Get Updates
Get notified of breaking news, exclusive insights, and must-see stories!

पहले किस्मत को हराया फिर सरकार को झुकाया और बनीं पहली नेत्रहीन महिला IAS

पहली नेत्रहीन महिला IAS

महाराष्ट्र के जलगांव जिले का वडाली गांव। इस गांव के रहने वाले लाहेन सिंह बी पाटिल और ज्योति पाटिल के घर 1988 में एक लड़की ने जन्म लिया। असिस्टेंट इंजीनियर लाहेन सिंह पाटिल अपनी इस बच्ची को अच्छी तालीम देना चाहते थे। गांव के ही स्कूल में लड़की की पढ़ाई शुरू हुई। वह छह साल की थी तभी एक हादसा हो गया। क्लास में पढ़ने वाली एक लड़की की पेंसिल से उसकी एक आंख फूट गयी। इलाज के दौरान उसकी दोनों आंखों की रौशनी चली गयी। वह शत प्रतिशत नेत्रहीन हो गयी। आंखें गयी तो क्या हुआ उसकी हिम्मत फौलाद की गयी। रास्ते के पत्थरों को ठोकर पर उड़ाती रही। किस्मत को झुका कर पहले पढ़ाई में झंडा गाड़ा। 2016 में यूपीएससी कम्पीट करने के बाद भी जब रेलवे ने उसकी दृष्टिहीनता का हवाला देकर नौकरी देने इंकार कर दिया तो उसने पूरे सिस्टम के खिलाफ जंग छेड़ दी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी तक को झुकना पड़ा। सरकार के ना-नुकुर में बहुत समय निकल गया। जब तक वह रेलवे की नौकरी शुरू करती तब तक यूपीएससी 2017 का रिजल्ट आ गया। वह IAS के लिए चुनी जा चुकी थी। एक नेत्रहीन लड़की ने गूंगी-बहरी सरकार को झुका दिया और दिखा दिया कि उसमें कितना दम है। इस लड़की का नाम है प्रांजल पाटिल। वह देश की पहली दृष्टिबाधित महिला IAS हैं और अभी तमिलनाडु में तैनात हैं।

पढ़ाई में होनहार

पढ़ाई में होनहार

बचपन में प्रांजल के साथ हादसे के बाद पूरा परिवार हताश था। लेकिन लाहेन सिंह पाटिल ने अपनी बेटी को पढ़ाने की जिद नहीं छोड़ी। पिता के हौसले को देख कर लड़की ने भी हिम्मत बटोरी। लाहेन सिंह पाटिल अपने परिवार के साथ मुम्बई आ गये। मुम्बई के दादर स्थित कमला मेहता नेत्रहीन स्कूल में उसकी पढ़ाई शुरू हुई। ब्रेल लिपि से पढ़ाई में प्रांजल जल्द ही अभ्यस्त हो गयी। उसने दसवीं की परीक्षा बहुत अच्छे नम्बरों से पास की। 12 की पढ़ाई के लिए उसने उल्हास नगर( मुम्बई का उपनगर) के चांदी बाई हिम्मत लाल मनसुखानी कॉलेज में एडमिशन लिया। मुम्बई से उल्हास नगर की दूरी करीब 50 किलोमीटर थी। वह छत्रपति शिवाजी टर्मिनस रेलवे स्टेशन से ट्रेन पकड़ कर रोज उल्हास नगर जाती। एक नेत्रहीन लड़की के लिए सीढ़िया चढ़ना, ट्रेन में चढ़ना और रोज सफर करना आसान न था। हर कष्ट सह कर उसने अपनी बारहवीं की पढ़ाई पूरी की। एक बार फिर अच्छे नम्बरों से परीक्षा पास की। उसका एडमिशन मुम्बई के प्रतिष्ठित सेंट जेवियर्स कॉलेज में हुआ। उसने पॉलिटिकल सांइस में ग्रेजुएशन किया। उच्च शिक्षा के लिए उसने जेएनयू में इंट्रेस टेस्ट दिया। सफल होने पर उसने यहां से एमए और एमफिल किया।

