तूफ़ानों और बग़ावत का सामना करते हुए वास्को डा गामा ने रखा था भारत में कदम - विवेचना

वास्को डा गामा भारत आने का समुद्री रास्ता खोजने वाले पहले व्यक्ति थे. 20 मई 1498 को यानी अब से ठीक 525 साल पहले वो कालीकट आए थे.

वास्को डा गामा
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वास्को डा गामा

जब कोलंबस भारत की खोज करते-करते अमेरिका पहुंच गए तो पुर्तगाल के राजा जॉन ने भारत पहुंचने का समुद्री रास्ता खोजने का बीड़ा उठाया. राजा ने इस काम के लिए तीन बड़े जहाज़ बनाने का आदेश दिया, लेकिन तभी वो बीमार पड़ गए.

इससे पहले कि भारत की राह खोजने की उनकी ख़्वाहिश पूरी हो पाती उन्होंने दम तोड़ दिया. लेकिन उनके वारिस इमैनुएल में भी भारत तक पहुंचने का जज़्बा उतना ही मज़बूत था. अपनी इस मुहिम को अंजाम देने के लिए उन्होंने कमांडर के तौर पर वास्को डा गामा को चुना.

वास्को ने अपने साथ जाने वाले दो जहाज़ों के कमांडर के तौर अपने भाई पाओलो और दोस्त निकोलस कोएलो को चुना. 25 मार्च 1497 रविवार की एक सुबह लिस्बन की सड़कों पर लोगों का हुजूम निकल आया था. उस दिन कुछ बड़ा, कुछ असामान्य होने वाला था.

एक चौक में स्थित गिरजाघर में अपने मंत्रियों से घिरे पुर्तगाल के राजा और रानी बैठे हुए थे. उनके सामने एक पर्दा लगा हुआ था. गिरजाघर के बिशप वास्को डा गामा के अभियान के लिए विशेष प्रार्थना कर रहे थे. जैसे ही प्रार्थना समाप्त हुई पुर्तगाल के राजा इमैनुएल पर्दे से बाहर आए. तीनों जहाज़ों के कमांडरों ने घुटनों के बल बैठकर उनका अभिवादन किया.

लिस्बन से भारत के लिए प्रस्थान करते हुए वास्को डा गामा
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लिस्बन से भारत के लिए प्रस्थान करते हुए वास्को डा गामा

भयानक तूफ़ान से हुआ सामना

राजा के हाथ चूमने के बाद वास्को डा गामा एक अरबी घोड़े पर बैठे और एक जुलूस में सबसे आगे चलने लगे. उनके साथ दूसरे घोड़ों पर उनके भाई पाओलो और दोस्त निकोलस चल रहे थे. उनके पीछे चमकदार वर्दी पहने हुए जहाज़ के नाविक कदम से कदम मिला कर चल रहे थे.

जैसे ही वास्को का जुलूस बंदरगाह पर पहुंचे, तोप के गोले दागकर उनका स्वागत किया गया. वास्को अपने घोड़े से उतरकर अपने जहाज़ 'सैन राफ़ेल' पर चढ़े. उनके जहाज़ के बंदरगाह छोड़ने पर वहां मौजूद लोगों ने हाथ हिलाकर वास्को का अभिवादन किया.

जवाब में डेक पर खड़े वास्को और उनके साथियों ने भी हाथ हिलाए. चूंकि पहले दिन हवा खिलाफ़ चल रही थी इसलिए वास्को के जहाज़ लिस्बन से कुछ दूर बेलेम तक ही पहुंच पाए. तीसरे दिन हवा ने अपना रुख़ बदला और गामा का बेड़ा तेज़ी से अपने अभियान पर चल पड़े.

तूफ़ान
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तूफ़ान

जॉर्ज एम टोले अपनी क़िताब 'द वोयाजेस एंड एडवेन्चर्स ऑफ़ वास्को डा गामा' में लिखते हैं, "तीनों जहाज़ साथ-साथ चल रहे थे. वो इतने क़रीब होते थे कि उनके कमांडर डेक पर खड़े होकर एकदूसरे से बातें कर सकते थे. जैसे ही उन्होंने कनारी आइलैंड को पार किया एक बहुत बड़े तूफ़ान से उनका सामना हुआ."

