही तीनों चीते मारे गए.
भारत के जाने-माने पक्षी विशेषज्ञ सालिम अली अपनी आत्मकथा 'द फॉल ऑफ अ स्पैरो' में लिखते हैं- ''सरगुजा राज्य के एक पड़ोसी राज्य, कोरिया (पूर्वी मध्य प्रदेश) के महाराज ने शिकार में अपना नाम अमर कर लिया है. उन्होंने... भारत के अंतिम तीन चीतों का शिकार कर इस जाति का भारतीय जमीन पर से हमेशा के लिए सफाया कर दिया.'
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