Flashback 2020: CAA और लॉकडाउन से लेकर किसान आंदोलन तक देश के सभी बड़े राजनीतिक घटनाक्रम
नई दिल्ली- दुनिया के हर शख्स के लिए साल 2020 ऐसा यादगार बन गया है, जिसमें कोरोना वायरस से जुड़ी कड़वी यादें शायद कभी भी दिमाग से नहीं जाने वाली। लेकिन, विविधता से भरपूर भारत वर्ष में यह साल भी राजनीतिक घटनाक्रमों से भरपूर रहा है। इस साल की शुरुआत भी एक भीषण राजनीतिक विरोध के साथ हुई थी और अंत भी बड़े विरोध प्रदर्शनों से हो रहा है। वैसे तो यह पूरा साल राजनीतिक रूप से भी मुख्यतौर पर कोरोना और उसके कहर से पैदा हुए हालातों पर ही फोकस रहा, लेकिन फिर भी इसमें ऐसे कई घटनाक्रम शामिल हैं, जो भारत का भविष्य तय करेंगे। यहां पर हम उन्हीं प्रमुख घटनाक्रमों पर एक नजर डाल रहे हैं।

नागरिकता संशोधन कानून का विरोध
केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ने पिछले साल दिसंबर महीने में ही नागरिकता संशोधन कानून बनाया था। इस कानून के पास होने के कुछ दिनों बाद इसपर ऐसा बवाल शुरू किया गया जिसका असर महीनों तक दिखाई पड़ा। जब साल 2020 की शुरुआत हुई, तब तक दिल्ली के शाहीन बाग समेत कई इलाके सीएए विरोधी आंदोलन का केंद्र बन चुके थे। जामिया नगर के पास शाहीन बाग तो सीएए और एनआरसी के विरोध में प्रोटेस्ट का एक एक मॉडल बन गया, जिसकी फ्रंट पर अगुवाई स्थानीय युवा और बुजुर्ग महिलाओं के हाथों में थी। ऐसे प्रदर्शन देशभर के कई शहरों और कस्बों में चल रहे थे। इसके तहत प्रदर्शनकारी केंद्र सरकार पर इन कानूनों को वापस लेने की मांग करते हुए सड़कें जाम कर बैठ गए थे। इन्हीं विरोध-प्रदर्शनों के साए में फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की यात्रा के दौरान ही उत्तर-पश्चिमी दिल्ली में दंगे भी भड़क गए, जिसमें 50 से ज्यादा लोगों की जान चली गई। लेकिन, जब देश में कोरोना वायरस का कहर शुरू हुआ तो दिल्ली पुलिस ने 24 मार्च को तीन महीने से चल रहे इस आंदोलन को जबरन खत्म करवा दिया।

नमस्ते ट्रंप
इस साल 24 फरवरी को अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका की फर्स्ट लेडी मेलानिया ट्रंप के साथ भारत यात्रा पर पहुंचे। यहां उनके स्वागत में अहमदाबाद के शानदार मोटेरा स्टेडियम में भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया गया था, जिसे नमस्ते ट्रंप का नाम दिया गया। अमेरिकी राष्ट्रपति की मेजबानी के लिए स्टेडियम में खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मौजूद थे। अपने शानदार स्वागत और नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम के लिए उन्होंने भारत के लोगों को शुक्रिया कहा। जानकारी के मुताबिक नमस्ते ट्रंप कार्यक्रम के लिए मोटेरा स्टेडियम में 1 लाख से ज्यादा लोग जमा थे। 36 घंटे की भारत यात्रा पर आए ट्रंप दंपति ने नई दिल्ली जाने से पहले आगरा जाकर ताजमहल का भी दीदार किया। राष्ट्रपति भवन में उनका आधिकारिक स्वागत 25 फरवरी को हुआ। फिर हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री मोदी के साथ उनकी प्रतिनिधमंडल स्तर की बातचीत हुई।