"जब लहरें शांत हुईं तो वास्को के पोत 'सैन राफ़ैल' का कहीं नामो-निशान नहीं था. लेकिन पाओलो और कोएलो ने केप वर्डे की तरफ़ आगे बढ़ना जारी रखा. जब वो लोग केप वर्डे पहुंचे तो वहां वास्को के पोत को खड़े देख उनकी जान में जान आई. उन्होंने बिगुल बजाकर और तोप के गोले छोड़कर इस मिलन का स्वागत किया."

"कई महीनों तक चलने के बाद वास्को की टीम सेंट हेलेना बे पहुंची. वहां रहने वाले कुछ लोगों ने वास्को के दल पर हमला कर दिया. वास्को तीर लगने से घायल हो गए लेकिन किसी की मौत नहीं हुई."

जहाज़ पर बग़ावत

जब वास्को आगे बढ़े तो एक दिन अचानक एक और बड़ा समुद्री तूफ़ान आया. तूफ़ान इतना बड़ा था कि पोत के डेक पर पानी भर गया. इतनी तेज़ हवा चल रही थी कि उड़ जाने के डर से वास्को के नाविकों ने खुद को रस्सी से बांध लिया. जहाज़ इतनी आवाज़ कर रहे थे कि लग रहा था कि किसी भी क्षण उनके टुकड़े-टुकड़े हो सकते हैं. नाविक इतने घबरा गए कि उन्होंने वास्को से वापस पुर्तगाल लौट चलने की अपील की.

लेकिन वास्को ने उनकी बात मानने से इनकार कर दिया. उनका कहना था 'हम या तो भारत जाएंगे या यहीं मरेंगे.'

संजय सुब्रमण्यम अपनी क़िताब 'द करियर एंड लेजेंड ऑफ़ वास्को डा गामा' में लिखते हैं, "जब तूफ़ान थोड़ा थमा तो तीनों जहाज़ साथ-साथ चलने लगे. 'सैन राफ़ेल' के नाविक 'सैन गैब्रिएल' और 'सैन मिगुएल' के अपने साथियों को भड़काने लगे कि वो अपने कमांडरों का आदेश न मानें."

"वास्को ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए सभी विद्रोहियों को बंदी बना लिया और कहा कि जब तक वो वापस पुर्तगाल नहीं पहुंच जाते उन्हें बेड़ियों से बांधकर रखा जाएगा. वास्को के इस कदम ने विद्रोह को पूरी तरह से कुचल दिया."

मेलिंदा के राजा ने वास्को का किया स्वागत

इस तूफ़ान ने तीनों जहाज़ों को बहुत नुक्सान पहुंचाया था. उनमें कई जगहों पर छेद हो गए थे. जहाज़ पर पीने के पानी की बहुत कमी हो गई थी और रसोइयों को खाना बनाने के लिए समुद्र के पानी का इस्तेमाल करना पड़ रहा था.

इसके दस दिनों बाद वास्को का बेड़ा एक नदी के मुहाने पर पहुंचा. यहां पर वास्को ने लंगर डालने का फ़ैसला किया.

तीनों जहाज़ों का बारीकी से मुआयना किया गया. पता चला कि 'सेंट मिगुएल' अब आगे जाने की स्थिति में नहीं है इसलिए उसे वहीं छोड़कर उसके नाविकों को बाकी दो जहाज़ों में शिफ़्ट किया गया.

मार्च के अंत में वास्को ने मोज़ाम्बिक के बंदरगाह पर लंगर डाला लेकिन वहां के शेख़ के विरोधी रवैये को देखते हुए वास्को ने आगे बढ़ने का फ़ैसला किया. तट के साथ चलते हुए वास्को मेलिंदा पहुंचे जहां के राजा और लोगों ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया.

वहां के राजा वास्को के पोत पर उनसे मिलने पहुंचे. वास्को ने अपने सामने एक कुर्सी रखवाई और राजा को उस पर बैठने के लिए कहा. वहां मौजूद एक अफ़्रीकी गुलाम ने दोनों के बीच दुभाषिए का काम किया.

