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Farmers Protest: लोकसभा चुनाव के बावजूद अभी तक 'असरदार' क्यों नहीं हुआ किसान आंदोलन?

2020-2021 में पंजाब के किसान संगठनों के जिन नेताओं ने दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन की अगुवाई की थी, उनकी जगह अभी के आंदोलन को एक नई जमात कंट्रोल करता नजर आ रहा है।

13 फरवरी से मौजूदा किसान आंदोलन की शुरुआत 17 किसान सगठनों के संयुक्त किसान मोर्चा (नॉन-पॉलिटिकल) ने की थी, जिसमें जगजीत सिंह डल्लेवाल की भारतीय किसान यूनियन (सिधुपुर) और सरवन सिंह पंधेर की किसान मजदूर संघर्ष समिति भी शामिल है।

farmers protest

किसान संगठनों के बीच भी खींचतान!
इन किसान यूनियनों ने ही एमएसपी की कानूनी गारंटी, सभी फसलों की सरकारी खरीद, ऋण माफी से लेकर किसानों को पेंशन देने तक जैसी मांगों को लेकर 'दिल्ली चलो' का अभियान शुरू किया था।

इन नेताओं ने एसकेएम की ओर से 16 फरवरी के भारत बंद के आह्वान से पहले ही 'दिल्ली चलो' की आवाज लगा दी, जिससे यही संदेश निकला कि कहीं न कहीं किसान संगठनों के बीच भी राजनीतिक खींचतान चल रही है।

चुनावों में भी भाग्य आजमा चुके हैं किसान संगठन
पंजाब के किसान संगठनों की मंशा पूरी तरह से गैर-राजनीतिक नहीं है, इसका खुलासा पिछले आंदोलन के बाद हुए 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव में ही हो चुका है। बीकेयू (राजेवाल) और अन्य संगठन चुनावों में भी भाग्य आजमा चुके हैं, लेकिन जनता से बुरी तरह से ठुकराए जा चुके हैं।

'किसानों की मदद नहीं, खुद का पुनर्वास करना है मकसद'
अबकी बार किसान संगठनों ने जिस तरह की कुछ मांगें सामने रखी हैं, उससे इस आंदोलन के अंजाम को लेकर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं। मसलन, एचटी ने जाने-माने अर्थशास्त्री और पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के पूर्व वाइस चांसर सरदारा सिंह जोहल के हवाले से जो कुछ लिखा है,वह काफी गंभीर है।

उन्होंने कहा है, 'कृषि राजनीति में कॉम्पिटिशन के ताजा ट्रेंड ने राज्य में अराजकता पैदा कर दी है। इन नेताओं का मकसद किसानों की मदद करना नहीं है, बल्कि खुद का पुनर्वास करना है।'

'मांगें अव्यवहारिक हैं, इससे गरीब किसानों का भला नहीं होने वाला'
सरदारा सिंह ने यहां तक कहा है कि 'इन प्रदर्शनों से किसी का भला नहीं होने वाला, बल्कि राज्य को बहुत महंगा पड़ेगा। इसे रोकना चाहिए और कायदे की बातचीत शुरू की जानी चाहिए।'

उन्होंने यहां तक कहा है कि उनकी मांगें अव्यावहारिक हैं और वे गरीब और असहाय किसानों के साथ सही नहीं कर रहे हैं।

एसकेएम (नॉन-पॉलिटिकल) के दिल्ली चलो मार्च को हरियाणा सरकार शंभू और खनौरी बॉर्डर पर ही रोक चुकी है। केंद्रीय मंत्रियों के साथ किसान नेताओं की चार दौर की बातचीत हो चुकी है, लेकिन कोई समाधान नहीं निकला है।

बार-बार उभर रहे हैं आपसी मतभेद
21 फरवरी को खनौरी बॉर्डर पर 21 साल के युवक की मौत के बाद एसकेएम (नॉन-पॉलिटिकल) ने पहले दो दिनों के लिए दिल्ली चलो मार्च निलंबित किया, जिसे बढ़ाकर 29 फरवरी किया जा चुका है। लेकिन, इसी दौरान कुछ संगठनों ने पूरे भारत में ट्रैक्टर मार्च निकालने का ऐलान कर दिया।

वहीं, शनिवार को पंधेर ने कह दिया कि प्रदर्शन जारी रहेगा और जो किसान उनके साथ आना चाहते हैं, वह आएं और लोकसभा चुनावों की घोषणा हो जाने के बाद भी उनका आंदोलन खत्म नहीं होगा। मतलब, किसान संगठनों में आपसी मतभेद बार-बार नजर आ रहा है।

'एसकेएम (नॉन-पॉलिटिकल) के इरादों को लेकर संदेह पैदा होता है'
अमृतसर स्थित गुरु नानक देव यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान विभाग के प्रमुख रह चुके जगरूप सिंह सेखों के मुताबिक,'लगता है कि एसकेएम (नॉन-पॉलिटिकल) खुद को आगे रखने के लिए जल्दबाजी कर रहा है और इससे उनके इरादे को लेकर संदेह पैदा होता है।'

उन्होंने कहा, 'उन्होंने सबसे आगे रहने की कोशिश की, जबकि एसकेएम ने पहले से ही 16 फरवरी को भारत बंद और मार्च में दिल्ली में किसान महापंचायत की योजना बना ली थी। उधर बीकेयू (उग्राहन) ने 22 फरवरी से चंडीगढ़ में पांच दिनों का प्रदर्शन शुरू करने वाला था।'

'डल्लेवाल और पंढेर को सुर्खियों में रहना है'
सेखों का कहना है, 'उनकी (डल्लेवाल और पंढेर) की आकांक्षाएं हैं और उन्हें सुर्खियों में रहना है। उन्होंने क्या प्राप्त किया है? आंदोलन हिंसात्मक हो गया और एक युवा किसान की जान चली गई, और कई अन्य घायल हो गए। पूरा राज्य संकट में है और असली मुद्दों को हाशिए पर धकेल दिया गया है।'

इस बार स्पष्ट रूप से ऐसा लगता है कि राजनीतिक दल किसान संगठनों का रुख देखकर अपनी योजना तैयार कर रहे हैं। शिरोमणि अकाली दल किसान संगठनों से सबसे ज्यादा प्रभावित रहा है। आंदोलन की वजह उसे 14 फरवरी से घोषित अपनी 'पंजाब बचाओ यात्रा' रद्द करनी पड़ गई।

बीच में लोकसभा चुनावों की वजह से एक बार फिर से भाजपा और अकाली दल के गठबंधन की चर्चा शुरू हुई थी। लेकिन, आंदोलन की वजह से शायद बादल परिवार आगे बढ़ने की हिम्मत नहीं दिखा सका। इसी तरह से वामपंथी पार्टियों से भी किसान संगठनों को साथ मिल रहा है।

खासकर मालवा क्षेत्र में इसका ज्यादा असर दिखा है। लेफ्ट-विचारधारा वाले थिंक-टैंक के भी इस आंदोलन में घुसने की बात सामने आ रही है। ये तमाम ऐसी वजहें हैं, जिसमें इस बार के आंदोलन के अबतक असरदार न हो पाने वजह खोजी जा सकती है।

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