कोरोना संक्रमण
भारत में कोरोना संक्रमण का पहला मामला इस साल 30 जनवरी को केरल के त्रिशूर जिले में सामने आया। यह पीड़ित चीन के वुहान यूनिवर्सिटी से छुट्टियों में अपने घर आया था। भारत सरकार चीन में शुरू हो चुके इस भयानक बीमारी के कहर को लेकर पहले से ही सतर्क थी। 1 फरवरी को ही एयर इंडिया का पहला विमान चीन के वुहान में रह रहे 324 भारतीय छात्रों और नागरिकों को लेकर दिल्ली पहुंच चुका था। यह मिशन तब तक चला जब तक कि वहां से सभी वापसी के इच्छुक नागरिकों को निकाल नहीं लिया गया। इसके बाद दूसरा और तीसरा केस भी केरल में ही फरवरी की शुरुआत में मिला और इन सबका लिंक वुहान से ही जुड़ा था। केरल से बाहर पहला केस 2 मार्च को सामने आया, जो आदमी इटली से लौटकर दिल्ली आया था। इसके बाद इस महामारी ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार पकड़नी शुरू कर ली। देशभर में युद्ध स्तर पर क्वारंटीन सेंटर बनाए जाने लगे और वहां पर विदेशों से आने वाले यात्रियों को रखा जाने लगा। भारतीय रेलवे ने ट्रेनों की बोगियों को भी इस कार्य के लिए तैयार करना शुरू कर दिया। अस्पतालों में बेड बढ़ाए जाने लगे। आईसीयू और वेंटिलेटर की संख्या बढ़ाई जाने लगी।
स्थिति ये है कि कोरोना विस्फोट की शुरुआत में देश में जहां रोजाना कुछ सौ टेस्ट की गुंजाइश थी, हाल का स्वास्थ्य मंत्रालय का दावा है कि देश के 97 फीसदी हिस्से तक टेस्टिंग की सुविधा उपलब्ध है। सिर्फ कोविड मरीजों के लिए 20 लाख डेडिकेटेड बेड हैं। 12-13 हजार क्वारंटीन सेंटर अलग हैं। शुरू में टेस्टिंग किट नहीं थे, आज 10 लाख के करीब रोज यहीं बन रहे हैं। शुरू में पीपीआई किट और एन95 मास्क की किल्लत थी, आज यह बड़ी मात्रा में उपलब्ध हैं और निर्यात की स्थिति बनने का दावा किया जा रहा है।

जनता कर्फ्यू
कोरोना वायरस के संक्रमण के चेन को रोकने के लिए लॉकडाउन की घोषणा से पहले प्रधानमंत्री ने इस साल 22 मार्च यानि रविवार के दिन देशवासियों से जनता कर्फ्यू लगाने की अपील की थी। पीएम मोदी के इस अपील का देशभर में अभूतपूर्व असर दिखा और पूरा देश स्वैच्छिक तौर पर बंद रहा। पीएम मोदी ने लोगों से अपील की थी कि उस दिन लोग सुबह 7 बजे से रात 9 बजे तक अपने घरों में ही रहें। उस दिन सार्वजनिक परिवहन की सेवाएं भी निलंबित कर दी गई थी। प्रधानमंत्री के ही आह्वान पर लोगों ने शाम पांच बजे ताली-थाली और शंख बजाकर कोरोना वॉरियर का सम्मान किया।