जब वास्को ने उसने आगे बढ़ने की इजाज़त मांगी तो राजा ने कहा कि उन्हें यहां अगले तीन महीनों तक इंतज़ार करना होगा, तब जाकर अनुकूल समुद्री हवाएं चलेंगी और वो भारत की तरफ़ बढ़ सकेंगे.

वास्को ने इस समय का इस्तेमाल अपने जहाज़ों की मरम्मत करने में लगाया. जहाज़ में ताज़ा पानी की खेप लाई गई और जहाज़ों को गोश्त, सब्ज़ियों और फलों से भर दिया गया ताकि आने वाले दिनों में उनका इस्तेमाल किया जा सके.

वास्को डा गामा
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वास्को डा गामा

भारत का तट देखते ही वास्को डा गामा भावुक हुए

छह अगस्त को वास्को डा गामा ने आगे की यात्रा शुरू की. अभी तक वो ज़मीन किनारे-किनारे समुद्र में चल रहे थे. अब उनको पहली बार खुले समुद्र में जाना था. इस बीच वास्को मेलिंदा से लाए कुछ काले लोगों से दुभाषिए के ज़रिए बात कर भारत और उसके लोगों के बारे में जानकारी इकट्ठा करते रहे.

इसके 19 दिनों के बाद एक सुबह मेलिंदा से साथ आए एक पायलट ने वास्को के सामने आकर कहा, "कैप्टेन, मुझे लगता है कि हम भारत के तट के बहुत नज़दीक हैं. हो सकता है हमें कल सुबह तक भूमि के दर्शन हो जाएँ. उस रात वास्को सो नहीं सके."

जॉर्ज एम टोले लिखते हैं, "तड़के वो अपने साथियों के साथ जहाज़ के डेक पर आ गए. उनकी निगाहें पूरब की तरफ़ लगी हुई थीं ताकि वो भूमि की पहली झलक पा सकें. तभी लोगों का शोर सुनाई दिया, भूमि, भूमि, भूमि. एक क्षण बाद जहाज़ के पायलट ने वास्को के सामने सिर झुकाया और अपनी काँपती हुए उंगलियों से पूर्व की तरफ़ इशारा करते हुए कहा, कैप्टेन, वो रही भारत भूमि. वहां मौजूद नाविकों की आंखों से ख़ुशी के आंसू बहने लगे. वास्को ईश्वर को धन्यवाद देने के लिए घुटनों के बल बैठ गए. उनके साथियों ने उनका अनुसरण किया."

भारत पहुंचने के लिए वास्को डा गामा ने ये रास्ता तय किया
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भारत पहुंचने के लिए वास्को डा गामा ने ये रास्ता तय किया

पोत को स्थानीय नौकाओं ने घेरा

जब तट पर मौजूद लोगों ने जहाज़ों को लंगर डाले देखा तो कुछ मछुआरे अपनी नावों में उनके पास चले आए. उन्होंने बताया कि कालीकट वहां से 12 मील दक्षिण में है. वास्को को दूर से ही कालीकट के गुंबद और मीनारें नज़र आ गई.

अगले दिन जैसे ही सूरज उगा कई नौकाओं ने वास्को के दो जहाज़ों को घेर लिया. उनमें काली चमड़ी वाले भारतीय सवार थे. उनके बदन नंगे थे लेकिन शरीर के निचले हिस्से को उन्होंने तरह-तरह के रंगों वाले कपड़ों से ढ़क रखा था. वो ये जानने के लिए बहुत आतुर थे कि वो लोग कौन हैं और उनका यहां आने का मक़सद क्या है ?

उन नौकाओं में कुछ नौकाएं मछुआरों की थी. वास्को ने उन्हें देखते ही उनकी मछलियां ख़रीदने की पेशकश कर डाली. कुछ अजनबियों के कालीकट पहुंचने की ख़बर वहाँ के राजा ज़मोरिन तक पहुँची.

उन्होंने मछुआरों को आदेश दिया कि वो अंजीर, नारियल और मुर्गे लेकर दोबारा उन जहाज़ों तक जाएँ और आगंतुकों के बारे में जितना संभव हो जानने की कोशिश करें.

