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चार साल में डर, भय और आतंक का माहौल बढ़ा है: रोमिला थापर

By Bbc Hindi
रोमिला थापर
BBC
रोमिला थापर

पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की गिरफ़्तारी पर सवाल उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट में जिन पांच लोगों ने याचिका दाख़िल की थी, उनमें इतिहासकार रोमिला थापर भी शामिल हैं.

बीबीसी संवाददाता विनीत खरे से बातचीत में रोमिला थापर ने कहा कि देश में पिछले चार सालों में डर और भय का माहौल बढ़ा है और ये माहौल आपातकाल की तुलना में ज़्यादा डराने वाला है.

इतिहासकार रोमिला थापर ने पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं पर हो रही कार्रवाई पर क्या कुछ कहा, यहां पढ़िए.

महाराष्ट्र पुलिस ने इन पांच मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के घर पर पहुंच कर कहा कि आपको गिरफ़्तार किया जाता है. हमलोगों ने अपनी याचिका में ये कहा है कि ये लोग स्थापित और जानेमाने लोग हैं, कोई क्रिमिनल नहीं हैं कि आप इन लोगों को उठाकर जेल में डाल दें.

ऐसे में हमने यही जानना चाहा कि इन लोगों पर क्या आरोप है, आप क्या साबित करना चाहते हैं और इसकी प्रक्रिया क्या है.

इस पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई, कोर्ट ने इन लोगों को एक सप्ताह तक अपने-अपने घर पर नज़रबंद रखने का आदेश दिया है. उन्हें जेल नहीं भेजने का आदेश दिया गया. सुप्रीम कोर्ट में मामले की अगली सुनवाई होगी.

वरवर राव
AFP
वरवर राव

मैं इन लोगों को व्यक्तिगत तौर पर जानती हूं. अगर आप किसी को गिरफ़्तार करने पहुंचते हैं तो आपके पास पूरी जानकारी होनी चाहिए कि आप उन्हें क्यों गिरफ़्तार कर रहे हैं. गिरफ़्तारी की प्रक्रिया भी होती है कि आप वजह बताते हुए उन्हें अपनी बात रखने का मौका दें.

इन लोगों पर पुणे के भीमा कोरेगांव में हुई हिंसा में शामिल होने का आरोप लगाया गया है. इनमें से कुछ लोग तो वहां शारीरिक तौर पर उपस्थित भी नहीं थे. इन लोगों पर ऐसे आरोप लगाए गए हैं जैसे उन्होंने बंदूक या फिर लाठी उठाकर हिंसा की हो. लेकिन ये सारे लोग लिखने वाले और पढ़ने-पढ़ाने वाले लोग हैं. इस आरोप में हिंसा का मतलब क्या है?

रोमिला थापर
BBC
रोमिला थापर

सुधा भारद्वाज वकील हैं, आनंत तेलतुंबड़े आर्थिक और सामाजिक विश्लेषण करने वाली इकनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली में लगातार लिखने वाले हैं. इनमें एक कार्यकर्ता की एक्स्ट्रीम लेफ्ट सोच रही है, लेकिन क्या ये आधार हो सकता है कि आप किसी को जेल में डाल दें.

इनके बारे में माओवादी-नक्सल समर्थक होने की बात भी कही जा रही है, लेकिन पुलिस के पास इनके लिंक होने के सबूत होने चाहिए. कोर्ट में सबूत देना होगा.

चार साल में क्या बदला?

पांच साल पहले ऐसी स्थिति नहीं थी. बीते चार सालों में डर, भय और आतंक का माहौल बढ़ा है. सरकार का रवैया ज़्यादा अथॉरिटेरियन हो गया है. अल्पसंख्यक, दलित और मुसलमानों के प्रति जिस तरह का बर्ताव हो रहा है, वह चिंतित करने वाला है.

पहले क़ानून इस तरह से काम नहीं करता था. आधी रात को पुलिस किसी को उठाने के लिए इस तरह नहीं पहुंचती थी, अगर आप पर मुक़दमा चल रहा था, तो आपको उसकी जानकारी होती थी.

चार साल में यह बदलाव हुआ है और हालात और भी गंभीर हो सकते हैं क्योंकि सरकार अगर अपने उद्देश्य में एक बार कामयाब हो जाती है तो और ताक़त से लोगों की आवाज़ को दबाने में जुट जाती है.

मेरे ख़्याल से आपातकाल की स्थिति आज की तुलना में माइल्ड यानी 'कम ख़तरनाक' स्थिति थी, क्योंकि आज जो लोगों में डर और भय का माहौल है, वो आपातकाल में नहीं था. हो सकता है इसकी वजह ये रही हो कि आपातकाल कम समय के लिए रहा हो और मौजूदा स्थिति चार सालों से चल रही है और ये स्थिति कब तक बनी रहेगी, हम लोग नहीं जानते.

अगर 2019 के बाद यह स्थिति अगले पांच साल तक बनी रही तो क्या स्थिति होगी, इस बारे में केवल सोचा जा सकता है.

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English summary
Four years the atmosphere of fear and terror has increased Romila Thapar

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