लॉकडाउन
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस साल 24 मार्च को रात 8 बजे राष्ट्र के नाम अपने संदेश में 25 तारीख की रात 12 बजे से 21 दिनों के लिए पहले लॉकडाउन का ऐलान किया था। इस दौरान आवश्यक सेवाओं में लगे लोगों को छोड़कर सबको घर से निकलने पर पूरी तरह पाबंदी लगा दी गई। पहली बार पूरे देश में एक साथ ट्रेन और हवाई यातायात यात्रियों की आवाजाही के लिए पूरी तरह बंद कर दी गई। इसके बाद एक के बाद एक करके कई लॉकडाउन की घोषणा की गई और हर बार नई रियायतों के साथ इसकी मियाद बढ़ाई गई। 8 जून के बाद केंद्र सरकार ने धीरे-धीरे अनलॉक शुरू किया। लेकिन, लॉकडाउन की वजह से फैक्ट्रियां, कंपनियां और कारोबार ठप होने से लाखों लोगों की रोजी-रोटी पर बहुत बड़ी मार पड़ी। सरकार की ओर से जरूरतमंदों के लिए कई तरह के राहत पैकेज का ऐलान किया गया। नियोक्ताओं को कर्मचारियों पर सहानुभूति पूर्वक विचार करने की हिदायत दी गई, लेकिन इसका असर इतना भयावह हुआ है कि देश में बेरोजगारी का नया संकट खड़ा हो गया है। हालांकि, लॉकडाउन के दौरान देश ने कोरोना के खिलाफ इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने में ऐतिहासिक कामयाबी हासिल की है, लेकिन इसकी वजह से लोगों के रोजगार जिस तरह से गए हैं, उसकी आलोचना का सामना सरकार को अभी भी करना पड़ रहा है। अगर अर्थव्यवस्था की बात करें तो रेटिंग एजेंसी फिच रेटिंग्स ने सितंबर में भारत के चालू वित्त वर्ष के लिए इकोनॉमी में जीडीपी विकास दर का संशोधित अनुमान घटाकर -10.5 फीसदी कर दिया था। हालांकि, अब अर्थव्यवस्था फिर से रिकवरी मोड में दिखाई पड़ रही है। हाल में फिच रेटिंग्स ने भारतीय अर्थव्यवस्था में जीडीपी विकास दर के अनुमान को बढ़ाकर -9.4 फीसदी कर दिया है। अभी यह वित्त वर्ष खत्म होने में तीन महीने से ज्यादा का वक्त बचा ही हुआ है।

प्रवासी मजदूरों का दर्द
लॉकडाउन का सबसे भयावह रूप उन लाखों प्रवासी मजदूरों के रूप में देखने को मिला, जो काम-धंधा ठप होने की वजह से पैदल ही हजारों किलोमीटर दूर अपने गांवों की ओर निकल पड़े। ये प्रवासी मजदूर जिन बड़े शहरों में काम कर रहे थे, वहां की सरकारें उन्हें रोकने का पुख्ता इंतजाम दे पाने में पूरी तरह नाकाम रहीं। ट्रेनें और बसें पहले से ही बंद थीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि वह बिना काम-धंधा के बड़े शहरों में कैसे रहेंगे, बीवी-बच्चों को क्या खिलाएंगे। इसलिए उनके सामने पैदल ही गांव की ओर निकल जाने का एकमात्र विकल्प दिख रहा था। कई राज्यों ने उनकी मदद के लिए इंतजाम भी किए। लेकिन, फिर भी हर सहायता प्रवासियों के सैलाब के सामने बौनी साबित हुई। कई प्रवासियों ने रास्ते में चलते-चलते दम तोड़ दिया तो कुछ तेज रफ्तार वाहनों और पटरियों पर बदहवास भागने के दौरान मालगाड़ियों की चपेट में आ गए। पूरे अप्रैल तक यह सिलसिला चलता रहा। 1 मई को मजदूर दिवस के दिन से भारतीय रेलवे ने ऐसे प्रवासी मजदूरों को उनके गृह राज्यों तक छोड़ने के लिए श्रमिक स्पेशल ट्रेनों का इंतजाम शुरू किया। 12 मई से कुछ और स्पेशल ट्रेनें चलाई गईं। धीरे-धीरे घरेलू और वंदे भारत मिशन के तहत अंतरराष्ट्रीय उड़ानें भी शुरू की गईं।