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वास्को ने राजा ज़मोरिन को दिए तोहफ़े

कई दिनों की मंत्रणा के बाद तय हुआ कि वास्को कालीकट के राजा ज़मोरिन से मिलने जाएंगे. वो उन्हें भेंट देने के लिए अपने साथ लाल कपड़ा, मखमल, पीले साटन का कपड़ा, 50 टोपियां, 50 हाथी दांत के हत्थे वाले चाकू और कीमती कपड़े से मढ़ी हुई एक कुर्सी ले कर गए.

संजय सुब्रमण्यम लिखते हैं, "वास्को ने नीले साटन के कपड़े की एक ट्यूनिक पहन रखी थी. उनकी कमर में बंधी बेल्ट से सोने के हत्थे वाली कटार लटक रही थी. उनके सिर पर नीले रंग की मखमल की टोपी थी जिसमें सफ़ेद रंग का एक पंख लगा हुआ था. उन्होंने पैरों में सफ़ेद रंग के जूते पहन रखे थे. उनके आगे-आगे उनके 12 गार्ड चल रहे थे. उनके हाथों में राजा के लिए तरह-तरह के तोहफ़े थे. इस जुलूस के आगे आगे कुछ पुर्तगाली बिगुल बजाते हुए चल रहे थे."

चारों तरफ़ लोगों की इतनी भीड़ थी कि बहुत मुश्किल से वास्को को कुचलने से बचाया जा सका. उस समय वास्को सोच रहे थे कि काश पुर्तगाल के लोग ये देख पाते कि भारत में उनका किस तरह से सम्मान किया जा रहा है.

वास्को डा गामा
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वास्को डा गामा

वास्को की ज़मोरिन से मुलाकात

जब वास्को ज़मोरिन के सामने पहुंचे तो उन्होंने उनके सामने तीन बार अपना सिर झुकाया. ज़मोरिन ने अपने बग़ल में रखी कुर्सी की तरफ़ इशारा करते हुए वास्को को उस पर बैठने के लिए कहा. फिर उनके सामने खाने के लिए अंजीर, केले और कटहल लाए गए. फल खाने के बाद पुर्तगाली लोगों को प्यास लगी.

जॉर्ज एम टोले लिखते हैं, "उनसे कहा गया कि वो लोटे को अपने होंठ से लगाए बिना पानी पीएं. उनके हाथों में चुल्लू में पानी डाला गया जिसे उन्होंने पिया. जब पुर्तगाली ऐसा कर रहे थे तो कुछ के गले में पानी फंस गया और उन्होंने उसे अपने कपड़ों पर गिरा लिया. ये दृश्य देखते ही ज़मोरिन अपनी हंसी नहीं रोक पाए. वास्को ने दुभाषिए के ज़रिए ज़मोरिन से अनुरोध किया कि वो उस कुर्सी पर बैठें तो वो उनके लिए लाए थे."

टोले ने लिखा है, "वास्को ने ज़मोरिन को संबोधित करते हुए कहा, आप महान हैं, सबसे शक्तिशाली राजाओं में से एक हैं. सब आपके क़दमों के नीचे है. पुर्तगाल के राजा ने आपकी शान के किस्से सुने हैं और उन्होंने आपकी दोस्ती पाने के लिए मेरे ज़रिए संदेश भेजा है. अगर आपकी इच्छा हो तो हमारे और जहाज़ आएंगे और यहां से आपकी महानता के किस्से लेकर वापस अपने देश जाएंगे. हम लोगों के बीच संपर्क की वजह से कालीकट के व्यापार को बढ़ावा मिलेगा."

ज़मोरिन ने इसका जवाब देते हुए कहा, आपको यहां से वो सारे सामान ले जाने की अनुमति है जिसके लिए आप यहां आए हैं. आपको लोग शहर के बीच जाकर अपना मनोरंजन कर सकते हैं. उनको किसी तरह से तंग नहीं किया जाएगा.

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कुछ महीने रहने के बाद हुई पुर्तगाल वापसी

इसके बाद ज़मोरिन ने वास्को से कई सवाल पूछे जैसे पुर्तगाल यहां से कितनी दूर है? उनका देश कितना बड़ा है? वहां क्या-क्या पैदा होता है? उनके पास कितने जहाज़ हैं? और उनकी सेना कितनी बड़ी है?