ऐसे मारी यूपीएससी में बाजी

ऐसे मारी यूपीएससी में बाजी

प्रांजल ने कॉलेज के दिनों में ही IAS बनने की ठानी थी। जेएनयू में एम फिल के दौरान ही उसने IAS की तैयारी शुरू की। रास्ता बेहद मुश्किल था। कदम-कदम पर रोड़े थे। उसने अपनी हिम्मत को तकनीक का सहारा दिया। चूंकि वह देख नहीं सकती थी इस लिए तैयारी के लिए जॉब एक्सेस वीद स्पीच सॉफ्टवेयर (JAWS) का इस्तेमाल किया। JAWS एक स्क्रीन रीडिंग (कम्प्यूटर या मोबाइल) सॉफ्टवेयर है जो किसी प्रिंट मटेरियल को आवाज के साथ पढ़ता है और स्क्रीन पर डिस्प्ले होने वाले शब्द ब्रेल लिपी में होते हैं। अब प्रांजल की दूसरी मुश्किल ये थी कि वह यूपीएससी की परीक्षा में पेपर लिखने के लिए किसी योग्य लेखक की तलाश करे। दृष्टिबाधित उम्मीदवारों को पेपर लिखने के लिए एक सहयोगी मिलता है। प्रतियोगी जो डिक्टेट करता है लेखक उसे आंसर शीट पर लिखता है। ऐसे प्रतियोगियों को उत्तर लिखने के लिए चार घंटे का समय मिलता है। यह व्यवस्था वैसे ही है जैसे कि क्रिकेट के खेल में किसी इंजर्ड बल्लेबाज को रन दोड़ने के लिए रनर मिलता है। प्रांजल की इस मुश्किल को उसकी सहेली विदुषी ने आसान कर दिया। परीक्षा से पहले ही प्रांजल और विदुषी ने तय समय में उत्तर लिखने का अभ्यास किया। कोई कोचिंग नहीं ली। खुद से तैयारी की। प्रांजल और विदुषी का तालमेल बैठ गया। 2015 में प्रांजल यूपीएससी की परीक्षा में बैठी। 2016 में रिजल्ट निकला। पहली बार में ही कामयाब रही लेकिन रैंकिंग अच्छी नहीं मिली। 773 वीं रैंक होने की वजह से वे इंडियन रेलवे ऑडिट सर्विस के लिए चुनी गयीं।

सरकार से लड़ाई

सरकार से लड़ाई

इंडियन रेलवे ऑडिट सर्विस में चुनी जाने के बाद उन्हें कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग से एक पत्र मिला जिसमें उनके जॉब एलॉटमेंट और ट्रेनिंग की सूचना थी। 16 दिसम्बर 2016 से उनकी ट्रेनिंग शुरू होनी थी। कुछ दिनों के बाद उन्हें अचानक एक दूसरा पत्र मिला जिसमें बताया गया कि रेलवे में शत प्रतिशत दृष्टिबाधित प्रतिभागी को नौकरी देने का प्रावधान नहीं है। इसलिए उनकी नियुक्ति रद्द की जाती है। इस पत्र के बाद प्रांजल का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को एक जोरदार चिट्ठी लिखी। उन्होंने लिखा कि जब वे अपनी प्रतिभा के बल पर यूपीएससी में चुनी गयीं हैं तो फिर कोई उन्हें नौकरी से कैसे वंचित कर सकता है ? नेत्रहीन हैं तो क्या हुआ परीक्षा पास कर अपनी योग्यता साबित की है। दिव्यांग के लिए जब नियुक्ति में विशेष प्रावधान किया है तो फिर उसकी नेत्रहीनता पर सवाल क्यों उठाया जा रहा है? प्रधानमंत्री जी मुझे इंसाफ दिलाइए। फिर वह तत्कालीन रेल मंत्री सुरेश प्रभु से मिली। प्रांजल की आवाज पर सरकारी व्यवस्था हिलने लगी।

आखिर बन ही गयीं IAS

आखिर बन ही गयीं IAS

मोदी की दखल के बाद रेलवे प्रांजल को नौकरी देने पर राजी हुआ। लेकिन अफसर पूरे मन से प्रांजल की मदद नहीं करना चाहते थे। रेलवे ने प्रांजल को एक दूसरा जॉब ऑफर किया। उन्हें डाक और संचार विभाग में ज्वाइन करने के लिए कहा गया। प्रांजल ने पाया कि यह जॉब उनकी रैंक के हिसाब से कमतर है। उन्होंने फिर लड़ाई छेड़ दी। उन्होंने कहा कि मुझे दया की भीख नहीं बल्कि वाजिब हक चाहिए। इस बीच उन्होंने सरकार की लुंज-पुंज व्यवस्था पर प्रहार करने के लिए फिर यूपीएससी की परीक्षा दी। लड़ाई भी चलती रही। मीडिया में ये मामल खूब उछला। मोदी सरकार की फजीहत होने लगी। अंत में रेलवे ने प्रांजल को 2017 में उनकी रैंकिंग के हिसाब से एक दूसरी नौकरी दी। उन्होंने ट्रेनिंग के लिए ज्वाइन किया। इस बीच यूपीएससी परीक्षा का रिजल्ट निकल गया। प्रांजल ने 124 वीं रैंक लाकर IAS बनने का सपना पूरा कर लिया। किस्मत और सरकारी तंत्र ने प्रांजल की राह में लाख कांटे बिछाये लेकिन उनके इरादे अटल रहे। उन्होंने मंजिल पर पहुंच कर ही दम लिया।

More From
Prev
Next
Notifications
Settings
Clear Notifications
Notifications
Use the toggle to switch on notifications
  • Block for 8 hours
  • Block for 12 hours
  • Block for 24 hours
  • Don't block
Gender
Select your Gender
  • Male
  • Female
  • Others
Age
Select your Age Range
  • Under 18
  • 18 to 25
  • 26 to 35
  • 36 to 45
  • 45 to 55
  • 55+