लोन मोरेटोरियम
लॉकडाउन के दौरान कई लोगों की नौकरियां चली गईं, कई उद्योग-धंधे ठप पड़ गए। ऐसे लोगों को लोन पर राहत देने के लिए 27 मार्च को आरबीआई ने ईएमआई पर राहत देने के लिए लोन देने वाली वित्तीय संस्थानों और बैंकों को ईएमआई बकाए पर पहले 1 मार्च से 31 मार्च तक लोन मोरेटोरियम की सुविधा देने को कहा। बाद में इसे 31 अगस्त तक बढ़ा दिया गया। इस दौरान लोन लेने वाले ईएमआई भुगतान रोकने का आवेदन दे सकते थे। हालांकि, इस दौरान उन्हें ब्याज से छूट नहीं मिलती, लेकिन लोन नहीं चुकाने की एवज में उनका क्रेडिट स्कोर खराब नहीं होता। बाद में हालात ठीक होने पर वह धीरे-धीरे अपना बकाया चुका सकते हैं। लोन मोरेटोरियम की सुविधा हर तरह की लोन जैसे- घर, कार या क्रेडिट कार्ड के बिल पर दी गई।

मध्य प्रदेश में कांग्रेस की सरकार गिरी
इस साल मार्च में पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया ने कांग्रेस से बगावत कर दिया तो वहां की कमलनाथ सरकार संकट में आ गई। सिंधिया समर्थक 22 कांग्रेसी विधायकों ने, जिसमें कई कैबिनेट मंत्री थे, उन्होंने विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया तो कमलनाथ सरकार गिरना तय हो गया। मामले को स्पीकर के जरिए लटकाने की कोशिश हुई। केस सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा और आखिरकार तत्कालीन मुख्यमंत्री कमलनाथ को सदन में बहुमत साबित करने को मजबूर होना पड़ा तो उनकी सरकार गिर गई। कांग्रेस विधायकों ने विधायकी छोड़ दी थी, इसलिए भाजपा के पास तब सामान्य बहुमत लायक आंकड़ा जुट गया और शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बन गए। कांग्रेस के कई बागी को शिवराज सरकार में सत्ता का स्वाद मिला। बाद में कुछ और कांग्रेसी विधायकों ने भी इस्तीफा दे दिया। कुछ विधायकों की मौत के चलते कई सीटें अलग से खाली थीं। नवंबर में वहां पर 28 सीटों के लिए उपचुनाव हुए जिसमें भाजपा ने 19 सीटें जीतकर सदन में पूर्ण बहुमत हासिल कर लिया। कांग्रेस सिर्फ 9 सीट जीत सकी।

राजस्थान का राजनीतिक संकट
इस साल जुलाई में कांग्रेस के बड़े नेता और राजस्थान के तत्कालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट की बगावत के चलते अशोक गहलोत की सरकार भी संकट में आ गई थी। अपने समर्थक विधायकों के साथ पायलट कई दिनों तक जयपुर से दूर हरियाणा के एक रिजॉर्ट में डटे रहे। वह डिप्टी सीएम पद पहले ही छोड़ चुके थे। लेकिन, बाद में केंद्रीय नेतृत्व के समझाने-बुझाने के बाद यह संकट फिलहाल टला हुआ है और गहलोत सरकार अभी सत्ता में बनी हुई है।