वास्को ने उनके सभी सवालों के जवाब दिए. जब वास्को राजा के महल से बाहर निकलकर सड़कों पर आए तो वहां मूसलाधार बारिश हो रही थी. उनके साथियों ने किसी तरह एक घोड़े का इंतज़ाम किया लेकिन उस पर कोई गद्दी या जीन नहीं थी इसलिए वास्को उस पर बैठे नहीं और भीगते हुए पैदल ही आगे बढ़े.

कालीकट में कुछ महीने रहने के बाद नवंबर 1498 में वास्को ने वापस पुर्तगाल का रुख़ किया. तब तक वास्को को पुर्तगाल छोड़े 19 महीने बीत चुके थे. कालीकट से वास्को गोवा गए. वहां पर रात में वास्को के जहाज़ों पर हमला करने की कोशिश की गई लेकिन वास्को के साथियों ने उस कोशिश को नाकाम कर दिया.

पुर्तगाल वापसी के रास्ते में वास्को एक बार फिर मेलिंदा में रुके जहां के राजा ने एक बार फिर उनका गर्मजोशी से स्वागत किया. वहां 12 दिन रुकने के बाद गामा आगे पुर्तगाल की तरफ़ बढ़े. जब उनका जहाज़ केप वर्डे पहुंचा तो वास्को के भाई पाओलो बीमार पड़ गए. अगले दिन वहीं उनकी मौत हो गई. उनके दुखी भाई वास्को ने वहीं उनका अंतिम संस्कार किया.

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लिस्बन में अभूतपूर्व स्वागत

वास्को के पुर्तगाल पहुंचने से पहले ही उनके सफल अभियान की ख़बर वहां पहुंच चुकी थी. जब वास्को लिस्बन पहुंचे तो पूरा शहर उनके सम्मान में वहां खड़ा था. उन्हें दूर से ही तोप के गोले की आवाज़ सुनाई दी. जैसे ही उनका जहाज़ नज़दीक आया बंदरगाह से तोप का गोला दाग कर उनका स्वागत किया गया.

जब वास्को पोत से उतरे तो लोगों ने नोट किया कि उनकी दाढ़ी बहुत बढ़ गई है और उनका चेहरा दुखी दिखाई दे रहा है. जब वो राजमहल पहुंचे तो राजा इमैनुएल ने कुर्सी से खड़े हो कर उनका स्वागत किया.

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वास्को डा गामा

वास्को ने घुटनों के बल बैठकर राजा के हाथ चूमे लेकिन इमैनुएल ने उन्हें उठाकर अपने गले लगा लिया. वास्को की यात्रा 25 मार्च 1497 से 18 सितंबर 1499 यानी क़रीब ढाई साल तक चली. जब उन्होंने अपनी यात्रा शुरू की थी तो उनके दल में 100 सदस्य थे लेकिन जब वो वापस लौटे तो उनके साथ सिर्फ़ एक तिहाई लोग बचे थे.

जब उनकी यात्रा शुरू हुई थी तो उनका पोत बिल्कुल नया था लेकिन जब वो लौटा तो बहुत पुराना पड़ चुका था और इस तरह की यात्राओं के लिए बेकार हो चुका था.

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वास्को दो बार और भारत आए

वास्को के दल के सदस्यों को इनाम में काफ़ी धन दिया गया और उन्हें अपनी पत्नियों के लिए पांच किलो मसाले दिए गए. मारे गए नाविकों के परिवार वालों को उनका पूरा वेतन और भारत से लाए गए सामान का हिस्सा मिला. वास्को को राजा इमैनुएल ने डॉन की उपाधि दी और उनकी पेंशन स्वीकृत की गई.

उनको साइनिस गांव का लॉर्ड बनाया गया. इसी गांव में गामा का जन्म हुआ था. धीरे-धीरे उनकी प्रसिद्धि पूरे यूरोप में फैल गई. उनको कोलंबस का प्रतिद्वंदी माना जाने लगा और वो अपने देश के गौरव और आदर्श बन गए.

1502 में वो एक बार फिर कालीकट गए. 1524 में उन्हें वायसराय के ओहदे के साथ कालीकट भेजा गया. इसी साल कोचीन में उनका निधन हुआ.

14 वर्ष बाद उनके पार्थिव शरीर को उनके देश ले जाया गया जहां पूरे राजकीय सम्मान के साथ उन्हें दफ़नाया गया.

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