'मन की बात' को मिले ज्यादा डिसलाइक
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का रेडियो पर प्रसारित होने वाला मासिक कार्यक्रम 'मन की बात' इस साल एक बार नापसंदी की वजह से भी खूब चर्चा में रहा। इस साल 30 अगस्त को जो पीएम मोदी का यह कार्यक्रम प्रसारित हुआ उसे भाजपा के आधिकारिक यू-ट्यूब चैनल पर लाइक से कई गुना डिसलाइक मिले। 1 सितंबर, 2020 को डिसलाइक और लाइक का अंतर 7.2 लाख से ज्यादा और 1.2 लाख का था। माना गया कि इसकी वजह नेशनल एलिजिबिलिटी एंट्रेंस टेस्ट और ज्वाइंट एंट्रेंस एग्जामिनेशन को स्थगित किए जाने को लेकर छात्रों के लंबे समय तक चली मांग थी। हालांकि, बीजेपी ने इस डिसलाइक को विरोधियों की डिजिटल अभियान का हिस्सा करार दिया था।

बिहार विधानसभा चुनाव
इस साल अक्टूबर-नवंबर में बिहार विधानसभा चुनाव करवाए गए। कोरोना वायरस के दौरान हुए इस चुनाव पर पूरी दुनिया की नजर थी, लेकिन भारतीय चुनाव आयोग इसे बहुत ही सफलता के साथ पूरा करवाया। शुरू से आए सर्वेक्षणों में इस चुनाव को एकतरफा एनडीए के पक्ष में दिखाया जा रहा था। लेकिन, चुनाव से ठीक पहले अचानक माहौल बदलने के दावे शुरू हो गए। फाइनल वोटिंग के बाद जितने भी एग्जिट पोल आए उसमें नीतीश कुमार की अगुवाई वाले एनडीए गठबंधन को सत्ता से बाहर कर दिया गया। लेकिन, वास्तविक चुनाव परिणाम अलग आए। इसमें राजद की अगुवाई वाले महागठबंधन ने बढ़िया प्रदर्शन किया, लेकिन बहुमत एनएडीए को मिला और 243 सीटों वाली विधानसभा में 125 सीटें जीतकर नीतीश कुमार की अगुवाई वाला एनडीए फिर से सत्ता पर काबिज हुआ। महागठबंधन को 110 और असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम को 5 सीटें मिलीं।

हैदराबाद निकाय चुनाव
दिसंबर के शुरू में ग्रेटर हैदराबाद नगर निगम का चुनाव भी राष्ट्रीय मुद्दा बन गया। भाजपा ने इस चुनाव में अपनी पूरी ताकत झोंक दी। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से लेकर, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा समेत कई मंत्रियों ने निकाय चुनाव में प्रचार किया। हैदराबाद बनाम भाग्यनगर और निजाम-नवाब संस्कृति से छुटकारा दिलाने जैसे वादे किए गए। आखिरकार बीजेपी को इसका फायदा मिला और वह 150 पार्षदों वाले निगम में 4 से 48 सीटों पर पहुंच गई और उसे सत्ताधारी टीआरएस से सिर्फ 0.25% ही कम वोट मिले। टीआरएस पिछली बार के 99 के मुकाबले भाजपा से सिर्फ 7 ज्यादा यानि 55 सीटें ही जीत सकी। वहीं ओवैसी की पार्टी पिछली बार की तरह 44 सीटों पर ही डटी रही।

कृषि कानूनों के विरोध में किसानों का प्रदर्शन
तीन कृषि कानूनों के विरोध में 26 नवंबर से किसान दिल्ली की विभिन्न सीमाओं पर डेरा डाले बैठे हैं। उनकी मांगों में तीनों कानून को पूरी तरह से वापस लेने जैसी मांग भी शामिल है। किसानों के प्रतिनिधियों से केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों की कई दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई ठोस नतीजा अभी तक नहीं निकल पाया है। मूल रूप से पंजाब और हरियाणा से आए किसानों ने अपने साथ अगले कई महीने तक के लिए आंदोलन की तैयारी कर रखी है। किसान आंदोलन जल्द शांत न पड़े इसलिए इसमें अब राजनीतिक पार्टियां भी कूद पड़ी हैं। संभवत: किसानों का यह आंदोलन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल की सबसे बड़ी चुनौती बनती दिख रही है।












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